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किसी खोए हुए घर का

किसी खोए हुए घर का पता ढूंढ रहा है, प्रेम का ख़त कबसे ज़िन्दगी ढूंढ रहा है । मेरी पगतली में चुभा हुआ एक कांटा, दिल तक आने का मौका ढूंढ रहा है । मेरे सिर पर बना था एक घाव कल, जो आज अप...

समय छटपटा रहा है.....

तमाम गुनाहों के हिसाब जिस दिन को लिए जाएंगे कितने ही अछूते रह लें हम-तुम पर बच नहीं पाएंगे । सोचोगे तुम गर कि नहीं हैं खून में तुम्हारे ये हाथ तो, गुनाह तब हाथों के नहीं विचारो...

ग़ज़ल

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Source - Pinterest.pt ये आँखें तुम्हारी शराब है क्या, नाज़ुक होंठ कोई गुलाब है क्या । महकती है खुश्बू हर-तरफ तेरी, जिस्म ये तुम्हारा गुलशन है क्या । रातों से तकरार-चांद से मौसिक़ी, तुझसे इश्क़ कोई मज़ाक है क्या । छू लें तुम्हें जो कभी बेशर्मी से हम, तो बतलाओ कोई ऐतराज़ है क्या । ऐसे वक़्त ज़ाया नहीं किया करते, हसीन शामें हर रोज़ आती है क्या । मेरे सवालों पर ऐसे ख़ामोश बैठ गए, किसी बात की तुम्हें नाराज़गी है क्या । ये ज़माना सताता ही है चाहने वालों को, पर खुद सोचो इसकी औकात ही है क्या । माना कि एक दिन सबको मरना है, तो बतलाओ हम जीना छोड़ दें क्या । कुछ दिनों से ख़फा हैं चंद मिलने वाले, सोचता हूँ ये लोग कहीं के नवाब है क्या । मौत आए तो उसे कहना इंतज़ार करे, तेरे दीदार के बगैर ही मर जाएंगे क्या ।                                           ...

दिल के खालीपन का इश्तेहार

दिल के खालीपन का इश्तेहार यूं लगा रखा है, सारे शहर को उसकी अगुवानी में लगा रखा है । मुश्किलों से मुलाक़ात भी होती रहती है लेकिन, अभी मैंने ध्यान अपना बस उनपे लगा रखा है । वो है...

मेरे गुलशन का नायाब गुलाब तुम हो

मेरे गुलशन का इक नायाब गुलाब तुम हो, देखता ही रहूँ जिसको वो ख्वाब तुम हो । गुज़रता है वक़्त तो इसे गुज़रने दिया जाए, जहाँ मैं ठहर जाऊं इसमें वो मुकाम तुम हो । अंधेरे से भरी उन त...

कुछ तुमने कुछ मैंने ...

दर्द के किस्से सुनाए कुछ तुमने कुछ मैंने, फिर सिसकियाँ सुनी कुछ तुमने कुछ मैंने । सारी तकलीफों की नुमाइशें करते करते, कई आँसू भी गिराए कुछ तुमने कुछ मैंने । देखा जब ज़ख्मों ...

रोशन चेहरों की आँखों में

रोशन चेहरों की आँखों में भी, एक रात दिखाई देती है । इन सन्नाटों में भी अक्सर, मुझको आवाज सुनाई देती है ।। हर खामी का ठीकरा तु, दूसरों के सर पर ही फोड़ता है । इल्जाम लगाने के तेरे अ...

रात की खूबसूरती

रात की खूबसूरती में कुछ खोटा लगता है, तारों   की  आँख से  कुछ  टूटा लगता है । सूरज उगता तो है तेरी यादें साथ लेकर, मगर शाम को ढलने से मुकरने लगता है । होंठो पर ग़ज़लें तो है गुनग...

तुमने ( सियासतदार )

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Source - Hindustan Times फिर मुस्कराहट को खामोश कर दिया तुमने, फिर एक दिये की लौ को बुझा दिया तुमने । अभी तो यह जहान् देख भी नहीं पाये थे वो, जिनको इस जहान् से ही मिटा दिया तुमने । अपने गुनाहों को छुपाने की कोशिश में फिर, किसी बेगुनाह की साँसो को काट दिया तुमने । शरम अब तो करो ए सियासत के पहरेदारों, एक माँ की कोख को शमशान कर दिया तुमने । माँ है वो बद्दुआ तो कभी दे ही ना सकेगी, भले ही उसके नाजुक दामन को नोच लिया तुमने ।                                    .....कमलेश.....   " श्रद्धांजलि "

सोने की एक चिड़िया रहती थी कहीं खो गई ......

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  Source - BhaktiGaane.in सोने की एक चिड़िया रहती थी कहीं खो गई, औरत एक देवी बनकर रहती थी कहीं खो गई । नफरत भर गई है सब की रगों में यहाँ पर, जुबाँ वो प्रेम को बोलती थी कहीं खो गई । कोई किसी का दर्द नहीं पहचानता अब, जटायु की आत्मा रहती थी कहीं खो गई । यमराज से दिखते हैं मुझे देश के नेता अब, रामराज से दिशाएं गूंजती थी कहीं खो गई । अब तो बैर हो गया है गरीबों से अमीरों का, कृष्ण सुदामा की दोस्ती रहती थी कहीं खो गई । मात्र एक छलावा बना दिया है आज प्रेम को, राधा श्याम की मोहब्बत रहती थी कहीं खो गई । काले कारनामों से वतन पर मेरे दाग लगा दिए, विश्व गुरु जैसी इक छवि होती थी कहीं खो गई ।                                                                          ...

लेकिन मैं छोड़ आया ।

मोहब्बतो से सजाया था उसे लेकिन मैं छोड़ आया, बहुत खूबसूरत था मेरा गांव लेकिन मैं छोड़ आया । मेरे ख्वाबो की दुनिया बसती थी वहीं पर ही, बहुत प्यारी लगी वो मुझे लेकिन मैं छोड़ आया । ...

व्यथा

हर बीती बात अब पराई लगती है, ऐ जिंदगी अब मुझे धूप लगती है । उड़कर आते थे कभी खुशी से घर, अपने घर में तो अब घुटन लगती है । चाहा के ना लिखूं किसी के दर्द को पर, हर तकलीफ अब मुझे अपनी लगत...

चाहत

ठोकरों से बिखरा हुआ मैं तुझसे जुड़ कर अवतार होना चाहता हूँ |   डूबकर के तेरे इश्क़ में इस समंदर से पार होना चाहता हूँ |   खुद को खो चूका मैं तुझको जीतकर हार होना चाहता हूँ |   बनाकर साँसों को कलम तुम्हारे लिए गीतकार होना चाहता हूँ |   सुन ले खुदा तू अरज मेरी अस्तित्व खोकर निराकार होना चाहता हूँ |                                         .....कमलेश . ....

ग़ज़ल

अपनी ख्वाहिशों का सूरज उगते देखा है, मैंने तुझको मेरा नसीब लिखते देखा है । झिलमिलाती है चाँदनी जैसे आसमान् पर, तुझको खिलखिलाकर वैसे हँसते देखा है । सिकुड़ जाती है जो छुईमुई जब छुने पर, मेरी पनाहों में तुझको यूँ शरमाते देखा है । बिखर जाता है जैसे कोई फूल हवाओं में, मेरी बाँहो में तुमको वैसे ही टूटते देखा है । घुलती है जैसे शराब पानी में रुह बनकर, खुद में तुझको उस तरह मिलते देखा है ।                                      .....कमलेश.....

पैगाम

और बहुत दिन हुए कही कुछ हुआ नही, क्या सियासत भी अब शर्माने लगी है । वो चीख, वो सिसकियां,वो पुकार क्या उनकी आवाज भी दम तोड़ने लगी है । मेरे वतन के इन हालातों को देखकर भी, क्या तुम लोगों में जरा हलचल होने लगी है । काट कर ले गए वो शीष हमारे बेटों का, क्या इस पल भी तुम्हें नींद आने लगी है । देश की सरहद पर जवान शहीद हो रहे है, क्या 56 इंच की छाती अब सिकुड़ने लगी है ।                                      .....कमलेश.....                 

तुम

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Source-Google   गर्मी के भीषण तूफान् सी निडर, बनकर के लिपट जाया करो तुम । रूख बदलती इन  हवाओं सी,  फिर से पलटकर आया करो तुम । कुछ समझ बादलों से उधार लेकर, वक्त बेवक़्त मिलने आया करो तुम । घनघोर काली घटाएँ बनकर के, दिल के आँगन पर छाया करो तुम । कड़कती चमकती बिजलियों के जैसी, कभी मुझ पर गिर जाया करो तुम । इन बारिशों की बूँदो जैसी निर्लज्ज, होकर के मुझे छु लिया करो तुम । बाढ़ के उस बेकाबू पानी की तरह, मेरे तन में फैल जाया करो तुम । अतिप्रिय-मनभावन सावन के जैसे, मुझमे समाकर प्रेम किया करो तुम ।                                                                                                          ...