संदेश

शाम लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अतीत की खिड़की में - २

चित्र
Source - Pinterest.com           सा गर ने अक्टूबर की शुरुआत इंडिया हेबिटेट सेंटर से की , उसकी अनिश्चितताएं उसे कहाँ ले जा रही थी यह सागर को कभी जानने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। इधर हीर ने अक्टूबर का स्वागत अपने अंदाज़ में ही किया , कई सारे सफ़र , नई दोस्तियाँ और अकस्मात सी मुलाक़ातें। दिन जितनी जल्दी गुज़रना चाहिए उतनी जल्दी अगर वाकई में गुज़रे तो ऐसा लगता है कि हम हवा के झोंके से उड़े जा रहे हैं लेकिन ऐसा कुछ भी न तो हीर और न ही सागर के साथ हो रहा था। हवाएँ अपनी रफ़्तार के साथ कभी सागर को कल से आज तो कभी हीर को आज से कल में ले जा रही थी और वापिस लेकर भी आ रही थी। अक्टूबर की रातें सागर के लिए चाँदनी और पुरानी यादों का एक बॉक्स लेकर आई जब घर जाने के लिए ट्रेन में बैठकर सबसे पहले उसने उसकी खिड़की से बाहर झाँका। सागर अपने गाँव और वहाँ की हर चीज़ को बहुत ही बेचैनी भरे दिल में एक बार फिर सँजोना चाह रहा था , इस बार सागर अपने दोस्तों , पीछे छूट गए रिश्तों और अपनी पसंदीदा जगहों को फिर से मिला और जब वह 10 दिन बाद वापस आने लगा तो एक छोटे से सवाल का सामना उसने किया जो उसकी 3 ...

जब तुम्हारी याद आती है...

भूख,प्यास, भावनाएँ, सब भूल जाता हूँ, और नींद, जागना, सपने, ख्यालों को भी भूल जाता हूँ, जब मुझे तुम्हारी याद आती है... साँसे रहती हैं वहीं की वहीं, कदम ठहर जाते हैं सड़कों पर चलते हुए, रूक जाता हूँ मैं ख़ुद को लिखते हुए मौन हो जाता हूँ किसी गीत को गाते, जब तुम्हारी याद आती है मुझे... निकलता हूँ जब अपना चोला उतारकर जंगल की राह पर, देखता हूँ उसके दरख्त और सब्ज़ जमीं को तब पंछियों के चहचहाने में ढलते सूरज की रोशनी में, एक अक्स दिखाई पड़ता है वहाँ; जब मुझे तुम्हारी याद आती है... शाम के ढलते साये में जब टिका लेता हूँ अपनी पीठ उम्मीदों के घर की छत पर बनी मुंडेर से, टिमटिमाता है रात का पहला तारा आसमान के किसी कोने में, निकल आता है चाँद अचानक से, और बदल जाता है मौसम मेरे हालातों का जब तुम्हारी याद आती है मुझे...                                       - कमलेश