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प्रकृति का वादा - तुम

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प्रकृति के मूल सिद्धांतों में जुड़ाव निहित है, इसके वचनों से हर कोई भीगा हुआ है वह भी जिन्हें वादों से दूर रहना भाता है। ज़िन्दगी के लम्हों को गुज़ारते हुए एक दिन ऐसे ही प्रकृति का कोई नियम अपने चेहरे पर से पर्दा हटा सामने आ जाता है और फिर उसकी ख़ुमारी से निकलने का वक़्त ही नहीं रहता इंसान के पास। मैंने जब पहली बार तुम्हें देखा था तो मुझे महसूस हुआ कि कोई अनकहा वादा लौट आया है मुझ तक जिसे पूरा करना जीवन के निश्चित मकसदों में से एक है। तुम्हारे साथ ऐसा लगता है कि प्रकृति के साथ मेरा रिश्ता गूढ़ होता चला जा रहा है। प्रेम की परिभाषा के परे मैं महसूसना चाहता हूँ वे सारे क्षण जिनमें लिखी गईं हैं कुछ खामोशियाँ और अनगिनत एहसास। जीवन के जिस अंदाज़ से तुमने मेरा परिचय करवाया है उसे अकेले देख पाना संभव तो है किंतु सहज नहीं। वक़्त की डोर को थामे हुए अब लगने लगा है कि साधन नहीं साध्य महत्त्वपूर्ण है; मेरे जीवन के अघटित पहलुओं को तुम्हारे प्रेम से मायने मिलने की आस है और ख़ुशी भी। मुलाक़ातों के बोझ से दूर मैं चाहता हूँ कि हृदय के रास्ते हम एक-दूजे की खोज ख़बर रख पाएँ। तुमसे मिल जाना इस तरह जीवन के...

विश्वास – जीवन जीने के लिए एक अपरिहार्य गुण

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जब भी आप पीछे मुड़कर देखते हैं और अपनी जीवन यात्रा के बारे में सोचते हैं, तो एक ऐसी चीज है जिसके बारे में आप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बेहद आभारी होंगे, वह है आपकी विश्वास करने की क्षमता। अविश्वास कारक के बारे में बहुत कुछ पढ़ने और चर्चा करते रहने के लिए उपलब्ध है कि हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ यह कैसे बढ़ रहा है, या जिस समाज में हम साथ रहने की योजना बना रहे हैं वहाँ कैसे उभर रहा है! लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि विश्वास कैसे अपनी भूमिका हमारे अस्तित्व में निभाता है। एक इंसान होने के नाते हम सभी "अजनबियों" पर भरोसा करने में पैदाईशी तौर पर सक्षम होते हैं; उस महिला से जो बच्चे को जन्म देती है, लेकिन बच्चे को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं होता है, से लेकर अपनी उचित अंत्येष्टि की ख्वाहिश लिए किसी के हाथों में मरना। आप जानते हैं कि इस दुनिया में, जीवन के किसी एक या अन्य बिंदु पर, हम वैसे व्यक्ति की तरह कार्य करते हैं, जो हमारी जीवन यात्रा का हिस्सा होते हैं और दूसरों के साथ भी उसी तरह का व्यवहार करते हैं। एक ही व्यक्ति के साथ नहीं, बल्कि दूसरों के साथ भी। ब्रह्म...

जब हमारे आसपास संकट हो तब जीवन कैसा दिखता है?

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Source- globalsharingweek.org हम अक्सर शिकायत करते हैं कि हम अपने करीबी लोगों और स्वयं के लिए समय नहीं दे पाने का कारण हमारे कामों की फ़ेहरिस्त का लम्बा होना है. लेकिन अब, हम अपने परिवार के साथ हैं, पक्षियों के चहचहाहट के साथ जागते हैं और ऑफिस के लिए तैयारी करने के जैसा कुछ भी नहीं है। इसके अलावा भी, समय पर घर लौटने, ट्रैफिक-जाम का सामना करने और परिवार के साथ समय बिताने के लिए चीजों को अलग रखने के लिए घबराने की ज़रूरत नहीं बची है। इन सभी गहरी इच्छाओं की पूर्ति का समय मिलने के बावजूद, आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हम में से कई तनावग्रस्त हैं और इसे मैनेज करने के लिए काउंसलर तक खोज रहे हैं, लेकिन हम ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या जिस तरह से हम महसूस करते हैं, बोलते हैं और काम करते हैं उसके बीच एक बड़ा अंतर है?      हमने कभी नहीं सोचा था कि इस तरह का जीवन भी हमारे हिस्से में होगा। हम अपने माता-पिता, भाई-बहनों, बच्चों और परिवार के सदस्यों के साथ पूरे पूरे दिन और रात बिता रहे हैं और साथ ही घर से ही अपने काम को अच्छे से मैनेज भी कर रहे हैं। और साथ में दुनिया के हर कोने से ...

तुम्हारे अधर

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Source - artist.com बारिशें खंगाल रही हैं धरती की कोख़ आंधियाँ पलट रही है तमाम वस्त्र, लोग भूलते जा रहे हैं  जो कुछ देखा, किया और सीखा उन्होंने, रातें छुपी हुई हैं दीवारों के पीछे दिन ढूँढ रहा है पनाह एक गड्डे में; आँखें चीख रही हैं मौन  हाथ लिखते जा रहे हैं भविष्य, पैरों को भुला गई हैं सारी राहें, थकान भर चुकी हैं साँसों में। तुम आती हो तब जीवन के संताप को हरने, मैं हो जाता हूँ ग़ुम तुम्हारे हाथों की परिधि में। मिट जाती हैं व्यंजनाएँ तमाम एक प्रेम से सरोबार आलिंगन में, खुलते हैं इन्द्रियों के पैबंद चटकने लगते हैं दिनो-रात। प्रकृति के इस पुनर्जीवन पर सृष्टि-सर्जन के गीतों को गाते तुम्हारे सुकोमल गुलाबी अधर; मैं रख देता हूँ  अपने मुख को उन पर, पढ़ने को वे तमाम रतजगे विषाद के दिनों से संजोये हुए: जो कहने आयीं तुम अपने अधरों पर रखकर।                                 - कमलेश

२१ साल और बातें

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                                     कई दफ़ा हम नहीं जान पाते कि हम कैसे जी रहे हैं लेकिन जब हमें बिन ढूँढे इस सवाल का जवाब मिल जाता है तो ऐसा लगता है कि हमसे ख़ुशकिस्मत इंसान इस दुनिया में नहीं है. आप कहीं भी रहो, आप कभी भी अकेले नहीं रहते आपके साथ आपका अनुभव, आपकी रिवायतें, आपके रिश्ते, आपका परिवार और आपका प्रेम जैसी कई चीजें आपके साथ रहती हैं. मैं पिछले कुछ दिनों में इन बातों को और बेहतर तरीके से जानकर आत्मसात कर पाया हूँ क्योंकि मैं एक ऐसे वातावरण का हिस्सा रहा हूँ जिसने मुझे ख़ुद के प्रति थोड़ा और दयावान होने की प्रेरणा दी है. मेरे जीवन के २१ सालों में मैंने अपने वातावरण और इस जीवन से कितना प्रेम किया है यह तो मैं नहीं जानता लेकिन मैं क्या सीख सकता हूँ इस प्रेम, विश्वास और समर्पण से उपजे मेरे जीवन से, यह ज्यादा स्पष्ट दीखता है मुझे. जब मैं अपने प्रियजनों से कई मील दूर अपने आपको टटोलने में वयस्त था तब यही प्रियजन मुझे मेरे जीवन के अनमोल क्षण का अनुभव देने की कोशिश में लगे हुए थे, जब आप ख़ु...

अंतर और समानताएं

किन्हीं दो चीजों में अंतर का ना होना, उनको कभी भी समान नहीं बना पाया । ठीक उसी प्रकार कि जैसे किसी दो चीज़ों के समान होने पर भी, उनमें खोज लिया गया कोई एक अंतर । इतनी अनेकताएं ह...

तेरी तारीफ़

हजारों साल पहले किसी ने लिखी थी चाँद पर कविता, अब वह बूढ़ा हो चला है । जब भी कभी निकलता है तारों की गठरी कांधे पर लिए उससे छुट जाती है आजकल, आसमान में किसी पत्थर की ठोकर से, और बिख...

घूमते हुए

        जरूरी नहीं कि हमारे आसपास की हर चीज सही हो, कुछ परिस्थितियां होती है जिनमें हमें खुद को उनके अनुरूप या उनको हमारे अनुकूल बनाना पड़ता है । अक्सर हम ये मान लेते हैं कि परिस्थितियों के अनुकूल हो जाना ज्यादा ठीक रहेगा लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि वर्तमान समय के जाने कितने ही मुद्दे और समस्याओं के अनुरूप हम खुद को एक क्या पूरे दस जीवन में भी नहीं ढाल सकेंगे । जब भी कभी   घुमने निकलता हूँ तो कुछ मुद्दे अनायास ही मुझे आ-पकड़ते हैं और मैं उनसे उलझा रहता हूँ, उनसे निरंतर, हर बार, हर सफ़र पर झगड़ते हुए इतना तो समझ आता है कि अगर हर व्यक्ति केवल खुद गंभीर होकर बस एक दफा उनका ख्याल करे तो यह तय है कि इन समस्याओं का एक आम समाधान निकल सकता है । यह समाधान चाहता है कि “शुरुआत जो भी हो स्वयं से हो अन्यथा न हो”, वैसे देखा जाये तो आज के समय में ऐसे मामले गाँधीवादी विचारधारा से अत्यधिक सरलता से सुलझाये जा सकते हैं बजाय कि इन्हें व्यर्थ मतलब की आंच पर सेंकने के ।                 ...