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अँधेरे से उपजता उजाला -

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  Source - ephotozine.com कभी ऐसा हुआ है कि आप अपनी ही धुन में चले जा रहे हैं और किसी ने आपको धक्का देकर झकझोर दिया हो? क्या कभी इस बात की तरफ ध्यान गया है कि जो उजाला आपकी आँखें इस दुनिया में देख रही हैं वह किन अँधेरे गलियारों से होकर आ रहा है? या यह महसूस करने का यत्न किया है कि जीवन में पल रही तमाम वेदनाएँ और नफ़रत एक मार्मिक चुम्बन के आगे कोई अस्तित्व नहीं रखती! मैंने अपने रास्तों के अनगिनत क्षणों में ख़ुद को ऐसी अवस्था में पाया है जहाँ से मैं सिर्फ अपना सुख और उसके इर्दगिर्द फैला अँधेरा ही देख पाता हूँ. यह सुख असीम स्वार्थ और उतनी ही वासनाओं में लिपटा होता है और पल-पल इसमें वृद्धि ही होती है; इसके विपरीत उजियारे के उस ओर पल रहे अँधेरी वादियों का जुगनू मुझे हर बार उसी गर्त में झटकने में मशगूल रहता है जहाँ से सिवाय पीड़ा के कुछ हासिल नहीं होता. तमाम उम्र आदर्शों के मुखौटे पहने रहते हुए ऐसा समय भी आया है कि मैंने अपने ही कई हिस्सों का अस्तित्व सिरे से नकार दिया है. घट चुके या घट रहे क्षणों को लिखना आसान तो नहीं है लेकिन उतना दुर्गम और अयोग्य भी तो नहीं!  जितनी बार मुझे जीवन में...

वर्तमान का ख़्वाब -

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हम सारी ज़िन्दगी उस ख़्वाब के लिए अपनी नींदे ख़राब कर देते हैं जो हमने अब तक की सबसे गहरी और ख़ूबसूरत नींद में देखा था। नींद जागने से उतनी भी अलग नहीं होती जितना इसे बना दिया गया है: बल्कि नींद में आप अपने जीवन के उस हिस्से को नए सिरे से जीने लगते हो जिसको आप जागते हुए जीने की हिम्मत करने से बहुत डरते हो। इन सारी चीजों से जुड़े रास्ते बहुत बिखरे हुए से लगते हैं मुझको। एक दिन ऐसा आएगा जब यह बिखरते बिखरते उलझने लगेंगे और फिर हममें से किसी को भी अपनी मंज़िल कभी भी नहीं मिल पाएगी; और तब मैं किसी पेड़ के नीचे एक किताब हाथ में लिए मुस्कुरा रहा होऊँगा। उस दिन मैं अपने द्वारा जिये गए तमाम लम्हों को समेटकर उनकी गठरी को उस नदी में जाकर फेंक आऊँगा जिस नदी में पैर डुबोना मुझे सबसे ज्यादा सुकून देता है। इस उम्मीद को अपने होने के किसी कोने में छुपाये कि शायद ऐसा करने से मैं अपना अतीत मिटा सकता हूँ जिसमें वे बिखरे-उलझे रास्ते भी मिट सकें। और तब मेरे पास शेष रह जायेगा निरा वर्तमान; जो मेरा अपना है। इस वर्तमान को मैं उस लड़की के हाथों में हाथ रखकर जीना चाहता हूँ जिसे पिछले कुछ दिनों से मेरे फ़ोन कॉल का इंतज़ार र...

बहुत दिनों के बाद

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                     "उसकी नींद दरवाजे पर किसी की दस्तक की वजह से टूटी, उसने बिस्तर से ही पूछा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. उसने उठकर दरवाजा खोला और पाया कि बाहर कोई नहीं था. कितनी ही बार दिल में ख़यालों की दस्तक से हम जाग पड़ते हैं इस उम्मीद में कि कोई ख़्वाब हक़ीकत बनकर दरवाजे आ गया है. दरवाजे और दिल की दस्तक में कितना अंतर है यह सुनने पर ही जाना जा सकता है. कुछ देर अँधेरे में भटकने के बाद उसने कमरे की बत्ती जलाई और हाल ही में आई एक किताब को पढ़ने बैठ गया. बड़े दिनों बाद उसने सुबह उठकर किताब को हाथ में लिया था, कुछ देर में ही वह किताब में घुल गया. अचानक हुए शोर से उसका ध्यान टुटा जो सामने वाली गली से आ रहा था उसने सोचा कि रोज़ की तरह लोग पानी भरने के लिए झगड़ रहे होंगे और बालकनी तक जा लौट आया. लौटकर आने पर उसे लगा की कमरे में कुछ बदल गया है जो उसके जाने से पहले वहाँ नहीं था. अक्सर ऐसा होता है कि कुछ कैद करने के जुनूं में कुछ महसूस करना छुट जाता है और इसके साथ भी यही हुआ. जिस कमरे में वह इतने दिनों से रह रहा था उसकी सोहबत को ही महसूसना भूल गय...

रिश्तों की ज़िन्दगी

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Source - thriveglobal.com ज़िन्दगी के रास्ते अगर उतने ही आसान होते जितने वह सुनने में लगते हैं तो शायद एक सूखे पत्ते की तरह बहकर इसे जिया जा सकता था; लेकिन ऐसा नहीं है. एक तरफ ज़िन्दगी के हर बीतते पल में अनगिनत ख़्वाब अपना आशियाँ ढूंढते हुए आँखों में अपना सिर छुपा लेते हैं वहीं दूसरी ओर हर वक़्त सुलझते-सँवरते रिश्ते हाथों की अँगुलियों में अपनी पकड़ मजबूत करते रहते हैं. ख़्वाबों के पीछे भागना सबको होता है लेकिन उतना जज़्बा इकठ्ठा करके चलने की ताकत खोजते खोजते उम्रें बीत जाती है. न जाने किस घड़ी पैदा हुए लोग ही सोचते हैं कि उनके रिश्ते सँवरने सुलझने से परे उनकी पहचान को समझ कर उन्हें अपनी आज़ादी और प्रेम को महसूसने न दें तो एक कदम आगे बढ़ जाने में कोई बुराई नहीं है. रिश्ते जन्मजात तो केवल गिनती के होते हैं बाकि का जोड़-घटाव तो इंसान ख़्वाबों के पीछे भागते हुए (ऐसा हर किसी को लगता है लेकिन लगने और होने में फ़र्क है) करता है अपने रिश्तों में. ज़िन्दगी अगर आज़ादी और अपनापन न परोसे तो उसे खोजकर चखने को जीने का फ़र्ज़ कहने में कुछ ग़लत नहीं है. रिश्तों की दिखती न दिखती दीवारें, अक्सर अपनेपन और आज़ादी को जी...

किस्सा - ४ -- सच की खोज

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नदी का पानी कभी भी लौट कर नहीं आता , ऐसा किसी दार्शनिक ने सालों पहले कहा था . मैं जब कभी किसी नदी के किनारे होता हूँ मेरी आँखें कुछ न कुछ खोजना शुरु कर देती हैं . क्या खोज रही होती है यह आज तक जानना मुश्किल रहा है . मुश्किलें हवाओं सी होती हैं ज़रा अड़ियल और बेबाक ; किसी की सुनने के लिए उनके पास वक़्त नहीं होता . ज़िन्दगी की राहों में पेड़ से ज्यादा मुश्किलों का पहरा है क्योंकि हर कदम इंसान के ज्ञान का दायरा बढ़ जाता है . जितना ज्यादा ज्ञान होगा , अंतस की वेदना उतनी ही अधिक होगी यह प्रमाणित किया जा रहा है सदियों से , इन सदियों के बीतते लम्हों में . वेदना का कवच भेदने बुद्ध भी चले थे , सालों खोजते रहे और अंत में क्या पाया ; यही कि ‘ अपना सच आप ही खोजें तो बेहतर है मेरा सच आपके किसी काम का नहीं ’. दुनिया की तमाम किताबें हर नये गढ़ते शब्द में खोजती है अस्तित्व के कारणों को , लेखक हर दिन पन्नों की शहादत पर नाज़ चाहकर भी नहीं कर पाता ....

किस्सा -३ -- "तीसरा"

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Source - Pexels.com ‘ वक़्त के गुज़रने की आवाज़ सुनी है ?’, क्या कुछ भी पूछते हो तुम . यह बातें एक प्रेमी जोड़ा करेगा ऐसी उम्मीद दार्शनिकों के सिवा कोई और क्या ही रखेगा ! हाँ , लेकिन निर्मल वर्मा से प्रभावित कवि या लेखक भी अकेले बैठकर ऐसा   सोच सकता है . प्रेम ने दर्शन को बहुत हद तक अपनी गिरफ़्त में रखा हुआ है लेकिन दर्शन आज तक प्रेम के इर्द - गिर्द भी नहीं जा सका . दुनिया के तमाम सिद्धांतों के सिमटने पर प्रेम का ‘ प् ’ शुरु होता है . किस्सों की ज़िंदगियाँ बस उतनी ही होती है जितनी देर में पढ़ने वाला उसे पढ़ जाए ; बाकि तो पन्ने भरने की प्रक्रिया का नाम कहा जाता है . मैंने उसे कहते सुना था एक दफ़ा कि जब मेरे क़रीब रहो तो दर्शन और साहित्य दोनों को दहलीज के उस पार ही छोड़ आना अन्यथा मुझमें तुम्हें तीनों में से कुछ भी हाथ नहीं लगेगा . तीसरे की खोज में मैंने दुनिया की अच्छी किताबों को ढूँढकर पढ़ना चालू कर दिया है , हालाँकि खोज अभी जारी है . आप...

प्रेम और करुणा... काफी है!

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घुप्प अँधेरे से भरी दुनिया में, हर कोई तलाश रहा है एक टुकड़ा रोशनी; जिसके सहारे उसे मिल सके अपने खोए हुए जीवन का पता. राहें खूँखार होती जा रही है, पानी में ज़हर घोलने वालों की संख्या बढ़ गई है चंद गुज़रे दिनों से: और भी न जाने कितनी तरह से मुश्किलों ने पाँव पसारे हैं यहाँ! मैं इतना तो जानता हूँ लेकिन कि मुझे कितने लम्हों में समेटना है अपनी आँखों के आगे फैले हुए संसार को, मुझे पता है यह भी कि कितना भाव दूँ किसी की नफ़रत को ताकि वह धरी की धरी रह जाए! और ख़ास बात तो यह है कि मुझसे कहा है किसी ने कि ख़ुद से किया गया प्रेम और सबके लिए उपजाई हुई करुणा इस दुनिया की तमाम मुश्किलों और हथियारों का सामना करने के लिए ज़रूरत से बहुत ज्यादा काफी हैं. -        कमलेश  तस्वीर के लिए शुक्रिया विजय भईया

तुम, मैं या वक़्त?

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Source - Pinterest.com मु झे नहीं पता कि मैं क्या दे सकता हूँ तुम्हें , लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि अगर देखोगे मेरी आँखों में कभी जो उम्मीदों के साये के साथ तो वहाँ तुम्हें इतना तो हौसला मिल जायेगा कि मैं खड़ा हूँ वहीं जहाँ तुम मुझे अपने लिए देखना चाहते हो। ज़िन्दगी को इस तरह जीना की उसका ख़ुद का मन करे कि वह तुम्हारे इर्द गिर्द हमेशा ही घूमती रहे जिस तरह तुम अपने प्रेम और जीवन के आसपास घूमते हो। बहुत आसान होता है किसी की ज़िन्दगी में अपने लिए एक जगह बना लेना लेकिन उस जगह रहकर भी सामने वाले शख्स़ को उसकी जगह और उसका वक़्त नियत समय पर देते रहना बहुत कठिन है। मैं देखना चाहूँगा तुम्हें उसी तरह अपने मुक़ाम पर बैठे हुए जिस तरह मैंने देखा था पहली बार एक तितली को फूल पर बैठे हुए , मेरा प्रेम तुम्हारे रास्ते में उतना ही आड़े आएगा जितना कि बुद्ध का अपनों से किया प्रेम आया था उनके निर्वाण के रास्ते में। तुम देखना किसी रोज़ शांत नदी को , जब तुम्हें लगने लगे थकान इन सारे कामों और यात्राओं से जो तुम इतने वर्षों से करते जा रहे हो , तब मैं तुम्हें देखूँगा उस नज़र से जिसमें तुम ख़ुद को ढूंढने की छवि...

ज़िन्दगी का केंद्र

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ज़िन्दगी के अच्छे खासे दौड़ते-भागते दिन जब बिस्तर पर बीतने लगे तो लगता है बहती नदी पर पलक झपकते बाँध बना दिया हो. काम करने का सलीका अचानक से ऑफिस बैग से निकलकर पूरे कमरे में पसर जाता है. अंगुलियाँ अनगिनत चहलकदमी करती हुई अपने होने के वजूद को किसी मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर के की-बोर्ड पर खपा देती हैं. ऐसे वक़्त में मौसम के बदलते मिजाज़ का अंतर्मन से कोई भी नाता नहीं पनपता और न ही किसी ख़ूबसूरत कली को देखकर दिल में कोई हूक उठती है. उठता है तो बस एक निरा खालीपन जो एक लम्बे वक़्त से बाहर से बोलते लेकिन अन्दर से ख़ामोश शरीर में घर कर चुका होता है. इस दुनिया में हर रोज़ धुलते हैं अनगिनत चेहरे और सजते हैं उतने ही अधर किसी प्रिय के चुम्बन की आस में, लेकिन कितने चेहरों का दीदार किया जाता है और कितने ही होंठ चुम्बन के बाद मुतमइन हो पाते हैं! यह सवाल कोई नहीं करना चाहता कि उसके जीवन में प्रेम है या नहीं लेकिन कामों की फ़ेहरिस्त कितनी घटा दी है एक ही कुर्सी पर कमर की सारी भावनाओं को क़त्ल करते हुए यह सब को ज्ञात है.             ...

प्रेम की आवश्यकता

दो सितारों की गुफ्तुगू सा एक रिश्ता पल रहा है मेरी पलकों के नीचे, न कोई वादा, न कोई मंज़िल बस सफ़र में चल रहा है कब से; कभी कोई किताब पढ़ता हूँ तो उसमें भी इसी की कहानी होती है, सुनता हूँ गर’ किसी के किस्से उनमें भी यही झलकता है. खेतों में फसल को पानी देते हुए, जानवरों के लिए चारा लाते हुए, किसी के हक़ में आवाज़ उठाते हुए, किसी कविता को लिखते हुए, ज़िन्दगी के किस्सों को सुनाते हुए, बदलाव की प्रक्रिया को अंगीकार करते हुए, दुनिया की राहों में ख़ुद को ढूंढते हुए, मैं नहीं खोज पाया आज तक और कुछ हर दफ़ा एक जवाब क़दमों को आकर्षित करता है कि दुनिया, मुझे और इस रिश्ते को प्रेम के साथ रहकर जीने की आवश्यकता है.                                                   - कमलेश

वसीयतनामा

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किसी भी सफ़र के समय दो भागों में बँट जाती है दुनिया, मैं बन जाता हूँ दर्शक ताकि बचा हिस्सा दर्शन हो जाये, दार्शनिक का कोई अस्तित्व नहीं कहानी में: सब ढूँढ रहे हैं खुलापन पैरों में जंज़ीरों को ढोते हुए, उजाला दीखता तो है आँखों में पलकों में जमे हुए अँधेरे के पीछे। मैं चलता हूँ आसमाँ के नीचे जो घूरता है हर कदम मुझे, साथ चल रही लड़की कहती है दूर जाते हो तुम तो आँखों में बादल छा जाते हैं, मैं कहता हूँ  हाँफती धरती और घूरता आसमान, मौन से प्रतिपल होता संवाद और पलकों में लिपटा इंतज़ार प्रेम का दूसरा नाम है। दो हिस्सों में बँटते से सफ़र में झाँकता हूँ खिड़की से बाहर, तो दुनिया दीखती है नई सी जहाँ इंसान की कमी लगातार बढ़ रही है जहाँ सपनों का अकाल चल रहा है, मेरे हमनफ़स मेरे वसीयतनामे में मिलेंगे दो नाम: पहाड़ की गोद में बसा जंगल और मोर पंख रख पाओ सहेजकर तो रखना।                                           - कमलेश

राहें, प्रेम और मैं

कुछ रास्ते आपको कभी मंज़िल तक नहीं ले जा पाते, ऐसे रास्ते सिर्फ भटकने के लिए बने होते हैं । जब ज़िंदगी का स्वाद थोड़ा भी ऊपर नीचे लगने लगे तो उसमें प्रेम का तड़का मारना आवश्य...

अस्तित्व का रहस्य

किसी भी जीव का अस्तित्व बग़ैर आत्मा के संभव नहीं, और बिना जीव के अस्तित्व के निरर्थक होता है आत्मा का होना । चेहरे के नूर को देखने पर तुम्हारे अद्वैत दर्शन का मूलमंत्र उपज प...

पसंद और इश्क़

पसंद होना ना होना दोनों जायज़ है, जैन-दर्शन के स्यादवाद की तरहा ही पसंद भी कुछ पूरी कुछ आधी सब की ज़िन्दगी में ज़रूर होती है । पसंद में एक-ही वक़्त पर अपनी ख्वाहिश को बताया और छुपा...

सृजन

मत पूछो मुझसे कि जो हुआ वो सही था या ग़लत, मेरे बस में कुछ था ही नहीं पता नहीं सब कैसे हुआ और फिर होता चला गया । तेरे होठों की शबनम सा कोई जाम नहीं जहान में, मेरे लबों और तेरी गर्द...