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आभार, ज़िन्दगी और मैं -

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हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां हर कोई अपने जीवन में किसी न किसी चीज का पीछा कर रहा है। एक स्थान से दुसरे की ओर बढ़ने की इस यात्रा में हम अपनी भावनाओं, जरूरतों, लालच, आकांक्षाओं और अन्य कई चीजों के साथ काम करते हैं, जिसके परिणाम में हम आनंद, खुशी, तनाव, दुःख, दबाव, क्रोध, शांति, दोष, कृतज्ञता जैसी कई सारी भावनाओं को महसूस करते हैं। मैं कुछ साल पहले स्वामी विवेकानंद को पढ़ रहा था, उन्होंने अपने एक भाषण में कहीं उल्लेख किया था कि दोषारोपण का खेल खेलने के बजाय हम एक बार ठहर कर यह देख सकते हैं कि हमारे भीतर से निकलने वाली हर चीज का स्रोत क्या है! यह विचार मुझे बहुत ताकत देता रहा जब मैं अपनी सीमाओं को पार कर रहा था और लोगों की कहानियों के साथ अपने व्यक्तिगत विकास के लिए एक रास्ता खोज रहा था। दो साल पहले एक आवासीय कार्यक्रम के दौरान, मुझे आभार व्यक्त करने की ताकत का एहसास हुआ कि यह उस दुनिया में जादू कैसे पैदा कर सकता है जिससे हम जीना चाह रहे हैं! डेढ़ साल से, मैं कृतज्ञता के कुछ छोटे छोटे अभ्यास कर रहा हूं, जिनसे मैं सड़कों पर चलते हुए, किताबें पढ़ते हुए और दोस्तों के साथ भोजन करते हुए प…

खुशियों का रास्ता

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खुशियों का रास्ता दिल की राहों से होकर जब घर की दहलीज़ पर पहुँच जाए तो लगता है कि ज़िन्दगी में ठहराव और प्रेम एक साथ जिया जा सकता है. वक़्त से कोई कितना कुछ माँगेगा जब वह अपने मूल्यों पर जीते हुए वे सारे सवाल और रिश्ते सुलझा ले जिनसे जीवन के रास्ते छाँव और सुकून से भर जाया करते हैं. मैं पिछले महीने दीवाली के लिए घर पर था और यह मेरी दिल्ली आने के बाद की सबसे लम्बी घर पर बिताई हुई छुट्टियाँ थीं। इस बार जब मैं घर पहुँचा, तो कुछ ऐसा था जो मुझे हर क्षण कहता रहा कि यह समय ख़ास है और मैं इसे और अधिक सुंदर बना सकता हूँ वह भी मेरे प्रेम और समर्पण के तरीकों से. इस दफ़ा यह पहली बार हुआ कि मैंने अपने परिवार के लगभग सभी सदस्यों के साथ यादगार बातचीत की, चाहे फिर वह मेरी पापा के साथ हुई बातचीत हो या मम्मी या भईया-भाभी के साथ जीवन यात्रा के किस्से सुनना और सुनाने वाला समय. सब कुछ इतना सहज और सुन्दर था कि सिर्फ वक़्त के बहाव में पूर्णता के साथ संतुष्ट कर देने वाले स्तर तक स्थापित हो गया. एक बात मैं जीवन के इस पड़ाव पर अपने प्रेम की ताकत के साथ स्वीकारना सीख गया हूँ कि एक समय ऐसा भी रहा है जीवन में जब मैं आज …

मुलाकातें, यात्रा और प्रेम

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मुलाकातें हमेशा ही खूबसूरती की नींव रखती है. तकरीबन ३ सालों के बाद राहों ने मुझे इंदौर की गलियों से रूबरू करवाया और दिल की तमाम ख्वाहिशों का ज़खीरा अपने पूरेपन के एहसास में खोकर लौटा. पिछले ३ साल मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से काफी अहम और प्रेरणादायी रहे हैं, जितना कुछ इन वर्षों ने दिया है वह अमूल्य है. इन राहों के सफ़र में कुछ दोस्त अपनी राह पर चलकर इस खूबसुरत शहर आ चुके थे, जिनसे मिलने की फिराक़ में मैं यहाँ पहुँच गया. दोस्तों के साथ बैठकर अपने और उनके जीवन की यात्रा के बारे में जानना और उनके अंतर्मन को सुनना मेरे लिए एक नए आसमान के द्वार खोलने जैसा अनुभव रहा है. चाहे फिर रिंग रोड पर विवेक और गजेन्द्र के साथ काम और व्यक्तिगत जीवन की बाते हों या फिर उनके जीवन के ३ वर्षों में बीते हुए वसंत का किस्सा: गजेन्द्र और विवेक को ३ सालों के बाद मिलना और उनमें आये हुए बदलाव का साक्षी बनना मेरे लिए सौभाग्य से कम नहीं है. ऐसी मुलाक़ातें वक़्त को कीमती बनाती हैं.   नवोदय के साथी रहे शिवपाल, जितेन्द्र और ईश्वर के साथ का वक़्त अपनी अलग छाप रखता है और यह एहसास एक सुकून देता है कि साथी अपने दिल की आवाज़ को सुनना च…

तुम्हारा अस्तित्व

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यह दुनिया छोटी लगने लगी है मुझको,
एक  शख्स पर इतना ठहर गया हूँ  मैं!
- नागेश
इंतज़ार की परिभाषा को मैं, उसकी आँखों को देखने के बाद हाशिये पर रख देता हूँ। इतना बड़ा आसमान लेकिन फिर भी अपने आप तक पहुँचने के लिए उसके पास कोई तरीका नहीं है, मैं रख देता हूँ अपना सर उसके हाथों में और मिल जाता हूँ ख़ुद से उसके ज़रिये। वह ठहरती है दो पल के भ्रम में दो पहर तक तो ऐसा लगता है दिन को थोड़ा और बड़ा होना चाहिए। मैं जब भी उसके क़रीब होता हूँ मुझे यह दुनिया ऊन का गोला लगती है जिससे मेरी चाह है कि इसका स्वेटर बुनकर चाँद को ओढ़ाया जाए। एक ख़याल को जीते हुए इतना अरसा हो गया मुझे, आज जब उसे पीछे छोड़ा तो वह उसके बालों में लिपटे क्लिप तरह इतराता हुआ दौड़ पड़ा मेरी ओर। इतना दूर आ चूका हूँ चलते चलते कि अब लौटने के लिए मुझे पते की नहीं किसी के क़दमों के निशां की ज़रूरत है, वह भी छोड़ जाती है अपनी ख़ुशबू बजाय पैरों के निशां के। अर्जुन ने गीता को युद्ध-भूमि में सुनकर वैराग्य पा लिया था, मैं उसके प्रेम की धरा पर पहुँचकर मोक्ष का सुख प्राप्त कर लेता हूँ। मैंने जब ज़िन्दगी को प्रेम सुनाया तो उसके चुम्बन की व्याख्या में ही सारे ग्रन…

मैं और ख़्वाब

मैं देख रहा हूँ खिड़की से लटकते
इन सारे अधूरे अजनबी ख़्वाबों को,
ये सपने जो कभी मेरे नहीं रहे
ये लोग जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा,
अचानक से किसी रोज़ आएँगे मेरे शहर
और माँगेगे अपनी हक़ीक़त के सवालों के जवाब;
मैं रहूँगा उसी तरह ख़ामोश
जिस तरह अपने ख़्वाब के खोने पर हो जाता हूँ,
तब मैं याद करुँगा वो सारे क़िस्से,
जो ख़्वाब को फिर देखने के लिए
सुनाए थे मैंने ख़ुद को पास बैठाकर।मैं नहीं जानता
कि कोई क्या चाहता है मुझसे,
मैं जानता हूँ केवल इतना ही
कि ढूँढ लेगी मेरी राहें
हर उस पल को,
हर उस शख़्स को,
जहाँ तक मुझे पहुँचना लिखा है।
                                      - कमलेश

हमारा प्रेम में होना

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रास्तों के पड़ाव ज़िन्दगी के मायने समझाते हैं और मैं हमेशा से ऐसे पड़ावों की तलाश में रहा। तुम आयी मेरी राहों के लिए एक ऐसा ही पड़ाव बनकर जिसने मुझे थाम लिया अपने सारे रंगों और खुशबुओं के साथ। तुम्हारा साथ रहना मुझे एक नएपन के एहसास से भर देता है। जब तुम थामती हो मेरा हाथ तो मैं अपने आप को गंगा में खड़ा हुआ महसूस करता हूँ। मैं नहीं जानता कि हम कब तक इस तरह शहर के कोनों में मिलते रहेंगे लेकिन इतना यक़ीन ज़रूर है कि हमारे मिलने में प्रेम और विश्वास की खुशबू हर वक़्त आती रहेगी। तुम्हारा सवाल करना मुझे तुरंत सारे आसमानों से ज़मीन पर ले आता है, जब तुम खिलकर अपना ख़्वाब पूरा कर लेती हो तो लगता है कि मोक्ष का मज़ा फीका पड़ जाएगा।
       तुम्हारे दाहिने चलते रहने पर हवाओं ने मुझे महसूस करवाया कि हम कितने कीमती हैं एक दूसरे के लिए! ज़िन्दगी की उम्र तो नहीं पता लेकिन इसके रहने न रहने पर हम एक दूसरे को जीते रहेंगे इतना ज़रूर जानते हैं। जब तुम हँसती हो तो दिल करता है कि पहाड़ों में बर्फ़ गिरने लगे और मैं तुम्हारे साथ उसको निहारता रहूँ। जब जब तुम अपने गले से मुझको लगा लेती हो मेरे जवाबों की धुंध में तो ऐसा लगता है…

ज़िन्दगी और प्रेम की जोड़ी

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जब ज़िन्दगी की शुरुआत होती है, तब हमारे पास अपने रिश्ते चुनने का कोई विकल्प नहीं होता, लेकिन ज़िन्दगी के रफ़्तार पकड़ने के बाद भी शायद हमारे पास वह विकल्प नहीं होता. अटपटा लग सकता है सुनने में लेकिन हकीक़त यही है कि हम कोई भी रिश्ता नहीं चुनते अपनी ज़िन्दगी में, रिश्ते हमको चुनते हैं उनको जीने के लिए.
भावनाओं का समंदर कितना गहरा है कोई नहीं जानता फिर भी सब डुबकियाँ लगाते हैं, हम नहीं जानते कि हमारी एक मुस्कान या एक शब्द किसी के जीवन में क्या बदलाव ला सकता है. ज़िन्दगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन जितना कुछ इसके साथ रहकर सीखा है वह बहुत कमाल का है. रास्ते अपनी पहचान हमसे तब तक छुपाते हैं जब तक हम समर्पण न कर दें और समर्पण का पौधा विश्वास के बीज के बिना कभी भी नहीं उग सकता. विश्वास और समर्पण जब एक-दूजे में समाते हैं तब प्रेम पैदा होता है और प्रेम अपने कई स्वरुप में हमसे हर रोज़ बहता है.
प्रेम का बहाव हमारी बातों से शुरु होकर हमारे मौन पर रुकता है या शायद वहाँ भी न रुकता हो: कौन जानता है कि सच्चाई क्या है! जब रिश्तों के धागे अपने सही रास्ते पर होते हैं तब ज़िन्दगी में खू…

कृष्ण

तुम्हारे हँसने पर गर'
तुम्हारी खिलखिलाहट में गूँजे वंशी,
तो दुनिया से कह दूँ
कि कृष्ण इंतज़ार में है तुम्हारे।रुक जाने पर तुम्हारे
बैरागी हो जाएँ जो ये हवाएँ,
तुम जान जाओगी
कि वृंदावन सिर्फ वृंदावन तक सीमित नहीं।ब्रह्मांड की असीम कालिमा से
जल उठेगा उस दिन एक दीपक,
जब वक़्त लिख देगा
विश्व के लिए एक और गीता।तुम जब जब करीब होती हो
यह इंद्र रूठ जाता है मुझसे,
तब मन करता है
कि इसके विरोध में गोवर्धन उठा लूँ।प्रेम के ढाई अक्षरों में छुपा मोक्ष,
नहीं जान पाएगी यह दुनिया
इतनी आसानी से;
मैं तब खोकर अपना स्वरूप
पी लूँगा शिव की तरह
तमाम नफ़रत और द्वेष दुनिया का,
और बन जाऊँगा अमर
लेकिन इस बार
मेरा उपनाम 'नीलकंठ' नहीं 'कृष्ण' होगा।
                                                - कमलेश

तुम

तुम,इसके सिवा कोई शब्द क्यों नहीं है दुनिया में कि जिसके उपयोग से तुम्हारे संबोधन को चरितार्थ करूँ मैं! तुम्हारा अस्तित्व उस नीम के पेड़ सा है जिसे मैं अपनी सेहत, सीरत और आराम के लिए चाहता हूँ, शायद तुम नहीं जानती किसी बात को, यह कहना झूठ नहीं है क्योंकि तुम वाकई नहीं जान पाओगी कभी कि ढाई अक्षरों के एक शब्द में कैसे मैंने अपनी दुनिया और उसकी सारी ख़्वाहिशें सजा रखी है।मेरी ख़्वाहिश है कि तुम न जानो उसे, जब तुम बैठो सुकून की गोद में तो अपने हाथों की कोमलता उस शब्द के माथे को सहलाने के लिए बचा कर रखना:ताकि तुम परिभाषा के रिवाज़ परे रखकर, पहुँच सको ब्रह्माण्ड के उस कोने में जहाँ दो आँखों, अनगिनत ख़्वाहिशों, बच्चों और पेड़ की दुनिया रहती है।
                                                      - कमलेश

प्रेम और हम

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वो मिली थी मुझसे जब पहली दफा तो कभी सोचा नहीं था उसने कि यहाँ तक पहुंच जाएगी ज़िन्दगी ख़्वाबों के पहियों पर दौड़ते हुए, और न ही मैंने कभी ऐसा पुलाव पकाया था अपने दिल में। वो खिलखिलाती है तो सोचता हूँ कि सारी दुनिया को म्यूट पर डाल दूँ। ऐसी ही एक हँसी ने खींच लिया मुझको उस तक, और तब से मैं बस खिंचता चला जा रहा हूँ, कहाँ! यह अब तक रहस्य है। मैंने कहा था उससे कि मेरा इंतज़ार करते हुए पीपल के नीचे न खड़ी रहे, लेकिन उसने मेरी एक न सुनी, उसके न सुनने को प्रकृति ने इतनी गंभीरता से लिया कि जब भी मिलता हूँ उससे वो पीपल के पेड़ के पास ही मिलती है। पहाड़ों ने मुझे इतने ख़त लिखे लेकिन मैं उनके जवाब देने में आलस ही करता रहा ताउम्र, पिछले दिनों उसने ख़त लिखा मुझे और भेजा पहाड़ों के ज़रिए। पहाड़ इस बार मुझे उठा ही ले गया अपने जवाबों की ख़्वाहिश में, ज़िन्दगी ने भी समर्पण करते हुए समूचा दायित्व खुला छोड़ दिया प्रकृति के जिम्मे। 

        एक रात सड़क पर चलते हुए जब मैं किसी आवाज़ को सुनकर रुक गया तो उसने हाथ थाम लिया मेरा हौले से आकर, मैंने नज़रें उठाई ऊपर और मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया: हम पीपल के नीचे पहुँच गए थे। कु…

इंतज़ार और तुम

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तुम देखती हो थोड़ी सी गर्दन झुकाकर मेरी ओर तो ऐसा लगता है कि सूरजमुखी देख रहा है सूरज को। सातों आसमान के पार से जब गूँजता है तुम्हारा स्वर तो इतनी ज्यादा ख़ुशी होती है कि मैं जून में भी नंगे पैर चल लेता हूँ। तुम मिली इस दफा मुझे पहाड़ों की गोद में, जहाँ मुझे कई जन्मों से आना था शायद: वहाँ आकर तो यही लगा था मुझे, तो घर वापसी जैसा भाव पैदा हो गया। तुम्हारे साथ प्रकृति को इतना सहज पाता हूँ जैसे कि किसी ने इसकी जंज़ीरें खोल दी हों, तुम खिल उठती हो जब पानी की चंद बूँदों से तो मेरा मन करता है कि उतार दूँ बादलों का तमाम पानी जो तुम तक पहुँच कर अपना जीवन सफल कर ले। जिस तरह दुनिया संजो रही है सारे सूत्र और समीकरण, मुझे ऐसा लगता है उसने तुम्हें पहचाना ही नहीं अब तक, कभी कभी जी करता है कि बिग बैंग थ्योरी वाले वैज्ञानिक को तुमसे मिलाऊँ, ताकि वो अपनी भूल सुधार सके। तुम्हारे साथ रहता हूँ तो अकेलेपन के सारे सिद्धांत मुझे खोखले लगते हैं, तुम जब डर जाती हो किसी जानवर से, उससे अपना प्रेम जाहिर करते हुए तो तुम्हें भँवरा बनकर छेड़ने को जी करता है। 
          उस दिन जितनी सहजता और ध्यान से तुमको स्कूटी चलाते …

ज़िन्दगी का पर्याय - घर

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ज़िन्दगी के रास्तों में
ख्वाबों की खटपट जारी है
पिताजी जब घर से फ़ोन करते हैं,
तो चेहरे पर मुस्कान तारी होती है
और दिल में एक नया ख्याल पनपता है,
बहुत दिन हुए माँ की आवाज़ सुने भी;
सपने तो सारी दुनिया एक जैसे देखती है,
बस चलते हुए घड़ी का वक़्त हाथ में नहीं रहता। मैं खींच रहा हूँ,
पेड़ की जड़ में अटकी रस्सी
घर की ख्वाहिश है कि देखे मेरी सूरत,
मैं लेकिन लिपट कर सोना चाहता हूँ
दादाजी के पुराने कम्बल से; चार नए आम के पेड़
भैया-भाभी ने लगा दिए हैं घर के आगे,
बस पिताजी और माँ के साथ
नीम के नीचे रखे तख़्त पर बैठ चाय पीना बाकी है:
कुछ रातें चूल्हे के सामने बैठकर,
बतियाना चाहता हूँ जी भरकर भैया-भाभी से। बच्चों के साथ मिट्टी में खेलते हुए
खुद को भुला देना चाहता हूँ,
आम तोड़ने हैं कभी उचककर मुझको
जब कोई ज़िद करे कि आम चाहिए उसे।
ज़िन्दगी से चार ख़्वाब
मैं अपने हक़ की तरह ले लूँगा,
आम, नीम, चाय, तख़्त और बातें
मेरे बच्चों से ले लिया है मैंने ये उधार,
प्रेम की परछाईयाँ
जो खनकती है मेरे पहलुओं में,
चाहता हूँ कि मुझे चाँद की तरह देखने वाली
लड़की के हिस्से में भी बराबरी से बिखरे:
घड़ी के रुकने से पहले
सुकून से घर ल…

वसीयतनामा

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किसी भी सफ़र के समय दो भागों में बँट जाती है दुनिया, मैं बन जाता हूँ दर्शक ताकि बचा हिस्सा दर्शन हो जाये, दार्शनिक का कोई अस्तित्व नहीं कहानी में:
सब ढूँढ रहे हैं खुलापन पैरों में जंज़ीरों को ढोते हुए, उजाला दीखता तो है आँखों में पलकों में जमे हुए अँधेरे के पीछे।
मैं चलता हूँ आसमाँ के नीचे जो घूरता है हर कदम मुझे, साथ चल रही लड़की कहती है दूर जाते हो तुम तो आँखों में बादल छा जाते हैं, मैं कहता हूँ  हाँफती धरती और घूरता आसमान, मौन से प्रतिपल होता संवाद और पलकों में लिपटा इंतज़ार प्रेम का दूसरा नाम है।


दो हिस्सों में बँटते से सफ़र में झाँकता हूँ खिड़की से बाहर, तो दुनिया दीखती है नई सी जहाँ इंसान की कमी लगातार बढ़ रही है जहाँ सपनों का अकाल चल रहा है, मेरे हमनफ़स मेरे वसीयतनामे में मिलेंगे दो नाम: पहाड़ की गोद में बसा जंगल और मोर पंख रख पाओ सहेजकर तो रखना।                                           - कमलेश

महा मिलन

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दिवास्वप्न लगती हुई वह
रात जुगनुओं ने पा ली, साँझ के अंतिम क्षणों को बींध कर माला बना ली: उस क्षणिक सी चाँदनी में पाते रहे सब स्वर्ण रत्न अस्तित्व खोते उन अधर का बढ़ता घटता सा जतन।
पूर्णिमा का दूजा चाँद चल दिया पूर्ण से शून्य को बाँधे रहे समूची राह में दो हाथ अपने दो हाथ को: नित् खोते रहे दोनों ही तन  पाते रहे हर क्षण नया जीवन बिसरती रही सारी खुशबुएँ पाने को एक अनवरत लगन;
रह रह कर मूंदते दो नयन और, फिर और की प्यास में, खिल खिल उठा सारा जीवन कुछ गहरेपन की तलाश में: बेकाबू होते रहे मधुकलश जो थे साँझ तक जड़-स्थिर, रीत कर भी भरते रहे सब घूँट डूबती निशा में होकर निखर;



सारे अनजाने बंधनों का कोई भी पट न रहा छूटा, कोई न बचा तार ऐसा जो आवेग के बूते न टूटा: गढ़ता परिभाषा मौन की झंकृत स्वर पायलों का दुलारता तन का हर कोना

संवाद – बात से साथ का सफ़र

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इस दुनिया को कान की ज़रूरत है लेकिन हर कोई बस बोलना चाहता है...
यह कथन दो तरीकों से किस तरह देखा जा सकता है, बस उस देखने के तरीके की प्रक्रिया का नाम संवाद है. हर किसी के पास इतनी कहानियाँ है कि लिखते लिखते सारे पन्ने भरे जा सकते हैं और हर कोई उतना ही उत्सुक और आतुर है कि किसी और की कहानी सुनने के लिए उसके पास धैर्य नहीं है. ज़िन्दगी की राहों से पनपती कहानियाँ और उनसे जन्म लेते हुए हर पल के किस्से और किस्सों से उपजा खालीपन, मानसिक असंतुलन इतना बढ़ जाता है कि इंसान भूल जाता है उसे जीना किस तरह है! संवाद की प्रक्रिया में ठहराव और स्थिरता है ज़िन्दगी की रफ़्तार को समझने के लिए वक़्त प्रदान करती हुई. कानों और दिमाग को कितने आराम की ज़रूरत है इस बात का ख़याल शायद उम्र भर किसी को नहीं आता क्योंकि हर कोई, बस रोज़ भागने वाले हाथ और पैर को आराम देना चाहता है. संवाद की शुरुआत जिस मौन के साथ हुई उसने मुझे इस बात का सन्देश दिया कि अभी मेरे पास काफी वक़्त है जो मैं अपने सवालों के साथ बिता सकता हूँ और उनसे ज्यादा अच्छी तरह से वाकिफ़ हो सकता हूँ. बढ़ते दबाव और तनाव के बीच भी ख़ुद के लिए समय निकालना कितना महत्त्वपू…

तुम्हारे अधर

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बारिशें खंगाल रही हैं धरती की कोख़ आंधियाँ पलट रही है तमाम वस्त्र,
लोग भूलते जा रहे हैं  जो कुछ देखा, किया और सीखा उन्होंने, रातें छुपी हुई हैं दीवारों के पीछे दिन ढूँढ रहा है पनाह एक गड्डे में;
आँखें चीख रही हैं मौन  हाथ लिखते जा रहे हैं भविष्य, पैरों को भुला गई हैं सारी राहें, थकान भर चुकी हैं साँसों में।
तुम आती हो तब जीवन के संताप को हरने, मैं हो जाता हूँ ग़ुम तुम्हारे हाथों की परिधि में।
मिट जाती हैं व्यंजनाएँ तमाम एक प्रेम से सरोबार आलिंगन में, खुलते हैं इन्द्रियों के पैबंद चटकने लगते हैं दिनो-रात।
प्रकृति के इस पुनर्जीवन पर सृष्टि-सर्जन के गीतों को गाते तुम्हारे सुकोमल गुलाबी अधर;
मैं रख देता हूँ  अपने मुख को उन पर, पढ़ने को वे तमाम रतजगे विषाद के दिनों से संजोये हुए: जो कहने आयीं तुम अपने अधरों पर रखकर।                                 - कमलेश

वाकये, चुनाव और हम

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1. यह यमुना है, हाँ जी इस देश के 100 करोड़ से ज्यादा लोगों की यमुना मईया, जिसका पानी अभी ऐसी हालत में है जिसको पीना तो दूर छू लेने भर से आपको चर्म रोग और स्किन कैंसर जैसी बीमारी हो सकती है। एक तरफ हम इसकी माँ मानकर पूजा करते हैं और उसी पूजा के अंत में इसमें बेतहाशा कूड़ा करकट डाल देते हैं, तो जी यही है क्या शास्त्रों में पूजा का विधान?  भारतीयों के कर्मों और प्रकाण्डों ने जितना नुकसान प्राकृतिक संसाधनों को पहुँचाया है उतना बाकी चीजों ने नहीं। 2. हाल ही में दिल्ली में SEE के 3 दिवसीय लोकार्पण समारोह में पिछले 5 सालों से उसके लिए अथक प्रयास कर रहे दलाई लामा और उनकी टीम दिल्ली में थी, जिन्हें समारोह की समाप्ति के बाद प्रदूषण से उपजे संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।
3. दिसम्बर में एक टीबी के मरीज़ को दिल्ली के एक नामी अस्पताल से डॉक्टरों ने 1 महीने तक जानबूझकर छुट्टी नहीं दी, क्योंकि डॉक्टरों का कहना था कि वह मरीज़ अगर अस्पताल से बाहर गया तो उसकी जान जाने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा, वजह दिल्ली का प्रदूषण। ऐसे अनगिनत वाकये हैं जिन्हें अगर हम देखें तो रूह काँप जाएगी। प्रदूषण दिल्ली मे…

अभिव्यक्ति व्यर्थ है और व्यर्थ हैं परिभाषाएं सारी

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कुछ रातें ज़िन्दगी का आईना सामने रखती हैं। जब मैंने तुम्हें देखा अपने क़रीब बैठे हुए तो मैंने जाना कि प्रेम सबसे ताकतवर और असरदार हथियार है किसी भी लम्हें में ख़ुद को जी लेने के लिए। तुम प्रेम हो यह बात मैंने तब जानी, जिस दिन तुमने मुझसे कहा था कि हमारा रिश्ता प्रेम की बुनियाद पर खड़ा है। तुम्हें रखना किसी दिन के आठों पहर अपने सामने और खो देना तुमको ठीक अगले ही दिन ख़ुद में से, यह और कुछ नहीं मेरे प्रेम में डूबने के मार्ग को आसान बनाता है। मैंने यही चाहा है हमेशा कि प्रेम में खोकर, सब कुछ ही खो दिया जाये, प्रेम को भी! लेकिन मैं नहीं जानता यह कथन कितना सत्य है!
जब तुम बातें करती हो, कई नदियों, जंगलों, शहरों और पर्वतों के पार से, तो मुझे कालिदास की याद आ जाती है। तुम कालिदास के लिए सदैव अकल्पनीय ही रही, केवल मुझे ही अब तक तुम्हें प्रकति के प्रेम के ज़रिए ख़त लिख सकने का सुख प्राप्त है। तुम्हें ढूँढना उगते हुए सूरज में, मुझे पंछियों की चहचहाहट से दूर नहीं करता। किसी रेगिस्तान में मैं तुम्हारी ख़ुशबू के क़रीब चला आता हूँ उसकी रेत को अपने हाथों में थाम लेने भर से। कोई भी किस्सा जो बयां कर सके हमें…

मैं वहीं हूँ

मैं वहीं हूँ,
जहाँ लेते हो तुम साँस
जहाँ उठकर देखी धूप तुमने,
हूँ वहीं उस छुअन में मैं।
जब जब चले तुम्हारे कदम धरा पर,
तब तब पाया है मैंने अपने पैरों में धूल को चिपके हुए;
हूँ वहीं उस जल मैं,
जिसे पिया है तुमने हर प्यास में;
मैं नहीं कहीं भी इस धरा पर,
वहीं हूँ जहाँ रखे हैं ख़्वाब तुम्हारे।मैं हूँ हर उस पल और शख़्स में,
जहाँ तुम हँसे और
किया है प्रेम तुमने बंदिशों से परे;
मैं वहीं हूँ,
जहाँ लेते हो तुम साँस
जहाँ उठकर देखी धूप तुमने,
हूँ वहीं उस छुअन में मैं।
                              - कमलेश

ख़ताओं की पवित्रता

ख़तायें, कितना छोटा और पेचीदा है यह देखने और सोचने में, लेकिन मैंने कभी इतना ख़याल किया नहीं इस शब्द पर, शायद मैं ज़रूरतों को वक़्त देने में व्यस्त था जिसका परिणाम यह हुआ कि ज़िन्दगी के लम्हें नाराज़गी का इक़रार करने लगे। तुम हमेशा से थीं मेरे हर उस पल के व्यापक अस्तित्व में, जब मैं ख़ताओं से मुलाक़ात कर रहा था। मैं नहीं जानता कि ख़ताओं को दूसरी नज़रों से देखना कितना सही है लेकिन जो सही है वह बस इतना ही है कि मेरी नज़रों को लेकर चलने वाली तुम्हारी नज़रें, जिसमें मेरी पूरी दुनिया है; मैं चाहूँगा उस नज़र को, मेरे रास्तों की ख़ताओं से मिलने और बातें करने के लिए।
   हम कितना सहज होकर प्रेम कर सकते हैं, यह केवल महसूस किया जा सकने वाला पहलू है।तुम चलती हो मेरा हाथ थामें, तो मैं जान पाता हूँ कि कितने पत्थरों से होने वाली ठोकरें बच गईं।
तुम जब जब मुझे धकेल देती हो किसी अनदेखी चीज़ को देखने के लिए, मैं देख पाता हूँ मेरी परछाई के अँधेरे में घिरे लम्हों को, जो चल रहे थे अब तक मेरे पीछे केवल इसी इंतज़ार में कि मैं मुड़कर देखूँगा कभी।

मैं शुक्रगुज़ार हूँ प्रेम का,जो तुम्हारे ज़रिये मुझ तक पहुंचता है और मैं उसकी छांव …