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ज़िन्दगी का केंद्र

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ज़िन्दगी के अच्छे खासे दौड़ते-भागते दिन जब बिस्तर पर बीतने लगे तो लगता है बहती नदी पर पलक झपकते बाँध बना दिया हो. काम करने का सलीका अचानक से ऑफिस बैग से निकलकर पूरे कमरे में पसर जाता है. अंगुलियाँ अनगिनत चहलकदमी करती हुई अपने होने के वजूद को किसी मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर के की-बोर्ड पर खपा देती हैं. ऐसे वक़्त में मौसम के बदलते मिजाज़ का अंतर्मन से कोई भी नाता नहीं पनपता और न ही किसी ख़ूबसूरत कली को देखकर दिल में कोई हूक उठती है. उठता है तो बस एक निरा खालीपन जो एक लम्बे वक़्त से बाहर से बोलते लेकिन अन्दर से ख़ामोश शरीर में घर कर चुका होता है. इस दुनिया में हर रोज़ धुलते हैं अनगिनत चेहरे और सजते हैं उतने ही अधर किसी प्रिय के चुम्बन की आस में, लेकिन कितने चेहरों का दीदार किया जाता है और कितने ही होंठ चुम्बन के बाद मुतमइन हो पाते हैं! यह सवाल कोई नहीं करना चाहता कि उसके जीवन में प्रेम है या नहीं लेकिन कामों की फ़ेहरिस्त कितनी घटा दी है एक ही कुर्सी पर कमर की सारी भावनाओं को क़त्ल करते हुए यह सब को ज्ञात है.             ...

आईना देखो – ख़ुद से एक मुलाक़ात

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इन्कलाब आएगा रफ़्तार से मायूस न हो, बहुत आहिस्ता नहीं है जो बहुत तेज़ नहीं..                                         -अली सरदार जाफ़री                                    कितनी खूबसूरती से जाफ़री साहब ने बदलाव की गति को भी परिभाषित कर दिया अपने इस शेर में, जब सफर शुरु होता है किसी बदलाव का तो आरम्भ बड़ा ही पेचीदा और अनसुलझा हुआ दिखाई पड़ता है लेकिन जरुरत होती है उसके साथ ज्यादा से ज्यादा वक़्त गुजारने की. यह वक़्त मेरी ज़िन्दगी में आया आईना देखो के रूप में, मेरा गाँव मेरी दुनिया के साथ जब इस यात्रा का हिस्सा बना था तब केवल यही मन में था कि सीखने की यह यात्रा ऐसे ही अनवरत चलती रहे और बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा बनकर में कितन...

ख़ामोश

जुबान तुम्हारी काटना किसी के बस का नहीं, मगर फिर भी तुम चुपचाप तमाशा देखते हो । यह जो आजकल बहुत बोलता है ना, एक रात यही कतर जाएगा तुम्हारे कान; और फिर तुम सब ख़ामोश हो जाओगे ।  ...