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संवाद – बात से साथ का सफ़र

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       इस दुनिया को कान की ज़रूरत है          लेकिन हर कोई बस बोलना चाहता है... यह कथन दो तरीकों से किस तरह देखा जा सकता है, बस उस देखने के तरीके की प्रक्रिया का नाम संवाद है. हर किसी के पास इतनी कहानियाँ है कि लिखते लिखते सारे पन्ने भरे जा सकते हैं और हर कोई उतना ही उत्सुक और आतुर है कि किसी और की कहानी सुनने के लिए उसके पास धैर्य नहीं है. ज़िन्दगी की राहों से पनपती कहानियाँ और उनसे जन्म लेते हुए हर पल के किस्से और किस्सों से उपजा खालीपन, मानसिक असंतुलन इतना बढ़ जाता है कि इंसान भूल जाता है उसे जीना किस तरह है!       संवाद की प्रक्रिया में ठहराव और स्थिरता है ज़िन्दगी की रफ़्तार को समझने के लिए वक़्त प्रदान करती हुई. कानों और दिमाग को कितने आराम की ज़रूरत है इस बात का ख़याल शायद उम्र भर किसी को नहीं आता क्योंकि हर कोई, बस रोज़ भागने वाले हाथ और पैर को आराम देना चाहता है. संवाद की शुरुआत जिस मौन के साथ हुई उसने मुझे इस बात का सन्देश दिया कि अभी मेरे पास काफी वक़्त है जो मैं अपने सवालों के साथ बिता ...

मैं चाहता हूँ

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मुतमइन रहता था एक शख़्स, जब अपनी आँखों के आगे वह देखता था घने दरख़्त औ' सब्ज़ ज़मीं, एक रात थोड़ी ठहर कर गुज़री ऐसे उसे कोई सपन तक न आ पाया, सुबह तक दरख़्त औ' ज़मीं गर्दन तलक पानी में डूब चूके थे। गुहार लगाता भी तो वह किस से? जो थे सुनने वाले उन्हीं ने डैम के दरवाज़े साहब के कहने पर खुलवाये थे। Source - Imperiya.by अपने मुस्तक़बिल पर रोती है इक औरत पुराणों में जिसको वसुधा कहा है हमने, एक बार भी नहीं सोचते अब हम कि वासना का हमारी अंजाम किस दिशा से लौटकर आने वाला है! दिल थाम कर बैठिये अभी तो दिल्ली धुआँ हुई है, कल समंदर आपके घर का भी पता पूछने आएगा। वह रो रहा था कल नदी के किनारे बैठा कि मंदिर का फैसला जनवरी में आएगा, उसे तो यह तक याद नहीं कि ख़ुद उसने अपने पिता से ठीक से बात कब की थी? नाम बदलता है कोई करोड़ों में मेरे शहर का, जाकर देखे तो सही कोई रात में जे.जे. कॉलोनी का मंज़र, मज़ाल जो अगली सुबह हलक़ से निवाला उतर जाए! एक बिल्ली को पत्ते खिलाकर पालता है ख़ुद लोथड़े खाता इक परिवार, मैं जानता हूँ जिस दिन वह बंदर बच्चे के हाथ से रोटी छीनकर भागेगा, तब समझ में ...

मेरे तीसरे से पहले

आंखों की थकी पलकों पर सपनों की चिता सुलगने से पहले, उन्हें अपने बच्चों के रंगीन कपड़ों पर टांक देना पूरी नज़ाकत से, जिससे उसकी ख़ुशी वे ढूंढ सकें। होंठो पर आई प्यास के कारण ...

समय

कभी कभी मैं सोचता हूं कि ये दुनिया हमेशा से गोल नहीं थी, इंसान ने अपनी ज़रूरत से इसे गोल किया । वक़्त की जेल में बंद इंसान भविष्य की पूंछ पकड़े, अतीत की बेड़ियों में जकड़े, वर्...

इतिहास, दोहराव और बदलाव

प्रेम में चीज़ें स्थिर होने लगती है लेकिन अगर उन्हें बदलने की जुगत भिड़ाई जाए तो वे टूट जाती है, प्रेम को बदलाव पसंद है इसके बावजूद भी प्रेम हमें स्थिरता प्रदान करता है । प्...

अंतर और समानताएं

किन्हीं दो चीजों में अंतर का ना होना, उनको कभी भी समान नहीं बना पाया । ठीक उसी प्रकार कि जैसे किसी दो चीज़ों के समान होने पर भी, उनमें खोज लिया गया कोई एक अंतर । इतनी अनेकताएं ह...