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आंखें

चित्र
आंखें इस कुदरत का
सबसे करिश्माई तोहफ़ा है,
जिसने हमें दिमाग से आगे
और
पेट से बड़ी चीजें दिखाई है । आंखें विद्यमान है सर्वस्व
हमें ख़ूबसूरत बनाए रखने के लिए,
श्रृंगार का एक भी रस नहीं चूका
अब तक,
चाहे आंखें
पलकों के सख़्त पेहरे में क्यूं ना हो । भावनाओं के दोमुखी व्यवहार को
आंखों ने कभी नहीं स्वीकारा,
आंखें निश्चल दर्पण है
हमारी असीम भावनाओं का । तुमने कभी अपनी आंखें नहीं देखी,
मैंने सिवाय आंखों के कुछ नहीं देखा ।
                                          -- कमलेश

किसी खोए हुए घर का

किसी खोए हुए घर का पता ढूंढ रहा है,
प्रेम का ख़त कबसे ज़िन्दगी ढूंढ रहा है ।मेरी पगतली में चुभा हुआ एक कांटा,
दिल तक आने का मौका ढूंढ रहा है ।मेरे सिर पर बना था एक घाव कल,
जो आज अपना ही ख़ून ढूंढ रहा है ।दरवाज़े पर लटका है खज़ाना कब से,
वो चोर फ़िर भी तिज़ोरी ढूंढ रहा है ।स्टडी टेबल पे पड़ा हुआ है मेरा खाना,
रह रह कर वो मेरी भूख ढूंढ रहा है ।मैंने छुपने कोशिश नहीं की कभी डर के,
बावजूद इसके भी मुझे वक़्त ढूंढ रहा है ।
                                                 - कमलेश

इतिहास, दोहराव और बदलाव

प्रेम में चीज़ें स्थिर होने लगती है लेकिन अगर उन्हें बदलने की जुगत भिड़ाई जाए तो वे टूट जाती है, प्रेम को बदलाव पसंद है इसके बावजूद भी प्रेम हमें स्थिरता प्रदान करता है । प्रेम से उपजे सारे सिद्धांत पुख़्ता करते हैं अस्थिरता को, हालांकि अस्थिरता और बदलाव का प्रेम से कोई नाता नहीं होता । बदलाव की प्रक्रिया शाश्वत है उसे कोई रोक नहीं पाएगा क्योंकि वह सबसे ताकतवर है, जब किसी बदलाव का अंदेशा ज़िन्दगी में होता है तो इंसान को इस बात का भय सताता है कि उसकी ज़िन्दगी बदल जाएगी । ज़िन्दगी का अपने आप बदल जाना और बदलाव की वजह से बदलने में ज़रा भी समानता नहीं होती, अपने आप बदलती ज़िन्दगी का हमें एहसास नहीं होता और बदलाव जब आता है तब हम उसके आते हुए चेहरे को देखते हैं । आज तक कोई भी बदलाव की पीठ नहीं देख पाया या शायद वह शॉल ओढ़ कर चलता रहता है, लेकिन इसमें भी एक बात है जिसका होना तय होता है । वह यह कि बदलाव के होने से इतिहास के पन्नों का संपादन हो जाता है लेकिन इतिहास का बदलाव के साथ कोई मनमुटाव फ़िर भी नहीं होता । बदलाव इतनी दफा इतिहास में एडिटिंग कर चुका है कि अब इतिहास को इसकी आदत हो चली है, इति…

ज़िन्दगी

वक़्त एक साधारण रेलगाड़ी है
जिसमें यात्रा का एक ही विकल्प होता है,
लेकिन आदमी बहुत डरा हुआ है
उसे यहां भी ज्यादा विकल्प चाहिए,
कम से कम तीन तो चाहता ही है ।जिसे जीना है गुज़रे वक़्त में
चिपककर अपने कंफर्ट ज़ोन से,
वह आदमी हमेशा चाहता है टिकट
एसी क्लास का यानी कि अतीत,
इस वहम में उसने ये ख़रीद लिया कि
वो उसे बाक़ी दुनिया से परे रखने वाला है ।कुछ लोग बहुत साहसी होते हैं
निर्भीक होकर लड़ते हैं
स्टेशन के टिकट काउंटर पर,
एक टिकट हथियाने के लिए
ताकि जा सके जनरल डिब्बे में,
किन्तु सारे लोग अंत तक वहां
कभी रह ही नहीं पाते क्योंकि
वर्तमान की खिड़कियों से,
ज़िन्दगी में झांकने के लिए
आदमी को प्रेम होना चाहिए,
जिसका मोल उसे
यात्रा समाप्त होने पर भी
पता नहीं चलता ।
वर्तमान की खिड़की और
प्रेम का साथ,
दोनों ज़रूरी है जनरल डिब्बे में ।तीसरे विकल्प के इंतज़ार में
कुछ लोग अभी अभी,
काउंटर से एक घोषणा होने के बाद
निराश होकर के वापस चल दिए ;
शायद वो एसी से घबरा चुके थे,
और जनरल की हिम्मत नहीं थी
उन्हें चाहिए था स्लीपर का टिकट
ताकि गुज़र सके ज़िन्दगी सपनों में,
लेकिन भविष्य के लिए रेलगाड़ी में
किसी टिक…

अस्तित्व का रहस्य

किसी भी जीव का अस्तित्व
बग़ैर आत्मा के संभव नहीं,
और बिना जीव के अस्तित्व के
निरर्थक होता है आत्मा का होना ।चेहरे के नूर को देखने पर तुम्हारे
अद्वैत दर्शन का मूलमंत्र उपज पाया,
जिसको शंकराचार्य ने सराहा
और विवेकानंद ने प्रचारित किया ।प्रकृति के कारणों को खोजते हुए
थेल्स ने देख ली थी तुम्हारी आंखें,
तब जाकर उसने जाना और कहा
कि पानी से विश्व का सृजन हुआ ।तुम अनभिज्ञ थी जब गुस्से में
तो तुम्हारी आग उगलती नज़रें
सूरज के निर्माण में सहायक बनी,
और कई सालों बाद हेरक्लिटस ने
आग को प्रथम तत्व घोषित किया ।लटों में तुम्हारे बालों की उलझकर
किसी रोज़ जाना जा सका शाम का रहस्य,
अनंतता को देखकर  तुम्हारी मुस्कान की
अनेग्जीमेंडर को यह एहसास हुआ,
कि वह भी सृष्टि का कारण जानता है ।सारे सिद्धांत जो आज की तारीख़ तक
प्रतिपादित किए हैं वक़्त ने,
बहस अभी भी जारी है उनमें ;
कि तुम्हारी आंखें या मुस्कान,
कि तुम्हारी नज़रें या जुल्फ़ें,
आख़िर इस ब्रम्हांड का सृजन हुआ तो कैसे ?सब मगन हो चुके हैं इस बहस में,
कोई जान नहीं पाया अभी तक
इस संसार के सृजन का रहस्य ;
मैं हूं खुशकिस्मत शायद
जो जान सका तुम्हारे होने क…

अंतर और समानताएं

किन्हीं दो चीजों में अंतर का ना होना,
उनको कभी भी समान नहीं बना पाया ।ठीक उसी प्रकार कि जैसे
किसी दो चीज़ों के समान होने पर भी,
उनमें खोज लिया गया कोई एक अंतर ।इतनी अनेकताएं होने के बावजूद भी
प्रकृति के किसी भी जीव में मिली नहीं,
थोड़ी सी भी भिन्नताएं ।इंसान केवल ढूंढ रहा है अंतर
और प्रकृति पैदा कर रही है,
उतनी ही अनवरत समानताएं ।मुझमें और तुममें भी हैं दिखते
अनगिनत अंतर,
फिर भी झलकती है असीम समानताएं ।बिलकुल एक-सी ही होती हैं
किसी भी जीव की दो आंखें,
शायद अभी तक किसी ने
ढूंढा नहीं उनमें कोई भी अंतर ।
                                  -- कमलेश