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अँधेरे से उपजता उजाला -

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  Source - ephotozine.com कभी ऐसा हुआ है कि आप अपनी ही धुन में चले जा रहे हैं और किसी ने आपको धक्का देकर झकझोर दिया हो? क्या कभी इस बात की तरफ ध्यान गया है कि जो उजाला आपकी आँखें इस दुनिया में देख रही हैं वह किन अँधेरे गलियारों से होकर आ रहा है? या यह महसूस करने का यत्न किया है कि जीवन में पल रही तमाम वेदनाएँ और नफ़रत एक मार्मिक चुम्बन के आगे कोई अस्तित्व नहीं रखती! मैंने अपने रास्तों के अनगिनत क्षणों में ख़ुद को ऐसी अवस्था में पाया है जहाँ से मैं सिर्फ अपना सुख और उसके इर्दगिर्द फैला अँधेरा ही देख पाता हूँ. यह सुख असीम स्वार्थ और उतनी ही वासनाओं में लिपटा होता है और पल-पल इसमें वृद्धि ही होती है; इसके विपरीत उजियारे के उस ओर पल रहे अँधेरी वादियों का जुगनू मुझे हर बार उसी गर्त में झटकने में मशगूल रहता है जहाँ से सिवाय पीड़ा के कुछ हासिल नहीं होता. तमाम उम्र आदर्शों के मुखौटे पहने रहते हुए ऐसा समय भी आया है कि मैंने अपने ही कई हिस्सों का अस्तित्व सिरे से नकार दिया है. घट चुके या घट रहे क्षणों को लिखना आसान तो नहीं है लेकिन उतना दुर्गम और अयोग्य भी तो नहीं!  जितनी बार मुझे जीवन में...

दुनिया की जरूरतें

आया तो उड़कर एक ही पत्थर था, लेकिन उसने दो आंखों में अँधेरा और साथ की दस नज़रों में खून भर दिया। रास्ते तो लगे ही थे दस साल की पीठ पर टंगे बैग की हिफाज़त में, लेकिन अभी अभी इंसान से ...

किसान

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Source - IndiaTv पहली बरसात में भीगी माटी जान से भी ज्यादा प्यारी होती है उसे, जब स्कूल से बेटी के लौटने पर उसका माथा चूमता है वह, वैसे ही चूम लेता है खेत को। चाँद के ग़ुम हो जाने पर छाया सूनापन उसके होंठो से दिखाई पड़ता है, हर दफ़ा जब फैक्ट्रियाँ उसके हिस्से की बारिश और सर्दी छीन लेती है, वह चाहता है इतना कि एक चादर में उसके दोनों बच्चे चैन से सो सकें। परेशान जब हर तरफ से हो वह निकलता है अपने हक़ के लिए, बाज़ की तरह झपट पड़ते हैं सारे ठेकेदार उस पर, शायद वो नहीं जानते रोटी गेहूँ से बनती है; उसने नहीं भरा धान ज़रुरत से ज्यादा कभी भी अपनी कोठरी में, नहीं बहाया पैसा कभी ही फिज़ूल। एक मैना ढूंढ रही है वीराने में अपने घोंसले के लिए एक पेड़, वो ढूंढता है अपनी खोई आवाज़ जिससे उसे उम्मीद है कि वह पेड़ के झूले की रस्सी को, फंदे में बदलने से रोक लेगी।                                - कमलेश *जरूरी है कि अब हम अपने खाने के...

ग़ुलामियत का कक्ष

हम सब जड़ हो चुके हैं और देख रहे हैं अपलक उस श्वेतपत की ओर, जंहा आजाद है कुछ काले वर्ण, जो हमें अपना ग़ुलाम बनाए हुए हैं हमारी सोच भी सिमट चुकी है अब उन्हीं के इर्द-गिर्द ही |   कमरे में खिड़की तो है लेकिन दृश्य के लिए ना कि दर्शन को, विचारों को तो बंदी बना चूका है वो उपाधिधारक, जिसके समक्ष हमारी सोच कठपुतली बनी हुई है | और हम सब झुझ रहें हैं, एक अदृश्य युद्ध से जो छिड़ा है हमारी आवाज़ और सोच के बीच | मजबूर हैं वे लोग जिन्हें किताबों ने कैद कर लिया है, कुछ नज़र नहीं आ रहा है उन्हें ऐसे ही वे अंधे ठोकर खाकर मार दिए जायेंगे |   सहसा मुझे दिखाई पड़ता है वह मजबूर वृक्ष, जो हाथ जोड़े खड़ा था मानव के समक्ष, फिर भी उसकी सांसें थामकर इस कक्ष को आकार दिया गया है |   मैं अब चाहता हूँ कि किताब के पीछे की मासूमियत को पहचाना जाये, ढूंढ लिया जाये वो दर्द जो अब तक अनदेखा किया गया विचारों की पराधीनता के चलते, उतार दिया जाये वो असहनीय बोझ, जिसको हम सब   ...

उम्मीद

एक उम्मीद जब वह दिखे, तुमको किसी मासूम की आँखों में, तो कोशिश करना कि तुम उसे हौसला दे सको । दिख जाए तुम्हें जब वह, किसी के लाचार चेहरे पर चाह रखना कि तुम, मान रख सको उसका । इस तरह...

भगवान् होने के लिए. . .

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  Source - How.fn कोई हलचल तो होगी इस विरान बियाबान में, कोई कोयल तो कूकेगी जीवन के इस उपवन में, उल्लास निरंतर आएगा मायूसी समेटे आँगन में, रोशनी का उत्सव होगा अंधेरे पर श्री के बाद, खुशी जन्म लेगी फिर दुख के निर्वाण के लिए, घर को त्याग कोई जाएगा पिता की प्रतिष्ठा के लिए, हलाहल का पान करेगा वो समूचे जग के हित को, राधा भी विरह में तड़पेगी प्रेम की अमरता के लिए, कोई अवतरित होगा यँहा खुद भगवान् होने के लिए ।                            .....कमलेश.....