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फ़रवरी, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तुम, मैं या वक़्त?

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मुझे नहीं पता कि मैं क्या दे सकता हूँ तुम्हें, लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि अगर देखोगे मेरी आँखों में कभी जो उम्मीदों के साये के साथ तो वहाँ तुम्हें इतना तो हौसला मिल जायेगा कि मैं खड़ा हूँ वहीं जहाँ तुम मुझे अपने लिए देखना चाहते हो। ज़िन्दगी को इस तरह जीना की उसका ख़ुद का मन करे कि वह तुम्हारे इर्द गिर्द हमेशा ही घूमती रहे जिस तरह तुम अपने प्रेम और जीवन के आसपास घूमते हो। बहुत आसान होता है किसी की ज़िन्दगी में अपने लिए एक जगह बना लेना लेकिन उस जगह रहकर भी सामने वाले शख्स़ को उसकी जगह और उसका वक़्त नियत समय पर देते रहना बहुत कठिन है। मैं देखना चाहूँगा तुम्हें उसी तरह अपने मुक़ाम पर बैठे हुए जिस तरह मैंने देखा था पहली बार एक तितली को फूल पर बैठे हुए, मेरा प्रेम तुम्हारे रास्ते में उतना ही आड़े आएगा जितना कि बुद्ध का अपनों से किया प्रेम आया था उनके निर्वाण के रास्ते में। तुम देखना किसी रोज़ शांत नदी को, जब तुम्हें लगने लगे थकान इन सारे कामों और यात्राओं से जो तुम इतने वर्षों से करते जा रहे हो, तब मैं तुम्हें देखूँगा उस नज़र से जिसमें तुम ख़ुद को ढूंढने की छवि देख पाओ, मैं छोड़ दूँगा वो सारे ख़…

वक़्त की कारस्तानियाँ और प्रेम का दीया

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नवरी का पहला दिन वसुंधरा के लिए कई अनमोल तोहफे और अनगिनत यादें सहेजने का अवसर लेकर आया था, जितनी ख़ुश और खुली हुई वह आज दिख रही थी उतनी बहुत ही कम मौकों पर दिखाई पड़ती थी। वसुंधरा अपने काम से फुरसत पाकर इस समय कच्छ में अपने कुछ साथियों के साथ उसको जानने की प्रक्रिया में लगी हुई थी, वसुंधरा ने साल 2019 के पहले दिन में कुछ लोगों से इस तरह मुलाक़ात और बातें की जैसे गए साल में उसने कभी उन लोगों को देखा ही नहीं। अपनी खुशियों और आज़ादी को जीते हुए उसे एक पल को हिम का ख़याल आया और उसने आज उसे कॉल करने की बजाय संदेश भेजने के लिए अपना फोन देखा और तब वह अपने फोन में प्राप्त संदेश को पढ़कर कुछ पल के लिए उस लम्हें में ही ठहर गई शायद उसे पूर्ण रुप से आत्मसात करने के लिए। हिम ने उसके लिए एक छोटा सा संदेश छोड़ा था नए साल की शुभकामनाओं के साथ जिसमें उसकी भावनाएं पढ़ना उतना ही आसान था जितना कि पहली के बच्चे का हिंदी वर्णमाला के अक्षरों को पहचानना। वसुंधरा ने बिना कोई भाव ज़ाहिर किये उस लेख को जाने कितने दिनों तक अपने भीतर ज़िंदा रखा ताकि उसकी ऊष्मा बरकरार रहे। कच्छ से फिर लौटकर उसने अपने कामों की सुध ली जिसमें…

और दिसम्बर वसंत हो गया…

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गुलज़ार अपनी परीक्षाओं से समय निकाल कर हाल ही में एक संस्था से जुड़ा था जहाँ वह अपनी ट्रेनिंग की प्रक्रिया से गुज़र रहा था। गुलज़ार को अपने प्रशिक्षण के अंतिम दिन अपने मोबाइल फोन पर एक अपठित संदेश दिखाई पड़ा जो उसे तक़रीबन ४ घंटे पहले भेजा गया था। ख़ुशबू ने उसे यह कहने के लिए संदेश भेजा था कि वह कल 2 बजे के बाद अपने कामों से फ़ुरसत पा लेगी, जिसका सीधा सा मतलब यह था कि कल गुलज़ार और ख़ुशबू चार महीनों के इंतज़ार के बाद आख़िरकार मिल जायेंगे। गुलज़ार अपने आने वाले पर्चे की बची कुची तैयारियों को निपटाने में जुट गया ताकि इम्तिहान से जुड़े ख़याल उसकी और ख़ुशबू की मुलाक़ात में दखल-अंदाज़ी न करने पाए। अगले दिन सारे इंतज़ार और बेचैनियों के साथ गुलज़ार ख़ुशबू से मिला और दिल में दबे सारे अरमानों और किस्सों को उससे साझा किया, ख़ुशबू भी शायद इसी पल के लिए ख़ुद को थामे हुए थी एक बार जो उसने बोलना शुरु किया तो फिर सारी बातें करके ही दम लिया। चार महीने बाद की इस मुलाक़ात को यादगार और हसीं बनाने का कोई भी मौका न तो ख़ुशबू छोड़ने वाली थी और न ही गुलज़ार का ऐसा कोई इरादा था। वे दोनों उन सारी जगहों और लोगों से मिले जो उनकी पहली मु…

दीवाली, धोखा और खुशख़बरी

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र्ण अपनी बर्थ पर लेटा हुआ था और किसी किताब के पन्नों पर लिखे शब्दों को बिना रुके पढ़ता चला जा रहा था, वह किताब उसने स्टेशन से चलते वक़्त शुरु की थी कुछ 6 घंटे पहले। रात के आठ बज रहे थे और ट्रेन किसी स्टेशन के आउटर पर खड़ी अपने सिग्नल की बारी का इंतज़ार कर रही थी, तभी कर्ण का फोन घनघनाया और उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट फैल गई, उसके फोन की स्क्रीन पर एक संदेश आया था। मैत्री, उसकी बहुत ही क़रीबी और अज़ीज़ दोस्त, उसने संदेश भेजा था यह याद दिलाने के लिए कि जब वह उससे मिले तो अपने हाथ से बना खाना लेकर आये मैत्री के लिए। कर्ण मैत्री के संदेश के जवाब के बारे में बिना सोचे अपने रात के खाने के इंतजाम में लग गया, और फिर सुबह के लिए कोई बहाना खोजकर सो गया। कर्ण ने इस साल की दीवाली अपने घर, गाँव और बाकी लोगों के साथ बिल्कुल उसी तरह मनाई जिस तरह वह पिछले 7 सालों से मनाना चाह रहा था। मैत्री भी दीवाली तक अपने घर आ गई थी और ख़ुशी, प्रेम और दुलार का रंग ही रंग हर तरफ बिखरा हुआ दिखाई पड़ रहा था। दोनों ही लोग अलग अलग जगह, अलग अलग लोगों के साथ दीवाली मना रहे थे लेकिन उनके जज़्बात उतने ही क़रीब और उतने ही समान थे। दी…

अतीत की खिड़की में - २

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सागर ने अक्टूबर की शुरुआत इंडिया हेबिटेट सेंटर से की, उसकी अनिश्चितताएं उसे कहाँ ले जा रही थी यह सागर को कभी जानने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। इधर हीर ने अक्टूबर का स्वागत अपने अंदाज़ में ही किया, कई सारे सफ़र, नई दोस्तियाँ और अकस्मात सी मुलाक़ातें। दिन जितनी जल्दी गुज़रना चाहिए उतनी जल्दी अगर वाकई में गुज़रे तो ऐसा लगता है कि हम हवा के झोंके से उड़े जा रहे हैं लेकिन ऐसा कुछ भी न तो हीर और न ही सागर के साथ हो रहा था। हवाएँ अपनी रफ़्तार के साथ कभी सागर को कल से आज तो कभी हीर को आज से कल में ले जा रही थी और वापिस लेकर भी आ रही थी। अक्टूबर की रातें सागर के लिए चाँदनी और पुरानी यादों का एक बॉक्स लेकर आई जब घर जाने के लिए ट्रेन में बैठकर सबसे पहले उसने उसकी खिड़की से बाहर झाँका। सागर अपने गाँव और वहाँ की हर चीज़ को बहुत ही बेचैनी भरे दिल में एक बार फिर सँजोना चाह रहा था, इस बार सागर अपने दोस्तों, पीछे छूट गए रिश्तों और अपनी पसंदीदा जगहों को फिर से मिला और जब वह 10 दिन बाद वापस आने लगा तो एक छोटे से सवाल का सामना उसने किया जो उसकी 3 साल की भतीजी ने उससे पूछा था कि कल नहीं जा सकता क्या तू?
अपनों के साथ र…

अतीत की खिड़की में - १

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सितंबर एक ऐसा महीना है जिसमें यह जानने की उत्सुकता बनी रहती है कि अगले पल क्या हो सकता है या फिर यही उत्सुकता कोई चोट खाकर हमेशा के लिए कोने में दुबककर बैठ जाती है। हीर को अपना शहर छोड़े 20 दिन हो गए थे और वह अब तक अपनी नई जगह पर बहुत ही अच्छे से रच बस गई थी, लेकिन हीर ने एक काम को उतनी ही शिद्दत से करना जारी रखा और वह था अपने कामों से इश्क़ और सागर का ख़याल। सागर से पहली बार मिले तीन महीने बीत चुके थे लेकिन अब भी वह मुलाक़ात कल ही घटित हुई किसी ताज़ी घटना सी लगती थी। सितंबर सागर के लिए ढेर सारी सौगातें लेकर आया हुआ था और उसी की आवभगत के चलते सागर को बहुत ही कम समय मिल पा रहा था, अपने दिल की बातों को हीर से हर्फ़ दर हर्फ़ साझा कर देने के लिए। आधा बिता हुआ सितंबर जो ठंडक और उमस देता है उससे फरवरी और अप्रैल के मिले जुले मौसम का माहौल बन जाया करता है, ज़िन्दगी भी ऐसे ही किसी आधे सितंबर में हमें उठाकर कभी फरवरी तो कभी अप्रैल के अनुभव करवाती है।
सागर को 18 सितंबर को अचानक राँची जाना पड़ा क्योंकि वहाँ एक अवसर और कई सारी नई दोस्तियाँ उसका इंतज़ार कर रही थीं। उस रात हीर ने सागर से बात की और जो उन दोनों …

आख़िरकार अगस्त को आज़ादी मिली

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गस्त की बारिशें सुकून और तड़प साथ लेकर आती हैं और उन्हीं के साथ आये ढेर सारे किस्सों और पुरानी यादों के संदूक में लिपटी तस्वीरें और लम्हें किसी भी नामामूली इंसान को झकझोर कर रख देने के लिए काफी होते हैं। ठीक इसी तरह कृति को विष्णु का कॉल आया जब वह अपनी ख़्वाहिशों की रंगत भरी दुनिया में ऐसी ही अगस्त की बारिश में भीगकर बैठी हुई कुछ यादें ताज़ा कर रही थी। विष्णु से मुलाक़ात तो केवल दो महीने पुरानी थी लेकिन उससे बात करते समय कृति को ऐसा लगता था कि वह न जाने कितने समय से उसे जानती है उससे बातें करती है और उसके लिए दुआएं करती रहती है। अपने घर की छत पर बने कमरे में कभी न समाने वाले ऐसे कितने ही ख़याल कृति के दिल में जन्मते और फिर कहीं टोह पाकर छुप जाते। कृति को 6 अगस्त की रात एक ईमेल मिला और उसे तुरत फुरत दिल्ली के लिए अपना साजो सामान समेट कर निकल जाना पड़ा, ताकि वह अपना आने वाला एक साल ढेर सारी दोस्तियों, कई बातों और नई मुश्किलों के साथ गुज़ार सके।
कृति दिल्ली आयी तो उसे यहाँ के आसमान में बादल दिखाई दिए जो शायद किसी शुभ संकेत का इंतज़ार कर रहे थे, यह देख उसने विष्णु को संदेश दिया कि वह दिल्ली में ह…

फिर...बारिशें थम गईं

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क रोज़ सूरज वैसे ही उगा जैसे हर रोज़ उगता है लेकिन आज सूरज यह नहीं जानता था कि आज कोई उसकी किरणों की गर्मी को ठंडा कर देगा, कोई है दुनिया में जो उसकी तरफ उतनी शांत नज़र से देखेगा कि उसकी ऊष्मा ख़तरे में भी आ सकती है। प्रेम ने आज सुबह उठकर अपने व्हाट्सअप से पिछले महीने शुरु हुई एक कहानी को आगे बढ़ाने के लिए अपनी नई दोस्त को अपना पिछले दिनों लिखा एक छोटा सा लेख पढ़ने के लिए भेज दिया और सूरज की तरफ अपनी नज़रें उठाई। ख़ुशी ने दूसरे दिन शाम को लेख पढ़कर अपनी प्रेम और खुशियों से सरोबार प्रतिक्रिया व्यक्त की, जिससे दोनों ही भावविभोर हो गए। ख़ुशी की प्रतिक्रिया के पीछे छुपे कारणों और उम्मीदों को प्रेम ने ख़ुशी की न बोली गई बातों से सुना और हर रोज़ उसे एक कविता सुबह की शुभकामनाओं के साथ भेजने का निर्णय ले लिया। ख़ुशी को यह पहल शायद उतनी ही ज़रूरी लगी जितना कि साँस लेना, वह प्रेम से उसके लेखन के बारे में बातें करने को हमेशा उत्सुक दिखी और दोनों आये दिन अपने अनुभवों को एक दुसरे के साथ साझा करते रहे। इसी सिलसिले में एक दिन प्रेम ने अपनी एक कहानी उसे भेजी जिसकी उसे उस वक़्त भेजने की ज़रूरत महसूस हुई और उस कहानी …

नाश्ते की टेबल

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क लड़का अपनी थोड़ी सहमी और थोड़ी उत्सुक शक्ल लिए नाश्ते की टेबल पर बैठा हुआ था। कुछ नए चेहरों को उसने ख़ुशी से देखा और उनकी ओर पहचान बढ़ाने के लिए उठकर चल दिया। कुछ ही समय बाद नाश्ते की टेबल पर हँसी का ठहाका गूँज गया, नए मिले दोस्तों के साथ अब बातों ने ठिठोली की राह पकड़ ली थी। नाश्ते के बाद सारे लोग वहाँ से उठकर आसपास घूमने के लिए चल दिये, पास के बगीचे में पानी छोड़ा हुआ था किसी ने। अचानक नए दोस्त सूरज ने नली उठाकर सबको गीला करना शुरु कर दिया, अकस्मात हुए हमले से बचने के लिए सबने अपने रास्ते खोजने की कोशिश की लेकिन एक लड़की वहीं मुस्कुराती हुई सूरज के इस कृत्य पर थोड़ी ख़ुश थोड़ी नाख़ुश सी ठहर गई। कुछ देर की मस्ती के बाद जब सब ने फोटो सेशन शुरू किया तो उस लड़की ने सबकी हँसते हुए फोटो लेने पर जोर दिया। वह इसी तरह मुस्कान को अपने चेहरे पर रख सारा दिन घूमती रही और सबसे पहले नाश्ते की टेबल पर पहुँचने वाला लड़का अपने प्रोग्राम के पहले दिन को जी लेने में जुट गया। एक लड़का जिसका नाम हम क्या रख सकते हैं, चलो कृष्ण रख लिया जाए और लड़की को कोई न कोई नाम देना ही पड़ेगा नहीं तो नाश्ते की टेबल पर शुरु हुआ किस्सा…