पल में छुपा पल
Source - sidefx.com “वह बरामदे से उठी और पास के एक अँधेरे कमरे की ओर बड़ी, कमरे के दरवाज़े पर लगी कंदील मानो उसका इंतज़ार ही कर रही थी; जैसे ही उसने कंदील को छुआ वह तुरंत उसके हाथों में आ गई. कंदील उठाये वह उस अँधेरे कमरे में कुछ देर के लिए घूमती रही और अंत में किताबों की एक पूरानी कतार में से विनोद कुमार शुक्ल की एक किताब को अपने हाथों में लिए बाहर आ गई. यह घर उसके जेहन में तब से है जब से उसने दुनिया को समझना शुरु किया था. अक्सर जब वह इससे दूर होती है यह घर उसके सपनों में आया करता है और अपनी कहानी बताते हुए उसे अपने पास आने के लिए कहता है. आज जब इतने सालों बाद वह इस घर में वापस आई है तो उसके सपनों से जर्जर हालत इस घर की हो चुकी है, उसकी यादें आज भी घर को अपने अन्दर सहेजे हुए है और शायद यही वजह रही है कि घर उसके लिए अभी तक जर्जर नहीं हुआ है. बरामदे के सामने बनी बाड़े की दीवार ज्यादा बारिश की वजह से पिछले साल गिर गई थी लेकिन आँगन से जुड़े दो कमरे अभी तक सहज और सुरक्षित थे; एक में कुछ पूरानी किताबों का ज़खीरा था और दूसरे वाले कमरे में रहने भर की जगह कुछ ज़रूरी सुविधाओं के साथ. विनोद कुमार शुक्ल...