संदेश

समाज लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दिसम्बर

कहीं कम्बल को तरसता है कहीं रोटी के लिए लड़ता है, कभी उतर आता है सड़कों पर किसी निर्भया के इंसाफ़ के लिए, खंगाल लेता है सारे ही जोड़ 'गर झुलस जाता है कभी गैस से। टूट पड़ता है किसी नापा...

अनुभव और आवश्यकताएँ

चित्र
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही, नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही|                                                - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़  Source - Parwarish Cares हाल ही में मैं 'लैंगिक साक्षरता' पर एक प्रशिक्षण में शामिल होने का अवसर मिला। जिसमें टीम आओ बात करें के लिए जुटे प्रतिभागियों के साथ हम सबने बहुत सी यादों और एक वातावरण को सबके साथ सह-निर्मित किया। उस वातावरण से ऊपजे माहौल में लोगों को 'सेक्स', 'यौन शोषण' और हमारे समाज की निषिद्ध चीजों के समूह पर बहुत ही आराम से बात करते देखना एक सुकून देने वाला अनुभव भी है। आओ बात करें की टीम ने मुझे अपने स्कूल शिक्षा के वर्तमान पाठ्यक्रम में 'सेक्स-एजुकेशन' और 'वैल्यू-बेस्ड-एजुकेशन' को समाहित करने वाले अपने विचार पर दृढ़ रहने का हौसला दिया है। हमारे समाज के कुछ सवेंदनशील लोगों द्वारा समय की आवाज़ को सुना जा रहा है और वे इस पर काम भी कर रहे हैं लेकिन समय की आवाज़ सुनना बाकियों के लिए भी आवश्यक हो गया है। हमें...

काफी नहीं होगा

मेरे आसुंओं पर बड़ा देना यूँ रुमाल काफी नहीं होगा, हर बार की तरहा मेरे ग़म बाँट लेना काफी नहीं होगा। वक़्त बाँटने की कीमतें आसमान छूने लगी हैं अब तो, सिर्फ एक शाम के लिए यहाँ आना ...

खुशियाँ, हम और दुनिया

चित्र
आकस्मिक चीज़ें जितनी खुशियाँ देती है, वह खुशी निर्धारित चीजों से कभी नहीं मिल पाती। 2 नवंबर को मिले एक व्हाट्सअप मैसेज ने पिछले 5 दिनों में जितनी खुशियाँ, हँसी और यादें दी हैं वह मुझे ढूँढने पर तो कभी भी नहीं मिलती।                              मैं पिछले दिनों दीवाली पर घर गया था वहाँ प्रदूषण, न्याय और राजनीति जैसे मुद्दों पर काफी चर्चा का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला, क्योंकि ये चर्चा युवा दोस्तों और गाँव के लोगों के बीच बैठकर हुई। ऐसी घटनाओं से यह विश्वास और भी गहरा जाता है कि बदलाव किया जा सकता है और वह भी लोगों के साथ मिलकर, युवा दोस्तों में बहुत ऊर्जा है जिसका उपयोग वह सही दिशा में करना चाह रहे हैं, मार्गदर्शन जिस तरह अपने सहयोगियों से मुझे मिलता रहा है यह कवायद अब गाँव में भी शुरू हुई है कि जिस किसी को भी कोई सहयोग चाहिए वह सबसे संपर्क स्थापित करे ताकि समय पर काम हो सके। गाँव की बदलती हवा ने मुझे अपने सपनों और ज्यादा दृढ़ता से देखने की हिम्मत दी है।    ...

हमारी जीवनशैली और दुनिया

चित्र
Source- Khabarindia.com यह ख़बर लगभग हर उस व्यक्ति को पता होगी जो खबरें पढ़ता है कि दिल्ली में १ से १० नवम्बर तक आपातकाल (प्रदुषण का आपातकाल) घोषित किया गया है क्योंकि वहाँ की हवा दुनिया की सबसे ख़राब हवा है जोकि न तो सुबह की सैर के लायक है और न ही एक गहरी साँस लेने के | इसका मुख्य कारण है आसपास के राज्यों में जलाये गए फसलों के अवशेष और वहाँ के वाहनों का धुआँ, फिर भी लोग केवल एक दूसरे पर आरोप लगाते दिखाई पड़ते हैं | जानकारी के लिए यह बता दूँ कि २ करोड़ की दिल्ली की आबादी के लिए १ करोड़ वाहन हैं, एकमात्र शहर जहाँ लोग स्टेटस के लिए निकल पड़ते हैं सड़कों पर बगैर यह सोचे कि कल क्या होगा!  हवा की खराब हालत को देखते हुए ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में केवल २ घंटे पटाखे जलाने का  आदेश दिया है और बाकि राज्यों से यह अपील की है कि वह कम से कम प्रदुषण की ओर कुछ कदम जरूर बढ़ाएं | Source-Bharatkhabar.com                          हर वह शख़्स जो इस अपील या आदेश जिस तरह भी इसे देखते हैं, यह जान लें कि केवल...

हम

चित्र
Source - Bharatkhabar.com पिछले हफ्ते गांव घूमने के लिए गया हुआ था, इस बार चुनावी चहल पहल के साथ साथ और भी कई सारी चीज़ों ने ध्यान आकर्षित किया। कुछ लोगों से उनके बच्चों के भविष्य के बारे में बातचीत हुई, जिसमें उन्होंने शिक्षा से उपजी बुराइयों और उनसे जुड़ी नकारात्मक चीज़ों का हवाला देते हुए यह ज़ाहिर किया कि वे अपने बच्चों को आगे की शिक्षा के लिए नहीं भेजना चाहते। गांव के लोगों का शिक्षा व्यवस्था के प्रति ऊपजता यह अविश्वास बेहद गंभीर विषय है, जिस पर हमें यानि कि युवा वर्ग को मंथन करने की ज़रुरत है कि किस तरह इस अविश्वास का समाधान किया जा सकता है और सरकार को हम किस तरह से प्रभावित कर सकते हैं! इसके बाद मेरी बातचीत के विषयों में राजनीति और सरकार की विभिन्न योजनाओं का भी हिस्सा रहा, जिसमें लोगों ने राजनीतिक दलों और साथ ही सरकार के प्रति अपने मतों को ज़ाहिर किया जिनमें उनका अविश्वास व्यवस्था के प्रति यहाँ भी झलका,अपनी आकांक्षाओं का अधूरा रहना किसे नहीं खलता! जिस तरह से लोगों ने सरकार की विभिन्न योजनाओं और कलापों का घटनाक्रम पिछले कुछ समय में देखा है,उनकी चिंताओं की फ़ेहरिस्त बढ़ती ही गयी ...

क्यूं नहीं.........अगर मैं

क्यूं प्यास ना बुझाई जाए अगर मैं समन्दर को पी सकता हूं, क्यूं सोया जाए जबरन गर मेरी आंखे तारों को देखना चाहती है, क्यूं बिखेर कर समेटा जाए किसी को अगर मैं कुछ संवारने की ताकत ...

वर्तमान भारत, गांधी और भगत सिंह

चित्र
बढ़ता है ये ग़ुबार क्यूं ? कैसा चलता यह कारवां ? ना आस कोई, ना साथ कोई, दिशाहीन पथ पर युवा, जिसने चाहा था अंतस से, स्वर्णिम भारत का सपना, बाँट के उसके नाम तले, गर्त में धकेल दी सब आस्था । Source- Google क्यूं नाम है होंठो पर भगत का ? क्यूं नहीं है उसके बोल अभी ? नकार दिया था उसने उनको भी, जो व्यर्थ पिटते थे ढोल कभी । कि क्रांति नहीं आये समाज को तोड़ने से, कि क्रांति नहीं आये लाशों को गिराने से, कि क्रांति नहीं आये व्यर्थ लहू बहाने से, राजगुरु-सुखदेव संग क़ुरबानी दी उसने, पर देखकर केवल एक ख्व़ाब कि आये क्रांति तो विचारों में, कि आये क्रांति तो कामों में, कि आये क्रांति तो ज़बानों में । यहाँ बैठे हैं अब भगत के नाम के इतने ठेकेदार, क्रांति शब्द से अनभिज्ञ हैं, हैं सारे के सारे गद्दार । रुकता क्यूं नहीं ये सिलसिला मंदिर-मस्जिद के जाप का, घर की माता-बहनें रोती और ये ठेका लेते हैं एक गाय का, अपनी स्त्री के जीवन को बना के बैठे हैं सब नरक यहाँ, किन्तु मुरादों के लालच में, जाते वैष्णों देवी और मक्का । क्यों नाम है होंठो पर गाँधी का ? क्यों नहीं उतरता जेहन में ? गाँ...

दिल के खालीपन का इश्तेहार

दिल के खालीपन का इश्तेहार यूं लगा रखा है, सारे शहर को उसकी अगुवानी में लगा रखा है । मुश्किलों से मुलाक़ात भी होती रहती है लेकिन, अभी मैंने ध्यान अपना बस उनपे लगा रखा है । वो है...

सुनना

हर कहानी की एक आंख होती है, काश हर कहानी के दो कान हो ।                                       - नागेश                     हर कहानी लिखित रूप लेने से पहले सुनी जाती है स्वयं लेखक ...

क्यों

अग्नि परीक्षा की ज्वाला में जलती हर बार सीता ही क्यों, देती है स्वयं जलकर अपने होने का प्रमाण क्यों । भय के समाज से तजता है राम उसको, कितने ही वचनों को तोड़ रघुकुल की रीति निभ...

ज़रूरत नहीं

खुशियों के बहानों को तुम्हारे तुम्हें भुलाने की ज़रुरत नहीं, हंसी के अंदाज़ को अपने छुपाने की ज़रुरत नहीं । जैसी ज़िन्दगी तुमने गुज़ारी है अब तक, वैसे ही आगे जियोगी तो बेहतर होग...

घूमते हुए

        जरूरी नहीं कि हमारे आसपास की हर चीज सही हो, कुछ परिस्थितियां होती है जिनमें हमें खुद को उनके अनुरूप या उनको हमारे अनुकूल बनाना पड़ता है । अक्सर हम ये मान लेते हैं कि परिस्थितियों के अनुकूल हो जाना ज्यादा ठीक रहेगा लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि वर्तमान समय के जाने कितने ही मुद्दे और समस्याओं के अनुरूप हम खुद को एक क्या पूरे दस जीवन में भी नहीं ढाल सकेंगे । जब भी कभी   घुमने निकलता हूँ तो कुछ मुद्दे अनायास ही मुझे आ-पकड़ते हैं और मैं उनसे उलझा रहता हूँ, उनसे निरंतर, हर बार, हर सफ़र पर झगड़ते हुए इतना तो समझ आता है कि अगर हर व्यक्ति केवल खुद गंभीर होकर बस एक दफा उनका ख्याल करे तो यह तय है कि इन समस्याओं का एक आम समाधान निकल सकता है । यह समाधान चाहता है कि “शुरुआत जो भी हो स्वयं से हो अन्यथा न हो”, वैसे देखा जाये तो आज के समय में ऐसे मामले गाँधीवादी विचारधारा से अत्यधिक सरलता से सुलझाये जा सकते हैं बजाय कि इन्हें व्यर्थ मतलब की आंच पर सेंकने के ।                 ...

फूल

माना कि इस देश में कीचड़ है, और कीचड़ में कमल खिलता है, लेकिन एक सीमित अवधि तक; कमल के सिरे ने अब फड़फड़ाना शुरू किया है उसे आभास हो चला है कि जड़ें सड़ांध मारने लगी है, लेकिन मृत्...

ग़ुलामियत का कक्ष

हम सब जड़ हो चुके हैं और देख रहे हैं अपलक उस श्वेतपत की ओर, जंहा आजाद है कुछ काले वर्ण, जो हमें अपना ग़ुलाम बनाए हुए हैं हमारी सोच भी सिमट चुकी है अब उन्हीं के इर्द-गिर्द ही |   कमरे में खिड़की तो है लेकिन दृश्य के लिए ना कि दर्शन को, विचारों को तो बंदी बना चूका है वो उपाधिधारक, जिसके समक्ष हमारी सोच कठपुतली बनी हुई है | और हम सब झुझ रहें हैं, एक अदृश्य युद्ध से जो छिड़ा है हमारी आवाज़ और सोच के बीच | मजबूर हैं वे लोग जिन्हें किताबों ने कैद कर लिया है, कुछ नज़र नहीं आ रहा है उन्हें ऐसे ही वे अंधे ठोकर खाकर मार दिए जायेंगे |   सहसा मुझे दिखाई पड़ता है वह मजबूर वृक्ष, जो हाथ जोड़े खड़ा था मानव के समक्ष, फिर भी उसकी सांसें थामकर इस कक्ष को आकार दिया गया है |   मैं अब चाहता हूँ कि किताब के पीछे की मासूमियत को पहचाना जाये, ढूंढ लिया जाये वो दर्द जो अब तक अनदेखा किया गया विचारों की पराधीनता के चलते, उतार दिया जाये वो असहनीय बोझ, जिसको हम सब   ...

ख़ामोश

जुबान तुम्हारी काटना किसी के बस का नहीं, मगर फिर भी तुम चुपचाप तमाशा देखते हो । यह जो आजकल बहुत बोलता है ना, एक रात यही कतर जाएगा तुम्हारे कान; और फिर तुम सब ख़ामोश हो जाओगे ।  ...

फिर मैं कविता लिखता हूँ ।

इन अंधियारों के बाहर जाकर मैं अंधियारों में झांकता हूँ, उन दरवाजों के भीतर जाकर मैं दरवाजों में देखता हूँ, तुम जो चाह रहे हो सुनना कभी ना तुमसे कहता हूँ, निकलकर खुद से बाहर फिर मैं कविता लिखता हूँ | टूटे हुए को जोड़कर फिर नए सिरे से चुनता हूँ, समेटकर बिखरे हुए इंसान   नित नए खिलोनें बुनता हूँ, जिनको कर दिया है विलुप्त तुमने बच्चों के बचपन से, छीन लिया जिनको तुमने अपने वजूद के सपनों से, मत ग्रास करों यूँ इनको एक बच्चा बन यह कहता हूँ, पाकर सब कुछ खो देता जब फिर मैं कविता लिखता हूँ | तुमको वाजिब लगता है यूँ उठाना सवाल मेरे शब्दों पर, पूछता हूँ मैंने कब कहे हैं कोई शब्द ही अपने कथनों में, बन चूके ग़ुलाम तुम औरों के इस क़दर के खुद को भूल गए, ना देख पाए आईना भी तुम फिर मुरझाये से फूल हुए, अब भी नहीं कहता हूँ तुमसे बस खुद को यह समझाता हूँ, जुड़ जाता हूँ बिखरकर जब फिर मैं कविता लिखता हूँ |                                 .....कमलेश.....