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महा मिलन

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दिवास्वप्न लगती हुई वह
रात जुगनुओं ने पा ली, साँझ के अंतिम क्षणों को बींध कर माला बना ली: उस क्षणिक सी चाँदनी में पाते रहे सब स्वर्ण रत्न अस्तित्व खोते उन अधर का बढ़ता घटता सा जतन।
पूर्णिमा का दूजा चाँद चल दिया पूर्ण से शून्य को बाँधे रहे समूची राह में दो हाथ अपने दो हाथ को: नित् खोते रहे दोनों ही तन  पाते रहे हर क्षण नया जीवन बिसरती रही सारी खुशबुएँ पाने को एक अनवरत लगन;
रह रह कर मूंदते दो नयन और, फिर और की प्यास में, खिल खिल उठा सारा जीवन कुछ गहरेपन की तलाश में: बेकाबू होते रहे मधुकलश जो थे साँझ तक जड़-स्थिर, रीत कर भी भरते रहे सब घूँट डूबती निशा में होकर निखर;



सारे अनजाने बंधनों का कोई भी पट न रहा छूटा, कोई न बचा तार ऐसा जो आवेग के बूते न टूटा: गढ़ता परिभाषा मौन की झंकृत स्वर पायलों का दुलारता तन का हर कोना