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कुछ बातें और

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बहुत मुश्किल होता है चंद घड़ियाँ साथ बिताकर सारी यादों को सुनहरा कर लेना, आधा वक़्त तेरी सूरत को निहारने, लटों को गालों से परे हटाने हाथों पर हाथों से कुछ भी लिखने, और पैरों के अंगूठों की झूठी लड़ाई में गुज़र जाता है हमारा । गरियाने के लिए बातों का गठ्ठर, एक दिन पहले वाली फ़ोन कॉल पर होता है बस, जो मिलने आते-आते कहीं खो जाता है, और बचती है केवल खामोशियाँ । सारी निजताओं को अचानक से परे फ़ेंक, जब लिपट जाया करते हैं एक-दूजे से हम, उन नज़दीकियों में जहां केवल हम होते हैं, तब ये महसूस होता है कि इनसे बढ़कर कुछ नहीं । Source - Flickr कुछ वायदे और आरज़ू कुछ आश्वासन और बेमतलब के झगड़े, जब बिखरने लगते हैं हमारे इर्द-गिर्द तो कोशिश यही होती है कि इन्हें जल्द समेट लिया जाए, ताकि हम लौट सकें अपनी पूरानी दुनिया में पहले की तरह, लेकिन इन यादों के साथ जीने के लिए अगली मुलाक़ात के इंतज़ार में ।                                .....कमलेश.....

कुछ बातें

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कभी कभी डरा देता है मुझको खामोश बैठ जाना तेरा मेरे पहलु में, ख़ुमारी तेरी मौजूदगी की होती तो ख़ूब है लेकिन वो अचानक भाग खड़ी होती है, तेरे मुझको छू लेने पर और मैं, महसूस करने लगता हूँ फिजिक्स के सारे सिद्धांत तेरे हाथों की नरमाहट में । Source - Pinterest बातों को बगीचे के पार धकेलते वक्त पैर के अंगूठे से तेरी पगतलियों को, छूने की वो साज़िश जब तुम भांप लेती हो, तो लगता है चाणक्य को तुम्ही ने सिखाया है । मेरे लिए खरीदा गया वो तोहफ़ा जिसे तुम यह कहकर देने से मना कर देती हो कि 'जाओ मन नहीं है तुम्हें देने का' और फिर तुम चुप हो जाती हो । तुम्हारी नज़र को सूरज की किरणों की तरहा खुद पर बिखरते देखना और भी मुश्किल हो जाता है उस वक्त, जब तुम पूछती हो कि 'चुप्पी में ख्याल क्या आते हैं तुम्हें ?' 'जानां' मैं कहना भूल गया कि सारी बातें बताई नहीं जाती, "कुछ बातें चाँद सी भी होती हैं ।"                            .....कमलेश.....

ग्राम्य मंथन - आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया का आरंभ

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"कुरपेच है राहें जीने की किस्मत इक टेढ़ी बाज़ी है, तुम हाथ पकड़ लो इरादे का राह सीधी है अगर दिल राज़ी है ।" गुलज़ार साहब की ये पंक्तियां ज़िन्दगी की परिभाषा के साथ ही उसे जी लेने का तरीका भी बताती हुई प्रतीत होती है, जिस दुनिया में हम जी रहे हैं वहां इरादों की कमी नहीं है कमी है तो बस अपने दिल की आवाज़ को सुनने की, उसे समझने की । 28 प्रतिभागी और 13 टीम मेंबर्स जब इब्तिदा में अपने साथ लाए हुए तोहफ़े एक दूजे से बांटते हैं, तब लगता है कि हमारे पास कलेक्टिव रूप से काम करने पर कितनी क्षमता और प्रतिभा है जिसका हमें सही समय पर सही उपयोग करना है । ट्रस्ट फॉल में जब रजत बिना मुड़े अपने आप को कुछ घंटे पहले मिले 6 लोगों के हाथों में ख़ुद को पकड़ने के लिए 7 फीट ऊपर से गिरा देता है तब एहसास होता है कि हममें बाई डिफॉल्ट सभी पर विश्वास करने का कोशंट है जिसे हमने वक़्त के साथ छुपा दिया है । सौ ग्राम ज़िन्दगी में घेरे में बैठा हर शख़्स जब अपने आप को सबके सामने निर्भीक होकर खोलता है तो विश्वास और रिश्तों की मजबूती का पता चलता है जिसे हम दुनिया की भीड़ में खो चुके हैं । मेरे लिए अपनी

ज़िन्दगी का किस्सा

मैंने कभी नहीं सीखा बाढ़ के पानी सा बहना, मुझे हमेशा लुभाता शांत नदी में तैरना, मैंने कभी कोशिश नहीं की सांसों को धुएं में उड़ाने की, मुझे भाता देर तक पेड़ों के नीचे बैठना। मैं कभी नहीं रह पाया किसी भी बंद कमरे में, मैं कभी नहीं मान पाया परिवार के बनाए हुए कायदे, मुझे बहुत भाती थी खुली हवा और सड़कों पर घूमना मुझे बंधना नहीं था किसी खूंटे पर इसलिए तोड़ता रहा सारे वादे और उम्मीदें। वादे आपको प्रेम महसूसने नहीं देते पर मैं डूबना चाहता हूं इस समन्दर में, मैं नहीं जता पाता अफसोस वादे के टूट जाने पर, मैं चाहता था केवल भटकना इसीलिए चुन लिए कई रास्ते, मैं मंज़िल को नहीं चाह पाया तो बना लिया एक ही लक्ष्य कोई भी पड़ाव ज़िन्दगी का मुझे थामने से डरता है अब, क्योंकि मैं समझ चुका हूं दुनिया की हर ज़रूरत को, मैं भटकता रहा पहुंच कर मंज़िल पर भी मैं खोता रहा खुद को ढूंढ कर भी, लेकिन अब मैं बख़ूबी जानता हूं कि मुझको क्या चाहिए, मेरी चाहत है कि मुझे कुछ न मिले ताकि आख़िरी सांस तक भी मैं सहज होकर प्रेम करता रहूं ।                                   -- कमलेश

छूना

मैंने अपने अंगूठे से तुम्हारे पैर को छुआ तुमने कहा कि तुम्हें गुदगुदी होती है । आज मैंने एक परी को पैंट ब्रश से छुआ उसे गुदगुदी नहीं हुई या शायद वह मुझसे कह नहीं सकती थी । मुझे तुम्हें पैर के अंगूठे से नहीं पैंट ब्रश से छूना चाहिए था ।।                                - कमलेश

-- नोट्स ::

- मैं उम्र भर तुम्हारा इंतज़ार कर सकता हूं । - उसकी कोई ज़रूरत नहीं है । - मैंने कोई वादा तो नहीं किया तुमसे । - मुझे कोई वादा चाहिए भी नहीं । वादा इंतज़ार से कोई सरोकार नहीं रखता, इंतज़ार करना किसी के वादे के साथ प्लेटफॉर्म पर खड़े रहकर किसी लेट चल रही ट्रेन के आने की उम्मीद में रहने जैसा है । इश्क़ में किसी वादे के लिए जगह नहीं होती, इश्क़ कर जाना अपने आप में ही सफलता होती है यहां किसी असफलता के लिए कोई स्थान नहीं बचता । वादे इश्क़ को कभी मुकम्मल नहीं होने देते, मैंने उससे कोई वादा नहीं किया और उसने कभी चाहा भी नहीं । इंतज़ार को उम्र भर साथ लेकर चलना किसी पेड़ के पास धूप में खड़े रहने जैसा है जिसे मैं कर सकता हूं, लेकिन वह नहीं चाहती कि मैं एक छायादार पेड़ के पास धूप में अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ार दूं ।                                                         - कमलेश

प्रेम और बदलाव

आकर्षण के सिद्धांत के अनुसार कोई भी दो चीजें एक निश्चित दूरी तक ही एक दूजे के क़रीब रह सकती है, यह नियम सारे रिश्तों को बांधे हुए है और यह दुनिया अब तक इस डर में जी रही है कि अत्यधिक नज़दीकियां भी अक्सर दूरियों की वज़ह बन जाया करती है । ज्यादा दिनों तक कोई मेहमान, मेहमान बनकर रहने लगे तो वो मेहमान नहीं रह जाता,ठीक इसके उलट अगर ज्यादा दिनों तक कोई इंसान बना रहता है तो उसे इंसान बने रहने की ज़रूरत नहीं होती । तुम्हारा मुझसे मिल जाना ऐसे ही किसी मेहमान की तरह किसी शहर के एक चौराहे पर, और फ़िर मेहमान न होकर धीरे धीरे इंसान बनते रहना किसी उम्मीद में, किसी प्लेटफॉर्म सीट पर बिलकुल मेरे बगल में बैठे बैठे, मुझे इन सारे नियमों का उलंघन लगता है । आकर्षण के सिद्धांत के सारे तर्क तुम अपने होने से ही जब झूठला देती हो तब किसी भी नियम के कोई मायने नहीं रह जाते, और फ़िर इस अविरल प्रवाह में नियमों की श्रंखला का अस्तित्व प्रेम-गंगोत्री में विलीन हो जाता है । मेरी आंखों की अलकनंदा को अपनी भागीरथी में समाहित कर, ज़िन्दगी को देव प्रयाग समझ इतनी सहजता से गंगा बना देना, किसी भी नियम के मुताबिक संभव नहीं, इसे