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किसान

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Source - IndiaTv पहली बरसात में भीगी माटी जान से भी ज्यादा प्यारी होती है उसे, जब स्कूल से बेटी के लौटने पर उसका माथा चूमता है वह, वैसे ही चूम लेता है खेत को। चाँद के ग़ुम हो जाने पर छाया सूनापन उसके होंठो से दिखाई पड़ता है, हर दफ़ा जब फैक्ट्रियाँ उसके हिस्से की बारिश और सर्दी छीन लेती है, वह चाहता है इतना कि एक चादर में उसके दोनों बच्चे चैन से सो सकें। परेशान जब हर तरफ से हो वह निकलता है अपने हक़ के लिए, बाज़ की तरह झपट पड़ते हैं सारे ठेकेदार उस पर, शायद वो नहीं जानते रोटी गेहूँ से बनती है; उसने नहीं भरा धान ज़रुरत से ज्यादा कभी भी अपनी कोठरी में, नहीं बहाया पैसा कभी ही फिज़ूल। एक मैना ढूंढ रही है वीराने में अपने घोंसले के लिए एक पेड़, वो ढूंढता है अपनी खोई आवाज़ जिससे उसे उम्मीद है कि वह पेड़ के झूले की रस्सी को, फंदे में बदलने से रोक लेगी।                                - कमलेश *जरूरी है कि अब हम अपने खाने के...

मेरी कविताएं

कोई भी पंक्ति या ग़ज़ल अब नहीं उतरती मेरे जेहन से पन्नों पर, कोने में कमरे के बिखरे पड़े हैं अब तक कई कहानियों के टुकड़े । दीदार के बगैर ही गला घोंटा है मैंने जाने कितने अल्फ...

सृजन

मत पूछो मुझसे कि जो हुआ वो सही था या ग़लत, मेरे बस में कुछ था ही नहीं पता नहीं सब कैसे हुआ और फिर होता चला गया । तेरे होठों की शबनम सा कोई जाम नहीं जहान में, मेरे लबों और तेरी गर्द...

ग़ुलामियत का कक्ष

हम सब जड़ हो चुके हैं और देख रहे हैं अपलक उस श्वेतपत की ओर, जंहा आजाद है कुछ काले वर्ण, जो हमें अपना ग़ुलाम बनाए हुए हैं हमारी सोच भी सिमट चुकी है अब उन्हीं के इर्द-गिर्द ही |   कमरे में खिड़की तो है लेकिन दृश्य के लिए ना कि दर्शन को, विचारों को तो बंदी बना चूका है वो उपाधिधारक, जिसके समक्ष हमारी सोच कठपुतली बनी हुई है | और हम सब झुझ रहें हैं, एक अदृश्य युद्ध से जो छिड़ा है हमारी आवाज़ और सोच के बीच | मजबूर हैं वे लोग जिन्हें किताबों ने कैद कर लिया है, कुछ नज़र नहीं आ रहा है उन्हें ऐसे ही वे अंधे ठोकर खाकर मार दिए जायेंगे |   सहसा मुझे दिखाई पड़ता है वह मजबूर वृक्ष, जो हाथ जोड़े खड़ा था मानव के समक्ष, फिर भी उसकी सांसें थामकर इस कक्ष को आकार दिया गया है |   मैं अब चाहता हूँ कि किताब के पीछे की मासूमियत को पहचाना जाये, ढूंढ लिया जाये वो दर्द जो अब तक अनदेखा किया गया विचारों की पराधीनता के चलते, उतार दिया जाये वो असहनीय बोझ, जिसको हम सब   ...

कुछ तुमने कुछ मैंने ...

दर्द के किस्से सुनाए कुछ तुमने कुछ मैंने, फिर सिसकियाँ सुनी कुछ तुमने कुछ मैंने । सारी तकलीफों की नुमाइशें करते करते, कई आँसू भी गिराए कुछ तुमने कुछ मैंने । देखा जब ज़ख्मों ...

सच्चाई

मैंने देखी ग्यारह साल की ढोलक, और छः साल की बेक फ्लीप । ऐसा लगा कि जाकिर साहब और टाइगर श्राॅफ ने, व्यर्थ ही कर दिया जिंदगी को क्योंकि यह दोनों पूरी दुनिया को प्रशिक्षण दे सकत...

रात की खूबसूरती

रात की खूबसूरती में कुछ खोटा लगता है, तारों   की  आँख से  कुछ  टूटा लगता है । सूरज उगता तो है तेरी यादें साथ लेकर, मगर शाम को ढलने से मुकरने लगता है । होंठो पर ग़ज़लें तो है गुनग...

कविता

कुछ चेहरों को सच दिखाने पर, लोगों की आईने से लड़ाई हुई है । दरिया में डूब जाने पर मेरे, शहरों में महफिल सजाई हुई है । संभल कर रास्तों पर कदम रखना, बारुद जमाने ने शिद्दत से बिछाई ह...

तुमने ( सियासतदार )

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Source - Hindustan Times फिर मुस्कराहट को खामोश कर दिया तुमने, फिर एक दिये की लौ को बुझा दिया तुमने । अभी तो यह जहान् देख भी नहीं पाये थे वो, जिनको इस जहान् से ही मिटा दिया तुमने । अपने गुनाहों को छुपाने की कोशिश में फिर, किसी बेगुनाह की साँसो को काट दिया तुमने । शरम अब तो करो ए सियासत के पहरेदारों, एक माँ की कोख को शमशान कर दिया तुमने । माँ है वो बद्दुआ तो कभी दे ही ना सकेगी, भले ही उसके नाजुक दामन को नोच लिया तुमने ।                                    .....कमलेश.....   " श्रद्धांजलि "

व्यथा

हर बीती बात अब पराई लगती है, ऐ जिंदगी अब मुझे धूप लगती है । उड़कर आते थे कभी खुशी से घर, अपने घर में तो अब घुटन लगती है । चाहा के ना लिखूं किसी के दर्द को पर, हर तकलीफ अब मुझे अपनी लगत...

घर लौटकर आना नही चाहता ।

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Source - Bindaas Attitude  सोच रहा हूँ इस दफा कुछ कपड़े और खरीद लूँ, गाँव की हर एक गली घूमकर आँखो में समेट लूँ, जानने वाले हर शख्स से एक बार फिर मुलाकात करूँ, घर की दीवार में लगी तस्वीर को अपने साथ ले चलूँ, दिल आज के बाद घर लौटकर आना नही चाहता । कुछ लतीफे जो अधूरे है बच्चों को सुनाकर पूरे कर दूँ, कुछ रिश्ते जो रुठे है मनाकर प्यार से गले लगा लूँ, रोज़ की राहों को छोड़कर नयी मंजिलें तलाश करूँ, ख्वाहिशों को अधूरा रख के घर लौटकर आना नही चाहता । अपने सपनो में प्राण फूंक नये रास्तों को अपना लूँ, मेरी तकदीर मेरे साथ रहे ऐसा कोई अफ़साना बना लूँ, इस घर, परिवार, और गली से आज से अजनबी हो जाऊं, जिंदगी का सूकून गंवाकर घर लौटकर आना नही चाहता ।                             .....कमलेश.....