शहर
कोई भूलता नहीं अब रास्ते यहाँ सो भटकने की गुंजाइशें कम हो रही हैं, रास्ते नहीं आते लौटकर वापस अब शायद पीठ की आँखों पर पट्टी चढ़ गई है, दिन भर दौड़ता है सड़कों पर ये शहर, इसकी साँसे ...
जिंदगी की राहों से गुज़रते हुए अपने कुछ अनुभव साथ लिए चल रहा हूँ, यहाँ मेरे अन्तर्मन से उपजे प्रेम, समाज, जिंदगी, देश आदि के बारे में विचारों को आप पाएंगे ।