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तुम्हारे गले लगकर

तुम्हारे गले लगकर, मैंने जाना कि ख़ुशी, सुकून, प्रेम और इंतज़ार को किस तरह जिया जाता है! तुम्हारे हाथों में अपने हाथों को छोड़कर, मैं जान पाया कि तरंगों का जीवन क्या होता है! तुम्हारे होंठो को अपने होंठो से छूकर, मैं समझ पाया कि हमने कितनी बातें नहीं की इतने वर्षों में! तुम्हारा साथ होना ही मेरे लिए मोक्ष है, फिर उसमें दूरियाँ हो या नजदीकियाँ मुझे कोई अंतर दिखाई नहीं देता, शायद इसे ही ब्रह्माण्ड ने प्रेम कहा है.                                         - कमलेश

महा मिलन

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Source - Pintrest.com दि वास्वप्न लगती हुई वह रात जुगनुओं ने पा ली , साँझ के अंतिम क्षणों को बींध कर माला बना ली: उस क्षणिक सी चाँदनी में पाते रहे सब स्वर्ण रत्न अस्तित्व खोते उन अधर का बढ़ता घटता सा जतन। पूर्णिमा का दूजा चाँद चल दिया पूर्ण से शून्य को बाँधे रहे समूची राह में दो हाथ अपने दो हाथ को: नित् खोते रहे दोनों ही तन  पाते रहे हर क्षण नया जीवन बिसरती रही सारी खुशबुएँ पाने को एक अनवरत लगन; रह रह कर मूंदते दो नयन और , फिर और की प्यास में , खिल खिल उठा सारा जीवन कुछ गहरेपन की तलाश में: बेकाबू होते रहे मधुकलश जो थे साँझ तक जड़-स्थिर , रीत कर भी भरते रहे सब घूँट डूबती निशा में होकर निखर ; Source - Daily Express सारे अनजाने बंधनों का कोई भी पट न रहा छूटा , कोई न बचा तार ऐसा जो आवेग के बूते न टूटा: गढ़ता परिभाषा मौन की झंकृत स्वर पायलों का दुलारता तन का हर कोना प्रेम से सम्पूर्ण दंश सलोना ; लिखते रहे हर बीतते पहर मौन , शोर और सृजन टूटते रहे आवेग के संग दर्द , मुस्कानें और तन