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प्रकृति का वादा - तुम

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प्रकृति के मूल सिद्धांतों में जुड़ाव निहित है, इसके वचनों से हर कोई भीगा हुआ है वह भी जिन्हें वादों से दूर रहना भाता है। ज़िन्दगी के लम्हों को गुज़ारते हुए एक दिन ऐसे ही प्रकृति का कोई नियम अपने चेहरे पर से पर्दा हटा सामने आ जाता है और फिर उसकी ख़ुमारी से निकलने का वक़्त ही नहीं रहता इंसान के पास। मैंने जब पहली बार तुम्हें देखा था तो मुझे महसूस हुआ कि कोई अनकहा वादा लौट आया है मुझ तक जिसे पूरा करना जीवन के निश्चित मकसदों में से एक है। तुम्हारे साथ ऐसा लगता है कि प्रकृति के साथ मेरा रिश्ता गूढ़ होता चला जा रहा है। प्रेम की परिभाषा के परे मैं महसूसना चाहता हूँ वे सारे क्षण जिनमें लिखी गईं हैं कुछ खामोशियाँ और अनगिनत एहसास। जीवन के जिस अंदाज़ से तुमने मेरा परिचय करवाया है उसे अकेले देख पाना संभव तो है किंतु सहज नहीं। वक़्त की डोर को थामे हुए अब लगने लगा है कि साधन नहीं साध्य महत्त्वपूर्ण है; मेरे जीवन के अघटित पहलुओं को तुम्हारे प्रेम से मायने मिलने की आस है और ख़ुशी भी। मुलाक़ातों के बोझ से दूर मैं चाहता हूँ कि हृदय के रास्ते हम एक-दूजे की खोज ख़बर रख पाएँ। तुमसे मिल जाना इस तरह जीवन के...

अँधेरे से उपजता उजाला -

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  Source - ephotozine.com कभी ऐसा हुआ है कि आप अपनी ही धुन में चले जा रहे हैं और किसी ने आपको धक्का देकर झकझोर दिया हो? क्या कभी इस बात की तरफ ध्यान गया है कि जो उजाला आपकी आँखें इस दुनिया में देख रही हैं वह किन अँधेरे गलियारों से होकर आ रहा है? या यह महसूस करने का यत्न किया है कि जीवन में पल रही तमाम वेदनाएँ और नफ़रत एक मार्मिक चुम्बन के आगे कोई अस्तित्व नहीं रखती! मैंने अपने रास्तों के अनगिनत क्षणों में ख़ुद को ऐसी अवस्था में पाया है जहाँ से मैं सिर्फ अपना सुख और उसके इर्दगिर्द फैला अँधेरा ही देख पाता हूँ. यह सुख असीम स्वार्थ और उतनी ही वासनाओं में लिपटा होता है और पल-पल इसमें वृद्धि ही होती है; इसके विपरीत उजियारे के उस ओर पल रहे अँधेरी वादियों का जुगनू मुझे हर बार उसी गर्त में झटकने में मशगूल रहता है जहाँ से सिवाय पीड़ा के कुछ हासिल नहीं होता. तमाम उम्र आदर्शों के मुखौटे पहने रहते हुए ऐसा समय भी आया है कि मैंने अपने ही कई हिस्सों का अस्तित्व सिरे से नकार दिया है. घट चुके या घट रहे क्षणों को लिखना आसान तो नहीं है लेकिन उतना दुर्गम और अयोग्य भी तो नहीं!  जितनी बार मुझे जीवन में...

प्रेम-पीयूष

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Source - flickr.com मैं खोजता फिर रहा था बीते कुछ महीनों से अपने क्लांत मन के व्यग्रभावों में शांति, जो मुझे कई सालों से भी लम्बे प्रतीत हुए. अपनी तमाम बारीकियों और निर्लज्जता के साथ संसार करता रहा अनवरत ढंग से मेरे धैर्य और सीमाओं की परीक्षा: जिसका परिमाण मैं नहीं जानता. इन दुविधाओं के बीच से गुजरती राहों में एक दिन जब तुम्हारे समीप से गुजरी बयार मुझ तक आयीं तो अंतस ने एक ठहराव जान ख़ुद को रोक लेने का निर्णय लिया; वह सही है या नहीं इसे सोचने के लिए अब वक़्त नहीं. जीवन के चिर-सन्नाटे के स्पंदन में सुनी मैंने आँखों में गूँजती आहटें और देख पाया तुम्हारे नयन कलशों में भरे असंख्य प्रश्न जो मेरे अपने थे. तुम्हारे साथ मैं मौन में भी एक अविरल संवाद पा जाता हूँ और हर बार यह जान कर हतप्रभ रह जाता हूँ कि कितना कुछ छुपा है तुम्हारे अस्तित्व के उपवन में! तुम्हारे संग मैंने खोजी अपने अस्तित्व की नई शाखाएँ. तुम्हारे लहराकर उलझते केशों ने सुलझाई मेरी अनगिनत पहेलियाँ और एक धुरी पर घूमते मेरे अकिंचन सपनों को मिला तुम्हारे अधरों से प्रेम-पीयूष. विशिष्ट सी महसूस होती कुछ संकोच की दीवारों का...

नाश्ते की टेबल

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Source - Wallpaperflare.com ए क लड़का अपनी थोड़ी सहमी और थोड़ी उत्सुक शक्ल लिए नाश्ते की टेबल पर बैठा हुआ था। कुछ नए चेहरों को उसने ख़ुशी से देखा और उनकी ओर पहचान बढ़ाने के लिए उठकर चल दिया। कुछ ही समय बाद नाश्ते की टेबल पर हँसी का ठहाका गूँज गया , नए मिले दोस्तों के साथ अब बातों ने ठिठोली की राह पकड़ ली थी। नाश्ते के बाद सारे लोग वहाँ से उठकर आसपास घूमने के लिए चल दिये , पास के बगीचे में पानी छोड़ा हुआ था किसी ने। अचानक नए दोस्त सूरज ने नली उठाकर सबको गीला करना शुरु कर दिया , अकस्मात हुए हमले से बचने के लिए सबने अपने रास्ते खोजने की कोशिश की लेकिन एक लड़की वहीं मुस्कुराती हुई सूरज के इस कृत्य पर थोड़ी ख़ुश थोड़ी नाख़ुश सी ठहर गई। कुछ देर की मस्ती के बाद जब सब ने फोटो सेशन शुरू किया तो उस लड़की ने सबकी हँसते हुए फोटो लेने पर जोर दिया। वह इसी तरह मुस्कान को अपने चेहरे पर रख सारा दिन घूमती रही और सबसे पहले नाश्ते की टेबल पर पहुँचने वाला लड़का अपने प्रोग्राम के पहले दिन को जी लेने में जुट गया। एक लड़का जिसका नाम हम क्या रख सकते हैं , चलो कृष्ण रख लिया जाए और लड़की को कोई न कोई नाम देना ही पड़ेगा नह...

तुम्हारा अस्तित्व

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यह दुनिया छोटी लगने लगी है मुझको, एक  शख्स पर इतना ठहर गया हूँ  मैं!                                               - नागेश इंतज़ार की परिभाषा को मैं, उसकी आँखों को देखने के बाद हाशिये पर रख देता हूँ। इतना बड़ा आसमान लेकिन फिर भी अपने आप तक पहुँचने के लिए उसके पास कोई तरीका नहीं है, मैं रख देता हूँ अपना सर उसके हाथों में और मिल जाता हूँ ख़ुद से उसके ज़रिये। वह ठहरती है दो पल के भ्रम में दो पहर तक तो ऐसा लगता है दिन को थोड़ा और बड़ा होना चाहिए। मैं जब भी उसके क़रीब होता हूँ मुझे यह दुनिया ऊन का गोला लगती है जिससे मेरी चाह है कि इसका स्वेटर बुनकर चाँद को ओढ़ाया जाए। एक ख़याल को जीते हुए इतना अरसा हो गया मुझे, आज जब उसे पीछे छोड़ा तो वह उसके बालों में लिपटे क्लिप तरह इतराता हुआ दौड़ पड़ा मेरी ओर। इतना दूर आ चूका हूँ चलते चलते कि अब लौटने के लिए मुझे पते की नहीं किसी के...

इंतज़ार और तुम

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तुम देखती हो थोड़ी सी गर्दन झुकाकर मेरी ओर तो ऐसा लगता है कि सूरजमुखी देख रहा है सूरज को। सातों आसमान के पार से जब गूँजता है तुम्हारा स्वर तो इतनी ज्यादा ख़ुशी होती है कि मैं जून में भी नंगे पैर चल लेता हूँ। तुम मिली इस दफा मुझे पहाड़ों की गोद में, जहाँ मुझे कई जन्मों से आना था शायद: वहाँ आकर तो यही लगा था मुझे, तो घर वापसी जैसा भाव पैदा हो गया। तुम्हारे साथ प्रकृति को इतना सहज पाता हूँ जैसे कि किसी ने इसकी जंज़ीरें खोल दी हों, तुम खिल उठती हो जब पानी की चंद बूँदों से तो मेरा मन करता है कि उतार दूँ बादलों का तमाम पानी जो तुम तक पहुँच कर अपना जीवन सफल कर ले। जिस तरह दुनिया संजो रही है सारे सूत्र और समीकरण, मुझे ऐसा लगता है उसने तुम्हें पहचाना ही नहीं अब तक, कभी कभी जी करता है कि बिग बैंग थ्योरी वाले वैज्ञानिक को तुमसे मिलाऊँ, ताकि वो अपनी भूल सुधार सके। तुम्हारे साथ रहता हूँ तो अकेलेपन के सारे सिद्धांत मुझे खोखले लगते हैं, तुम जब डर जाती हो किसी जानवर से, उससे अपना प्रेम जाहिर करते हुए तो तुम्हें भँवरा बनकर छेड़ने को जी करता है।          ...

सुनो दोस्त!

मनु के लिए - (14-जुलाई-2019) कुछ रिश्ते नदी में बहते फूलों की तरहा होते हैं, मैं बहकर आ गया तुम तक ऐसी ही एक आनंदमयी लहर के साथ, तुम्हें देखकर लगा नहीं मुझे कि मिला हूँ तुमसे मैं सिर्फ क...

ज़िन्दगी का पर्याय - घर

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ज़िन्दगी के रास्तों में ख्वाबों की खटपट जारी है पिताजी जब घर से फ़ोन करते हैं, तो चेहरे पर मुस्कान तारी होती है और दिल में एक नया ख्याल पनपता है, बहुत दिन हुए माँ की आवाज़ सुने भी; सपने तो सारी दुनिया एक जैसे देखती है, बस चलते हुए घड़ी का वक़्त हाथ में नहीं रहता। मैं खींच रहा हूँ, पेड़ की जड़ में अटकी रस्सी घर की ख्वाहिश है कि देखे मेरी सूरत, मैं लेकिन लिपट कर सोना चाहता हूँ दादाजी के पुराने कम्बल से; चार नए आम के पेड़ भैया-भाभी ने लगा दिए हैं घर के आगे, बस पिताजी और माँ के साथ नीम के नीचे रखे तख़्त पर बैठ चाय पीना बाकी है: कुछ रातें चूल्हे के सामने बैठकर, बतियाना चाहता हूँ जी भरकर भैया-भाभी से। बच्चों के साथ मिट्टी में खेलते हुए खुद को भुला देना चाहता हूँ, आम तोड़ने हैं कभी उचककर मुझको जब कोई ज़िद करे कि आम चाहिए उसे। ज़िन्दगी से चार ख़्वाब मैं अपने हक़ की तरह ले लूँगा, आम, नीम, चाय, तख़्त और बातें मेरे बच्चों से ले लिया है मैंने ये उधार, प्रेम की परछाईयाँ जो खनकती है मेरे पहलुओं में, चाहता हूँ कि मुझे चाँद की तरह देखने वाली लड़की के हिस्से में भी बराबरी से...

तुम्हारे गले लगकर

तुम्हारे गले लगकर, मैंने जाना कि ख़ुशी, सुकून, प्रेम और इंतज़ार को किस तरह जिया जाता है! तुम्हारे हाथों में अपने हाथों को छोड़कर, मैं जान पाया कि तरंगों का जीवन क्या होता है! तुम्...

प्रेम फलित होता ही तब जब जीत कर रह जाए हारा

प्रेम के वशीभूत होकर लिखता जा रहा है वह निरंतर, है घिरा सब ओर से भीड़ भाव और राग से, खोता जा रहा नित् ही पर हर क्षण अजर एकांत में: तुम रुको क्षण भर देखो दीखता क्या तुम्हें पन्नों ...

हमारा जीवन

वक़्त और मौत मेरे विश्वास, और तुम्हारे प्रेम को इतना कमज़ोर कभी भी नहीं बना सकते कि हम उठ न सकें, मुक्त न कर सकें किसी को उसके जीवन से, जीवन की मुक्ति केवल देह से रूठकर चले जाने म...

ख़ताओं की पवित्रता

ख़तायें, कितना छोटा और पेचीदा है यह देखने और सोचने में, लेकिन मैंने कभी इतना ख़याल किया नहीं इस शब्द पर, शायद मैं ज़रूरतों को वक़्त देने में व्यस्त था जिसका परिणाम यह हुआ कि ज़िन्द...

प्रेम मुलाक़ात

"पहली बारिश को भी नहीं नसीब, कहाँ से लाती हो अपने गेसुओं में वो ख़ुशबू!" इन पंक्तियों के साथ मैंने तुम्हें अपने भीतर उतारा, जब तुम कई सौ किलोमीटर से मेरे नज़दीक चली आयी। तुम्हें द...

अँधेरे में तुम

तराशता है जुगनू अपने पंख रात की ख़ामोशियों से, फिर ढलक जाते हैं किसी की पलकों से आँसू जब रात सीढ़ियाँ चढ़ रही होती है। मेरे शहर के कंधों पर वज़न बढ़ जाता है रात के होने का, जब तुम देख...

काफी नहीं होगा

मेरे आसुंओं पर बड़ा देना यूँ रुमाल काफी नहीं होगा, हर बार की तरहा मेरे ग़म बाँट लेना काफी नहीं होगा। वक़्त बाँटने की कीमतें आसमान छूने लगी हैं अब तो, सिर्फ एक शाम के लिए यहाँ आना ...

मुस्कुराहट और तुम

मुस्कुराहटों का मोल नहीं लगाया जा सकता, जब तक यह हमारे होंठो पर रहती है मन तृप्त रहता है । मुस्कान ज़िंदगी में बेवजह ही रहे तो अच्छा है जैसे कि तुम्हारे होंठो पर होती है मानो ...

राहें, प्रेम और मैं

कुछ रास्ते आपको कभी मंज़िल तक नहीं ले जा पाते, ऐसे रास्ते सिर्फ भटकने के लिए बने होते हैं । जब ज़िंदगी का स्वाद थोड़ा भी ऊपर नीचे लगने लगे तो उसमें प्रेम का तड़का मारना आवश्य...

आम

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Source - Exotic Flora खेत की मेड़ पर लगा है बूढ़े आम का एक पेड़, डाली पे मोड़¹ आने पर जिसकी मैं इंतज़ार करना शुरु करता था कच्ची केरियों के आ जाने का । जेठ में दादाजी सुनाते थे बड़े चाव से हाग² पाड़ने के किस्से, मैं तोड़ लाता था केवल दो हाग मेरे और दादाजी के लिए, जिसका स्वाद अब नहीं आता कार्बन से पके आम में । जब से दादाजी गए हैं मैंने नहीं सुना कोई भी किस्सा हाग का, शहर की सड़कें इतनी तंग हैं कि आम ढूंढने पर भी नहीं मिलता, मिल भी जाए अगर कहीं तो उस पर मोड़ नहीं दिखता होली पे । परसों देखा था बगीचे में एक पेड़ बाहर लेकिन एक तख्ती टंगी थी, "यहां से फल तोड़ना मना है" ।                                     - कमलेश नोट -- मोड़ - होली के आसपास आम पे आने वाले फूल ।। हाग - पेड़ पर ही पका हुआ आम ।।

कहानी ( सामान्य से शून्य )

सुबह के चार बजे शशांक बिस्तर से निकलकर छत पर जाकर टहलने लगा, वह शायद किसी सपने से जाग गया था ऐसा उसकी आँखों को देखने पर अनुमान लगाया जा सकता था | पूरी रात बिस्तर पर माहौल से अनभि...