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किस्सा - ४ -- सच की खोज

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नदीकापानीकभीभीलौटकरनहींआता, ऐसाकिसीदार्शनिकनेसालोंपहलेकहाथा. मैंजबकभीकिसीनदीकेकिनारेहोताहूँमेरीआँखेंकुछनकुछखोजनाशुरुकरदेतीहैं. क्याखोजरहीहोतीहैयहआजतकजाननामुश्किलरहाहै. मुश्किलेंहवाओंसीहोतीहैंज़राअड़ियलऔरबेबाक; किसीकीसुननेकेलिएउनकेपासवक़्तनहींहोता. ज़िन्दगीकीराहोंमेंपेड़सेज्यादामुश्किलोंकापहराहैक्योंकिहरकदमइंसानकेज्ञानकादायराबढ़जाताहै. जितनाज्यादाज्ञानहोगा, अंतसकीवेदनाउतनीहीअधिकहोगीयहप्रमाणितकियाजारहाहैसदियोंसे, इनसदियोंकेबीततेलम्होंमें. वेदनाकाकवचभेदनेबुद्धभीचलेथे, सालोंखोजतेरहेऔरअंतमेंक्यापाया; यहीकि ‘अपनासचआपहीखोजेंतोबेहतरहैमेरासचआपकेकिसीकामकानहीं’. दुनियाकीतमामकिताबेंहरनयेगढ़तेशब्दमेंखोजतीहैअस्तित्वकेकारणोंको, लेखकहरदिनपन्नोंकीशहादतपरनाज़चाहकरभीनहींकरपाता. मैंखड़ाहूँउसवृक्षकेनीचेजिसेकिसीदिनगाँव

किस्सा -३ -- "तीसरा"

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Source - Pexels.com ‘वक़्तकेगुज़रनेकीआवाज़सुनीहै?’, क्याकुछभीपूछतेहोतुम. यहबातेंएकप्रेमीजोड़ाकरेगाऐसीउम्मीददार्शनिकोंकेसिवाकोईऔरक्याहीरखेगा! हाँ, लेकिननिर्मलवर्मासेप्रभावितकवियालेखकभीअकेलेबैठकरऐसा सोचसकताहै. प्रेमनेदर्शनकोबहुतहदतकअपनीगिरफ़्तमेंरखाहुआहैलेकिनदर्शनआजतकप्रेमकेइर्द-गिर्दभीनहींजासका. दुनियाकेतमामसिद्धांतोंकेसिमटनेपरप्रेमका ‘प्’ शुरुहोताहै. किस्सोंकीज़िंदगियाँबसउतनीहीहोतीहैजितनीदेरमेंपढ़नेवालाउसेपढ़जाए; बाकितोपन्नेभरनेकीप्रक्रियाकानामकहाजाताहै. मैंनेउसेकहतेसुनाथाएकदफ़ाकिजबमेरेक़रीबरहोतोदर्शनऔरसाहित्यदोनोंकोदहलीजकेउसपारहीछोड़आनाअन्यथामुझमेंतुम्हेंतीनोंमेंसेकुछभीहाथनहींलगेगा. तीसरेकीखोजमेंमैंनेदुनियाकीअच्छीकिताबोंकोढूँढकरपढ़नाचालूकरदियाहै, हालाँकिखोजअभीजारीहै. आपमेंसेकिसीकोतीसरेकेबारेमेंकुछपताचलेतोख़बरदीजियेगा...

किस्सा -२ -- बगावती जोड़ा

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वहचौराहेसेअभीअभीलौटाथाऔरयहएकघंटेमेंदूसरीबारहुआथा, शायदउसेकिसीकाइंतज़ारथा! उसकीआँखेंकिसीकोखोजरहीथी, किसे! यहलेकिनवहीजानताहैऔरवैसेभीइसदुनियामेंकौनकिसेजानपायाहैआजतक? वहकमरेमेंआयाऔरउसनेतकियेकेक़रीबरखीकिताबकोफिरसेपढ़नेमेंलगगया. किताबमेंसिरखपातेखपातेउसेझपकीलगगई. कुछदेरबारकोईउसकमरेमेंदाखिलहुआऔरउसकानामपुकारा. उसनेअनमनेमनसेआँखेंखोलींऔरकमरेमेंआयेशख्सकोबिस्तरमेंखींचकरउससेलिपटगया. यहशायदउसकीप्रेमिकाथी!वैसेइसरिश्तेकाकोईएकनामतोहैनहींऔरइनदोनोंकोसमाजकेबनायेकायदोंसेलड़नाज्यादापसंदहै. - कमलेश

किस्सा -१ -- अंतहीन यात्रा

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ट्रेन के ब्रेक अचानक लगने से उसकी नींद खुली, शायद कहीं बियाबान में रुकी थी कोई जानवर रहा होगा. हो भी क्यूँ न! आजकल हर कोई बस जानवरों सा ही दीखता है और व्यवहार करता है. उसने उठकर अपनी घड़ी देखी, स्टेशन आने में अभी २० मिनट बचे थे. थोड़ी देर बगल में झाँकने के बाद उसे लगा कि उसका सिर दर्द से फटा जा रहा है, लेकिन उसे कोई उपाय नहीं सुझा; सूझता भी क्या उसे बस यात्रा के ख़त्म होने का इंतज़ार था, लेकिन यात्रा तो बस बगैर उसके एहसासों की परवाह किये चली जा रही है. कौन जाने, यह कब और कहाँ ख़त्म होगी! - कमलेश