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सवाल किस बात का है?

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सैंकड़ों जलती चिताएँ अनगिनत भटकते लोग, पैदल घर लौटती एक दुनिया प्यास-भूख से थमती साँसे, आँसुओं की अविरल धारा छोड़ गए साथियों का ग़म। कितना कुछ है यहाँ जिसे देखने के लिए आँखें नहीं करुणा की ज़रूरत है। वे पूछते हैं तुम किस पाली में हो? मैं ख़ुद से करता हूँ सवाल कि क्या अब भी देखा जाए एक ख़्वाब जिसमें धर्म की लकीरें न हों पैसों से पनपती खाई न हो घर लौटने वालो के लिए आराम हो अकेली लड़की के मन में खौफ़ न हो स्त्री के सिर पर तमाम बोझ न रखा हो बच्चों के खेलने का खुला मैदान हो मान-सम्मान के परे लोग मिलते हों बचपन से लाई गई हंसी हो युवाओं की ज़ुबाँ पर सवाल हो हुक्मरानों की नीति नहीं नियत साफ़ हो बगल में आग लगने पर  अपने घर में चादर ओढ़कर सोने वाले न हों! मैं चाहता हूँ कि  यह न पूछा जाए कि कौन किस पाली में बैठा है बल्कि सवाल चाहत का रहे; जैसे एक प्रेमी-युगल चाहे साथ बैठकर बातें करना ढलते सूरज को सुकूँ से देखना एक-दूजे के होंठो का चुम्बन भीड़ के डर से परे एक आलिंगन जिहाद से परे चाँदनी की एक सैर पहचान से बहुत दूर पनपती प्रेम और सिर्फ प्रेम की एक दुनिया।           ...

मैं और स्त्री

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दुनिया ने जब सुनाया अपना संगीत, तो सबसे पहले उसे सुना एक खेत में काम करती स्त्री ने। संगीत का सफ़र अनवरत रहा अनगिनत राहों और मोड़ से होते हुए, मैंने कानों में सुनी उस स्त्री की गूँज। जब से साबका हुआ है हक़ीक़त से मैं ठहरकर देखता हूँ हर उस स्त्री को जो लगती है मुझे बुद्ध के मौन और कृष्ण की अनुगूँज सी। हज़ार राहें गुज़र गईं इन 22 बरस के क़दमों तले होकर, मुझे मिली हर स्त्री ने मुझको दिया ज़िन्दगी के अनमोल पाठों का सार; मैंने ज़िद, समझ, विश्वास, समर्पण, प्रेम करुणा, ममता, आदर सी लगती हर बात को सीखा है स्त्री के वजूद से टपकते सच में। मेरा जीवन अधूरा है उस कली के खिलने तक जिसे किसी दिन खेत में काम करने आयीं, और अपने पसीने से लथपथ तन से समूचे विश्व के अस्तित्व का भार उठाती: एक निश्चल सी स्त्री ने पानी पीने के बाद लौठे में बचे पानी को गिराया होगा पौधे पर। मेरी आंखों के आगे फैले संसार में जितना कुछ मैं देख पाता हूँ मुझे यकीन है कि स्त्री के होने से ही मिल जाया करती हैं मेरे अस्तित्व को अनगिनत परिभाषाएं, दुनिया ढूंढ़ रही है सारे समाधान किताबों, विज्ञान और अ...

ज़िन्दगी और रास्तों का चुनाव

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लगभग सारे ही किनारों पर पसरी हुई हैं ख़ामोशियाँ पिछले कुछ दिनों से, जहाँ खनकती थी कभी ख़ुशियाँ। फैलती जा रही है यह दुनिया वैश्वीकरण के सिद्धांतों तले, सिमटता जा रहा है पर इंसान अकेलेपन से उपजे अवसादों में। सामने आए हुए दो रास्तों में, मैंने हर दफ़ा वही चुना जिस पर चलकर मुझे हमेशा लगता रहा कि मैं ख़ुद की परतें उतारने में लगा हूँ। आज खेत की मेड़ पर बैठे बैठे ऐसा महसूस हो रहा है जैसे, खोज रहा था उम्र भर से जिसको छुपा हुआ था वह मेरे प्रेम के तरीकों में। कल फ़ोन पर बतियाते हुए मित्र ने कहा कि 'should' और 'can' में से जिसे चुनोगे, वही तुम्हें परिभाषित करेगा! मैं चुन चूका हूँ वह राह जो आज़ाद है  मेरी परिभाषाओं और वक़्त से, लेकिन धँसा हुआ है गहरे तक ज़िन्दगी को देखने के मेरे तरीकों में। - कमलेश शुक्रिया वसुधा जी इस तस्वीर के लिए...

प्रेम और करुणा... काफी है!

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घुप्प अँधेरे से भरी दुनिया में, हर कोई तलाश रहा है एक टुकड़ा रोशनी; जिसके सहारे उसे मिल सके अपने खोए हुए जीवन का पता. राहें खूँखार होती जा रही है, पानी में ज़हर घोलने वालों की संख्या बढ़ गई है चंद गुज़रे दिनों से: और भी न जाने कितनी तरह से मुश्किलों ने पाँव पसारे हैं यहाँ! मैं इतना तो जानता हूँ लेकिन कि मुझे कितने लम्हों में समेटना है अपनी आँखों के आगे फैले हुए संसार को, मुझे पता है यह भी कि कितना भाव दूँ किसी की नफ़रत को ताकि वह धरी की धरी रह जाए! और ख़ास बात तो यह है कि मुझसे कहा है किसी ने कि ख़ुद से किया गया प्रेम और सबके लिए उपजाई हुई करुणा इस दुनिया की तमाम मुश्किलों और हथियारों का सामना करने के लिए ज़रूरत से बहुत ज्यादा काफी हैं. -        कमलेश  तस्वीर के लिए शुक्रिया विजय भईया

प्रेम की आवश्यकता

दो सितारों की गुफ्तुगू सा एक रिश्ता पल रहा है मेरी पलकों के नीचे, न कोई वादा, न कोई मंज़िल बस सफ़र में चल रहा है कब से; कभी कोई किताब पढ़ता हूँ तो उसमें भी इसी की कहानी होती है, सुनता हूँ गर’ किसी के किस्से उनमें भी यही झलकता है. खेतों में फसल को पानी देते हुए, जानवरों के लिए चारा लाते हुए, किसी के हक़ में आवाज़ उठाते हुए, किसी कविता को लिखते हुए, ज़िन्दगी के किस्सों को सुनाते हुए, बदलाव की प्रक्रिया को अंगीकार करते हुए, दुनिया की राहों में ख़ुद को ढूंढते हुए, मैं नहीं खोज पाया आज तक और कुछ हर दफ़ा एक जवाब क़दमों को आकर्षित करता है कि दुनिया, मुझे और इस रिश्ते को प्रेम के साथ रहकर जीने की आवश्यकता है.                                                   - कमलेश

प्रेम और ख्वाहिशें

कौन चाहता है कि चाँद किसी रात आसमान छोड़ कर छुप जाए; किसी गहरी पहाड़ी के पीछे, मैं उसके बालों को देखता हूँ तो चाहता हूँ कि ये ख़्वाब सच हो. दुनिया में पल रहे सारे सवाल इकठ्ठा करके मैं, उनको उसकी हँसी सुनाना चाहता हूँ: उसके मुस्कुराने भर से दिक्कतें हल हो जाया करती हैं. प्रेम में घूम रहे ब्रम्हांड के सारे ग्रह एक दिन आकाशगंगा में विलीन हो जाने का ख़्वाब देखते हैं, और मैं चाहता हूँ कि निहारता रहूँ उसके चेहरे को अपने विघटन के आख़िरी क्षण तक, लिख दूँ उसके लबों पर एक कविता प्रेम की बूँद के खप जाने से पहले, वक़्त को उसके लौटने तक रखूँ बगीचे के नए उगते गुलाब के नीचे, सुना है वक़्त में अधूरी छुट गई ख्वाहिशें नई ज़िन्दगी की शुरुआत बनकर लौटती हैं. -        कमलेश

मैं और ख़्वाब

मैं देख रहा हूँ खिड़की से लटकते इन सारे अधूरे अजनबी ख़्वाबों को, ये सपने जो कभी मेरे नहीं रहे ये लोग जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा, अचानक से किसी रोज़ आएँगे मेरे शहर और माँगेगे अपनी हक़ीक़त के सवालों के जवाब; मैं रहूँगा उसी तरह ख़ामोश जिस तरह अपने ख़्वाब के खोने पर हो जाता हूँ, तब मैं याद करुँगा वो सारे क़िस्से, जो ख़्वाब को फिर देखने के लिए सुनाए थे मैंने ख़ुद को पास बैठाकर। मैं नहीं जानता कि कोई क्या चाहता है मुझसे, मैं जानता हूँ केवल इतना ही कि ढूँढ लेगी मेरी राहें हर उस पल को, हर उस शख़्स को, जहाँ तक मुझे पहुँचना लिखा है।                                       - कमलेश

कृष्ण

तुम्हारे हँसने पर गर' तुम्हारी खिलखिलाहट में गूँजे वंशी, तो दुनिया से कह दूँ कि कृष्ण इंतज़ार में है तुम्हारे। रुक जाने पर तुम्हारे बैरागी हो जाएँ जो ये हवाएँ, तुम जान जाओगी ...

सुनो दोस्त!

मनु के लिए - (14-जुलाई-2019) कुछ रिश्ते नदी में बहते फूलों की तरहा होते हैं, मैं बहकर आ गया तुम तक ऐसी ही एक आनंदमयी लहर के साथ, तुम्हें देखकर लगा नहीं मुझे कि मिला हूँ तुमसे मैं सिर्फ क...

ज़िन्दगी का पर्याय - घर

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ज़िन्दगी के रास्तों में ख्वाबों की खटपट जारी है पिताजी जब घर से फ़ोन करते हैं, तो चेहरे पर मुस्कान तारी होती है और दिल में एक नया ख्याल पनपता है, बहुत दिन हुए माँ की आवाज़ सुने भी; सपने तो सारी दुनिया एक जैसे देखती है, बस चलते हुए घड़ी का वक़्त हाथ में नहीं रहता। मैं खींच रहा हूँ, पेड़ की जड़ में अटकी रस्सी घर की ख्वाहिश है कि देखे मेरी सूरत, मैं लेकिन लिपट कर सोना चाहता हूँ दादाजी के पुराने कम्बल से; चार नए आम के पेड़ भैया-भाभी ने लगा दिए हैं घर के आगे, बस पिताजी और माँ के साथ नीम के नीचे रखे तख़्त पर बैठ चाय पीना बाकी है: कुछ रातें चूल्हे के सामने बैठकर, बतियाना चाहता हूँ जी भरकर भैया-भाभी से। बच्चों के साथ मिट्टी में खेलते हुए खुद को भुला देना चाहता हूँ, आम तोड़ने हैं कभी उचककर मुझको जब कोई ज़िद करे कि आम चाहिए उसे। ज़िन्दगी से चार ख़्वाब मैं अपने हक़ की तरह ले लूँगा, आम, नीम, चाय, तख़्त और बातें मेरे बच्चों से ले लिया है मैंने ये उधार, प्रेम की परछाईयाँ जो खनकती है मेरे पहलुओं में, चाहता हूँ कि मुझे चाँद की तरह देखने वाली लड़की के हिस्से में भी बराबरी से...

वसीयतनामा

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किसी भी सफ़र के समय दो भागों में बँट जाती है दुनिया, मैं बन जाता हूँ दर्शक ताकि बचा हिस्सा दर्शन हो जाये, दार्शनिक का कोई अस्तित्व नहीं कहानी में: सब ढूँढ रहे हैं खुलापन पैरों में जंज़ीरों को ढोते हुए, उजाला दीखता तो है आँखों में पलकों में जमे हुए अँधेरे के पीछे। मैं चलता हूँ आसमाँ के नीचे जो घूरता है हर कदम मुझे, साथ चल रही लड़की कहती है दूर जाते हो तुम तो आँखों में बादल छा जाते हैं, मैं कहता हूँ  हाँफती धरती और घूरता आसमान, मौन से प्रतिपल होता संवाद और पलकों में लिपटा इंतज़ार प्रेम का दूसरा नाम है। दो हिस्सों में बँटते से सफ़र में झाँकता हूँ खिड़की से बाहर, तो दुनिया दीखती है नई सी जहाँ इंसान की कमी लगातार बढ़ रही है जहाँ सपनों का अकाल चल रहा है, मेरे हमनफ़स मेरे वसीयतनामे में मिलेंगे दो नाम: पहाड़ की गोद में बसा जंगल और मोर पंख रख पाओ सहेजकर तो रखना।                                           - कमलेश

तुम्हारे गले लगकर

तुम्हारे गले लगकर, मैंने जाना कि ख़ुशी, सुकून, प्रेम और इंतज़ार को किस तरह जिया जाता है! तुम्हारे हाथों में अपने हाथों को छोड़कर, मैं जान पाया कि तरंगों का जीवन क्या होता है! तुम्...

महा मिलन

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Source - Pintrest.com दि वास्वप्न लगती हुई वह रात जुगनुओं ने पा ली , साँझ के अंतिम क्षणों को बींध कर माला बना ली: उस क्षणिक सी चाँदनी में पाते रहे सब स्वर्ण रत्न अस्तित्व खोते उन अधर का बढ़ता घटता सा जतन। पूर्णिमा का दूजा चाँद चल दिया पूर्ण से शून्य को बाँधे रहे समूची राह में दो हाथ अपने दो हाथ को: नित् खोते रहे दोनों ही तन  पाते रहे हर क्षण नया जीवन बिसरती रही सारी खुशबुएँ पाने को एक अनवरत लगन; रह रह कर मूंदते दो नयन और , फिर और की प्यास में , खिल खिल उठा सारा जीवन कुछ गहरेपन की तलाश में: बेकाबू होते रहे मधुकलश जो थे साँझ तक जड़-स्थिर , रीत कर भी भरते रहे सब घूँट डूबती निशा में होकर निखर ; Source - Daily Express सारे अनजाने बंधनों का कोई भी पट न रहा छूटा , कोई न बचा तार ऐसा जो आवेग के बूते न टूटा: गढ़ता परिभाषा मौन की झंकृत स्वर पायलों का दुलारता तन का हर कोना प्रेम से सम्पूर्ण दंश सलोना ; लिखते रहे हर बीतते पहर मौन , शोर और सृजन टूटते रहे आवेग के संग दर्द , मुस्कानें औ...

प्रेम फलित होता ही तब जब जीत कर रह जाए हारा

प्रेम के वशीभूत होकर लिखता जा रहा है वह निरंतर, है घिरा सब ओर से भीड़ भाव और राग से, खोता जा रहा नित् ही पर हर क्षण अजर एकांत में: तुम रुको क्षण भर देखो दीखता क्या तुम्हें पन्नों ...

दुनिया की जरूरतें

आया तो उड़कर एक ही पत्थर था, लेकिन उसने दो आंखों में अँधेरा और साथ की दस नज़रों में खून भर दिया। रास्ते तो लगे ही थे दस साल की पीठ पर टंगे बैग की हिफाज़त में, लेकिन अभी अभी इंसान से ...

तुम्हारे अधर

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Source - artist.com बारिशें खंगाल रही हैं धरती की कोख़ आंधियाँ पलट रही है तमाम वस्त्र, लोग भूलते जा रहे हैं  जो कुछ देखा, किया और सीखा उन्होंने, रातें छुपी हुई हैं दीवारों के पीछे दिन ढूँढ रहा है पनाह एक गड्डे में; आँखें चीख रही हैं मौन  हाथ लिखते जा रहे हैं भविष्य, पैरों को भुला गई हैं सारी राहें, थकान भर चुकी हैं साँसों में। तुम आती हो तब जीवन के संताप को हरने, मैं हो जाता हूँ ग़ुम तुम्हारे हाथों की परिधि में। मिट जाती हैं व्यंजनाएँ तमाम एक प्रेम से सरोबार आलिंगन में, खुलते हैं इन्द्रियों के पैबंद चटकने लगते हैं दिनो-रात। प्रकृति के इस पुनर्जीवन पर सृष्टि-सर्जन के गीतों को गाते तुम्हारे सुकोमल गुलाबी अधर; मैं रख देता हूँ  अपने मुख को उन पर, पढ़ने को वे तमाम रतजगे विषाद के दिनों से संजोये हुए: जो कहने आयीं तुम अपने अधरों पर रखकर।                                 - कमलेश

अनजानी सी तुम

यूँ ही घूमते हुए किसी पार्क में, जब देखता हूँ वहाँ खेल रहे बच्चों को, तो मेरा बचपन हिलोरें मारने लगता है मेरे भीतर। कुछ मुस्कुराहटें जो अनजान लोगों के चेहरे पर देखता हूँ, तो ...

जब तुम्हारी याद आती है...

भूख,प्यास, भावनाएँ, सब भूल जाता हूँ, और नींद, जागना, सपने, ख्यालों को भी भूल जाता हूँ, जब मुझे तुम्हारी याद आती है... साँसे रहती हैं वहीं की वहीं, कदम ठहर जाते हैं सड़कों पर चलते हुए, रूक जाता हूँ मैं ख़ुद को लिखते हुए मौन हो जाता हूँ किसी गीत को गाते, जब तुम्हारी याद आती है मुझे... निकलता हूँ जब अपना चोला उतारकर जंगल की राह पर, देखता हूँ उसके दरख्त और सब्ज़ जमीं को तब पंछियों के चहचहाने में ढलते सूरज की रोशनी में, एक अक्स दिखाई पड़ता है वहाँ; जब मुझे तुम्हारी याद आती है... शाम के ढलते साये में जब टिका लेता हूँ अपनी पीठ उम्मीदों के घर की छत पर बनी मुंडेर से, टिमटिमाता है रात का पहला तारा आसमान के किसी कोने में, निकल आता है चाँद अचानक से, और बदल जाता है मौसम मेरे हालातों का जब तुम्हारी याद आती है मुझे...                                       - कमलेश

कविता २ (इंतज़ार)

छाई है ख़ामोशी इस कमरे में जहाँ तुम छोड़ गए अपनी अनुपस्थिति, मैं कर रहा हूँ अभी भी वो सारी बातें जो हो रही थी उपस्थितियों के क्षणों में; ढूँढ रहा है बिस्तर पर गिरा हुआ एक आँसू कि ...

कविता १ (मिलन)

कुछ इंतज़ार के लम्हें भटक रहे थे मेरे इर्द गिर्द, तुमने आकर उनको पूर्णता दे दी। मैं स्थिर हो चला हूँ अपने वक़्त में, तुमने अपनी उपस्थिति से मेरी स्थिरता को ठहराव दिया। हम नही...