संदेश

केंद्र लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मैं और स्त्री

चित्र
दुनिया ने जब सुनाया अपना संगीत, तो सबसे पहले उसे सुना एक खेत में काम करती स्त्री ने। संगीत का सफ़र अनवरत रहा अनगिनत राहों और मोड़ से होते हुए, मैंने कानों में सुनी उस स्त्री की गूँज। जब से साबका हुआ है हक़ीक़त से मैं ठहरकर देखता हूँ हर उस स्त्री को जो लगती है मुझे बुद्ध के मौन और कृष्ण की अनुगूँज सी। हज़ार राहें गुज़र गईं इन 22 बरस के क़दमों तले होकर, मुझे मिली हर स्त्री ने मुझको दिया ज़िन्दगी के अनमोल पाठों का सार; मैंने ज़िद, समझ, विश्वास, समर्पण, प्रेम करुणा, ममता, आदर सी लगती हर बात को सीखा है स्त्री के वजूद से टपकते सच में। मेरा जीवन अधूरा है उस कली के खिलने तक जिसे किसी दिन खेत में काम करने आयीं, और अपने पसीने से लथपथ तन से समूचे विश्व के अस्तित्व का भार उठाती: एक निश्चल सी स्त्री ने पानी पीने के बाद लौठे में बचे पानी को गिराया होगा पौधे पर। मेरी आंखों के आगे फैले संसार में जितना कुछ मैं देख पाता हूँ मुझे यकीन है कि स्त्री के होने से ही मिल जाया करती हैं मेरे अस्तित्व को अनगिनत परिभाषाएं, दुनिया ढूंढ़ रही है सारे समाधान किताबों, विज्ञान और अ...

आख़िरकार अगस्त को आज़ादी मिली

चित्र
Source - Unsplash.com अ गस्त की बारिशें सुकून और तड़प साथ लेकर आती हैं और उन्हीं के साथ आये ढेर सारे किस्सों और पुरानी यादों के संदूक में लिपटी तस्वीरें और लम्हें किसी भी नामामूली इंसान को झकझोर कर रख देने के लिए काफी होते हैं। ठीक इसी तरह कृति को विष्णु का कॉल आया जब वह अपनी ख़्वाहिशों की रंगत भरी दुनिया में ऐसी ही अगस्त की बारिश में भीगकर बैठी हुई कुछ यादें ताज़ा कर रही थी। विष्णु से मुलाक़ात तो केवल दो महीने पुरानी थी लेकिन उससे बात करते समय कृति को ऐसा लगता था कि वह न जाने कितने समय से उसे जानती है उससे बातें करती है और उसके लिए दुआएं करती रहती है। अपने घर की छत पर बने कमरे में कभी न समाने वाले ऐसे कितने ही ख़याल कृति के दिल में जन्मते और फिर कहीं टोह पाकर छुप जाते। कृति को 6 अगस्त की रात एक ईमेल मिला और उसे तुरत फुरत दिल्ली के लिए अपना साजो सामान समेट कर निकल जाना पड़ा , ताकि वह अपना आने वाला एक साल ढेर सारी दोस्तियों , कई बातों और नई मुश्किलों के साथ गुज़ार सके।           कृति दिल्ली आयी तो उसे यहाँ के आसमान में बादल दिखाई दिए जो शायद...

ज़िन्दगी का केंद्र

चित्र
ज़िन्दगी के अच्छे खासे दौड़ते-भागते दिन जब बिस्तर पर बीतने लगे तो लगता है बहती नदी पर पलक झपकते बाँध बना दिया हो. काम करने का सलीका अचानक से ऑफिस बैग से निकलकर पूरे कमरे में पसर जाता है. अंगुलियाँ अनगिनत चहलकदमी करती हुई अपने होने के वजूद को किसी मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर के की-बोर्ड पर खपा देती हैं. ऐसे वक़्त में मौसम के बदलते मिजाज़ का अंतर्मन से कोई भी नाता नहीं पनपता और न ही किसी ख़ूबसूरत कली को देखकर दिल में कोई हूक उठती है. उठता है तो बस एक निरा खालीपन जो एक लम्बे वक़्त से बाहर से बोलते लेकिन अन्दर से ख़ामोश शरीर में घर कर चुका होता है. इस दुनिया में हर रोज़ धुलते हैं अनगिनत चेहरे और सजते हैं उतने ही अधर किसी प्रिय के चुम्बन की आस में, लेकिन कितने चेहरों का दीदार किया जाता है और कितने ही होंठ चुम्बन के बाद मुतमइन हो पाते हैं! यह सवाल कोई नहीं करना चाहता कि उसके जीवन में प्रेम है या नहीं लेकिन कामों की फ़ेहरिस्त कितनी घटा दी है एक ही कुर्सी पर कमर की सारी भावनाओं को क़त्ल करते हुए यह सब को ज्ञात है.             ...