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आंखें

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Source-GetDrawings.com आंखें इस कुदरत का सबसे करिश्माई तोहफ़ा है, जिसने हमें दिमाग से आगे और पेट से बड़ी चीजें दिखाई है । आंखें विद्यमान है सर्वस्व हमें ख़ूबसूरत बनाए रखने के लिए, श्रृंगार का एक भी रस नहीं चूका अब तक, चाहे आंखें पलकों के सख़्त पेहरे में क्यूं ना हो । भावनाओं के दोमुखी व्यवहार को आंखों ने कभी नहीं स्वीकारा, आंखें निश्चल दर्पण है हमारी असीम भावनाओं का । तुमने कभी अपनी आंखें नहीं देखी, मैंने सिवाय आंखों के कुछ नहीं देखा ।                                           -- कमलेश

-- नोट्स ::

मुझे छुट्टियां कभी भी अच्छी नहीं लगी, छुट्टियों का मतलब आमतौर पर बच्चों या किसी भी वयस्क के लिए आराम करना या मौज करना होता है । मैं हमेशा से छुट्टियों का मतलब यह समझता आया हूं कि एक एक्स्ट्रा मेंबर जो आपके सारे कामों में हाथ बंटा सके, भले उसे वह करना आता हो या नहीं इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता । घर में सबसे छोटे वाले बच्चे की हालत और दिल के जज्बातों को मैंने बहुत क़रीब से देखा और महसूस किया है, छोटा होना अपने आप में कई बार एक गुनाह कर देने जैसा है । जब तक आप को पैरेंट्स सपोर्ट करने के लिए खड़े होते हैं कि भाई ये छोटे का खयाल रखा जाना चाहिए या इस पर वार नहीं किया जा सकता या इससे मस्ती करते वक़्त सावधानी बरतने की बहुत ज्यादा ज़रूरत है और वगैरह वगैरह..। लेकिन इसके उलट जब वही छोटा अपने ही घर में बड़ों के बीच अकेला छूट जाए तो फ़िर उसकी हालत पहाड़ के नीचे आए हुए ऊंट सी हो जाती है जो बिना अपना कुबड़ तुड़वाए बाहर नहीं निकल सकता । तो इन छुट्टियों में उस पर रहम किया जाना चाहिए ऐसा मेरा मत है ।                        ख़ैर बचपन और जवानी की छुट्टियों में मुझे कभी कोई अंतर नहीं मिला यह अलग बात ह

किसी खोए हुए घर का

किसी खोए हुए घर का पता ढूंढ रहा है, प्रेम का ख़त कबसे ज़िन्दगी ढूंढ रहा है । मेरी पगतली में चुभा हुआ एक कांटा, दिल तक आने का मौका ढूंढ रहा है । मेरे सिर पर बना था एक घाव कल, जो आज अपना ही ख़ून ढूंढ रहा है । दरवाज़े पर लटका है खज़ाना कब से, वो चोर फ़िर भी तिज़ोरी ढूंढ रहा है । स्टडी टेबल पे पड़ा हुआ है मेरा खाना, रह रह कर वो मेरी भूख ढूंढ रहा है । मैंने छुपने कोशिश नहीं की कभी डर के, बावजूद इसके भी मुझे वक़्त ढूंढ रहा है ।                                                  - कमलेश

कहानी ( सामान्य से शून्य )

सुबह के चार बजे शशांक बिस्तर से निकलकर छत पर जाकर टहलने लगा, वह शायद किसी सपने से जाग गया था ऐसा उसकी आँखों को देखने पर अनुमान लगाया जा सकता था | पूरी रात बिस्तर पर माहौल से अनभिज्ञ होकर लेटे रहने का मतलब सोना नहीं होता, लेकिन आँखों को अधूरे ख़्वाबों को देखने की तलब हो तो आसानी से सोया जा सकता है | कुछ मिनट बेचैनी में टहलकर वह वापस कमरे में आकर आराम कुर्सी पर जा गिरा, आराम कुर्सी से ठीक 30 डिग्री के कोण पर एक खुबसूरत आईना मकान बनाने वाले इंजिनियर ने शायद यही सोचकर लगाया था कि कोई भी शख्स बगैर किसी ज़हमत के कुर्सी पर बैठे-बैठे ख़ुद को निहार सके | ख़ुद की शक्ल को ज़रा गौर से देखने पर शशांक ने पाया कि आज उसकी आँखों के आकार में कोई अंतर आ गया है, क्योंकि उसकी दायीं आँख बायीं वाली आँख से कुछ छोटी दिखाई पड़ रही थी पहले पहल उसे लगा कि शायद कोई कीड़ा काट लिया होगा लेकिन वजह कुछ और ही थी | दरअसल हुआ ये था कि उसकी बायीं वाली आँख ने एक सपना देखा जोकि उम्मीदों से उलट अधूरा छुट गया था वहीं दायीं वाली आँख ने दिल की ख्वाहिशों को मुकम्मल करता एक दूसरा सपना देखा था, तो ज़ाहिर सी बात है बायीं वाली आँख अपनी नारा