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प्रेम-पीयूष

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मैं खोजता फिर रहा था बीते कुछ महीनों से अपने क्लांत मन के व्यग्रभावों में शांति, जो मुझे कई सालों से भी लम्बे प्रतीत हुए. अपनी तमाम बारीकियों और निर्लज्जता के साथ संसार करता रहा अनवरत ढंग से मेरे धैर्य और सीमाओं की परीक्षा: जिसका परिमाण मैं नहीं जानता. इन दुविधाओं के बीच से गुजरती राहों में एक दिन जब तुम्हारे समीप से गुजरी बयार मुझ तक आयीं तो अंतस ने एक ठहराव जान ख़ुद को रोक लेने का निर्णय लिया; वह सही है या नहीं इसे सोचने के लिए अब वक़्त नहीं. जीवन के चिर-सन्नाटे के स्पंदन में सुनी मैंने आँखों में गूँजती आहटें और देख पाया तुम्हारे नयन कलशों में भरे असंख्य प्रश्न जो मेरे अपने थे. तुम्हारे साथ मैं मौन में भी एक अविरल संवाद पा जाता हूँ और हर बार यह जान कर हतप्रभ रह जाता हूँ कि कितना कुछ छुपा है तुम्हारे अस्तित्व के उपवन में!

तुम्हारे संग मैंने खोजी अपने अस्तित्व की नई शाखाएँ. तुम्हारे लहराकर उलझते केशों ने सुलझाई मेरी अनगिनत पहेलियाँ और एक धुरी पर घूमते मेरे अकिंचन सपनों को मिला तुम्हारे अधरों से प्रेम-पीयूष. विशिष्ट सी महसूस होती कुछ संकोच की दीवारों का कंचुकी के स्वतंत्रता पाने के साथ ही…

उन दिनों की दीवारों से -

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ज़िन्दगी बिना दीवारों का एक कमरा है. ताउम्र ख़्वाबों को खोजते खोजते यह महसूस होता है कि हर कोई बस बाँध लेना चाहता है लेकिन यह अधूरा सच है. पूरा सच है कि जितनी बार मुझे लगा कि मुझे बाँधा जा रहा था उतनी ही बार मैं अपनी आज़ादी को और क़रीब से देखकर उसके लिए अपना रास्ता तैयार कर रहा था. चलते चलते न जाने कब कुछ दीवारें मुझे इतनी भा गई कि मैं उन्हें महसूसने के लिए बार बार लौटता रहा. ऐसा नहीं था कि मुझे बंदिशें भाती थीं पर मैं उन दीवारों का शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने मुझे उस वक़्त में सुना जब मेरे क़रीब किसी के कान नहीं थे, उन्होंने मुझे उस वक़्त देखा जब मैं अकेले घुटनों में सिर देकर रोता रहा लेकिन वे नि:शब्द सी मेरे कन्धों पर हाथ रखे मुझे एहसास कराती रही कि वे मेरे साथ हैं चाहे फिर कुछ भी हो और एक दिन मैंने अपनी आज़ादी चुनी उनकी कीमत पर. शायद यही इंसान के ख़्वाबों की नियति होती है कि जिस अँधेरे ने उसे सब कुछ सिखाया होता है वह उसी की कीमत पर अपनी रौशनी हासिल करता है. 
             मैं दुनिया से दूर जब अँधेरी रातों में तारों की रौशनी के साथ अपनी ख़ामोशी और अकेलापन बाँट रहा था तब चाँद मुझे बुरा नहीं लगा, …

विश्वास – जीवन जीने के लिए एक अपरिहार्य गुण

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जब भी आप पीछे मुड़कर देखते हैं और अपनी जीवन यात्रा के बारे में सोचते हैं, तो एक ऐसी चीज है जिसके बारे में आप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बेहद आभारी होंगे, वह है आपकी विश्वास करने की क्षमता। अविश्वास कारक के बारे में बहुत कुछ पढ़ने और चर्चा करते रहने के लिए उपलब्ध है कि हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ यह कैसे बढ़ रहा है, या जिस समाज में हम साथ रहने की योजना बना रहे हैं वहाँ कैसे उभर रहा है! लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि विश्वास कैसे अपनी भूमिका हमारे अस्तित्व में निभाता है। एक इंसान होने के नाते हम सभी "अजनबियों" पर भरोसा करने में पैदाईशी तौर पर सक्षम होते हैं; उस महिला से जो बच्चे को जन्म देती है, लेकिन बच्चे को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं होता है, से लेकर अपनी उचित अंत्येष्टि की ख्वाहिश लिए किसी के हाथों में मरना।
आप जानते हैं कि इस दुनिया में, जीवन के किसी एक या अन्य बिंदु पर, हम वैसे व्यक्ति की तरह कार्य करते हैं, जो हमारी जीवन यात्रा का हिस्सा होते हैं और दूसरों के साथ भी उसी तरह का व्यवहार करते हैं। एक ही व्यक्ति के साथ नहीं, बल्कि दूसरों के साथ भी। ब्रह्मांड में …

रिश्तों की ज़िन्दगी

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किस्सा - ४ -- सच की खोज

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नदीकापानीकभीभीलौटकरनहींआता, ऐसाकिसीदार्शनिकनेसालोंपहलेकहाथा. मैंजबकभीकिसीनदीकेकिनारेहोताहूँमेरीआँखेंकुछनकुछखोजनाशुरुकरदेतीहैं. क्याखोजरहीहोतीहैयहआजतकजाननामुश्किलरहाहै. मुश्किलेंहवाओंसीहोतीहैंज़राअड़ियलऔरबेबाक; किसीकीसुननेकेलिएउनकेपासवक़्तनहींहोता. ज़िन्दगीकीराहोंमेंपेड़सेज्यादामुश्किलोंकापहराहैक्योंकिहरकदमइंसानकेज्ञानकादायराबढ़जाताहै. जितनाज्यादाज्ञानहोगा, अंतसकीवेदनाउतनीहीअधिकहोगीयहप्रमाणितकियाजारहाहैसदियोंसे, इनसदियोंकेबीततेलम्होंमें. वेदनाकाकवचभेदनेबुद्धभीचलेथे, सालोंखोजतेरहेऔरअंतमेंक्यापाया; यहीकि ‘अपनासचआपहीखोजेंतोबेहतरहैमेरासचआपकेकिसीकामकानहीं’. दुनियाकीतमामकिताबेंहरनयेगढ़तेशब्दमेंखोजतीहैअस्तित्वकेकारणोंको, लेखकहरदिनपन्नोंकीशहादतपरनाज़चाहकरभीनहींकरपाता. मैंखड़ाहूँउसवृक्षकेनीचेजिसेकिसीदिनगाँव

किस्सा -३ -- "तीसरा"

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Source - Pexels.com ‘वक़्तकेगुज़रनेकीआवाज़सुनीहै?’, क्याकुछभीपूछतेहोतुम. यहबातेंएकप्रेमीजोड़ाकरेगाऐसीउम्मीददार्शनिकोंकेसिवाकोईऔरक्याहीरखेगा! हाँ, लेकिननिर्मलवर्मासेप्रभावितकवियालेखकभीअकेलेबैठकरऐसा सोचसकताहै. प्रेमनेदर्शनकोबहुतहदतकअपनीगिरफ़्तमेंरखाहुआहैलेकिनदर्शनआजतकप्रेमकेइर्द-गिर्दभीनहींजासका. दुनियाकेतमामसिद्धांतोंकेसिमटनेपरप्रेमका ‘प्’ शुरुहोताहै. किस्सोंकीज़िंदगियाँबसउतनीहीहोतीहैजितनीदेरमेंपढ़नेवालाउसेपढ़जाए; बाकितोपन्नेभरनेकीप्रक्रियाकानामकहाजाताहै. मैंनेउसेकहतेसुनाथाएकदफ़ाकिजबमेरेक़रीबरहोतोदर्शनऔरसाहित्यदोनोंकोदहलीजकेउसपारहीछोड़आनाअन्यथामुझमेंतुम्हेंतीनोंमेंसेकुछभीहाथनहींलगेगा. तीसरेकीखोजमेंमैंनेदुनियाकीअच्छीकिताबोंकोढूँढकरपढ़नाचालूकरदियाहै, हालाँकिखोजअभीजारीहै. आपमेंसेकिसीकोतीसरेकेबारेमेंकुछपताचलेतोख़बरदीजियेगा...

किस्सा -२ -- बगावती जोड़ा

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वहचौराहेसेअभीअभीलौटाथाऔरयहएकघंटेमेंदूसरीबारहुआथा, शायदउसेकिसीकाइंतज़ारथा! उसकीआँखेंकिसीकोखोजरहीथी, किसे! यहलेकिनवहीजानताहैऔरवैसेभीइसदुनियामेंकौनकिसेजानपायाहैआजतक? वहकमरेमेंआयाऔरउसनेतकियेकेक़रीबरखीकिताबकोफिरसेपढ़नेमेंलगगया. किताबमेंसिरखपातेखपातेउसेझपकीलगगई. कुछदेरबारकोईउसकमरेमेंदाखिलहुआऔरउसकानामपुकारा. उसनेअनमनेमनसेआँखेंखोलींऔरकमरेमेंआयेशख्सकोबिस्तरमेंखींचकरउससेलिपटगया. यहशायदउसकीप्रेमिकाथी!वैसेइसरिश्तेकाकोईएकनामतोहैनहींऔरइनदोनोंकोसमाजकेबनायेकायदोंसेलड़नाज्यादापसंदहै. - कमलेश

किस्सा -१ -- अंतहीन यात्रा

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ट्रेन के ब्रेक अचानक लगने से उसकी नींद खुली, शायद कहीं बियाबान में रुकी थी कोई जानवर रहा होगा. हो भी क्यूँ न! आजकल हर कोई बस जानवरों सा ही दीखता है और व्यवहार करता है. उसने उठकर अपनी घड़ी देखी, स्टेशन आने में अभी २० मिनट बचे थे. थोड़ी देर बगल में झाँकने के बाद उसे लगा कि उसका सिर दर्द से फटा जा रहा है, लेकिन उसे कोई उपाय नहीं सुझा; सूझता भी क्या उसे बस यात्रा के ख़त्म होने का इंतज़ार था, लेकिन यात्रा तो बस बगैर उसके एहसासों की परवाह किये चली जा रही है. कौन जाने, यह कब और कहाँ ख़त्म होगी! - कमलेश

जब हमारे आसपास संकट हो तब जीवन कैसा दिखता है?

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हम अक्सर शिकायत करते हैं कि हम अपने करीबी लोगों और स्वयं के लिए समय नहीं दे पाने का कारण हमारे कामों की फ़ेहरिस्त का लम्बा होना है. लेकिन अब, हम अपने परिवार के साथ हैं, पक्षियों के चहचहाहट के साथ जागते हैं और ऑफिस के लिए तैयारी करने के जैसा कुछ भी नहीं है। इसके अलावा भी, समय पर घर लौटने, ट्रैफिक-जाम का सामना करने और परिवार के साथ समय बिताने के लिए चीजों को अलग रखने के लिए घबराने की ज़रूरत नहीं बची है। इन सभी गहरी इच्छाओं की पूर्ति का समय मिलने के बावजूद, आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हम में से कई तनावग्रस्त हैं और इसे मैनेज करने के लिए काउंसलर तक खोज रहे हैं, लेकिन हम ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या जिस तरह से हम महसूस करते हैं, बोलते हैं और काम करते हैं उसके बीच एक बड़ा अंतर है? हमने कभी नहीं सोचा था कि इस तरह का जीवन भी हमारे हिस्से में होगा। हम अपने माता-पिता, भाई-बहनों, बच्चों और परिवार के सदस्यों के साथ पूरे पूरे दिन और रात बिता रहे हैं और साथ ही घर से ही अपने काम को अच्छे से मैनेज भी कर रहे हैं। और साथ में दुनिया के हर कोने से आती नवीनतम जानकारी और डेटा के साथ लगातार खुद को अपडेट रख रहे …

मैं और स्त्री

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दुनिया ने जब सुनाया अपना संगीत,
तो सबसे पहले उसे सुना
एक खेत में काम करती स्त्री ने।

संगीत का सफ़र अनवरत रहा
अनगिनत राहों और मोड़ से होते हुए,
मैंने कानों में सुनी उस स्त्री की गूँज।
जब से साबका हुआ है हक़ीक़त से
मैं ठहरकर देखता हूँ
हर उस स्त्री को
जो लगती है मुझे
बुद्ध के मौन और कृष्ण की अनुगूँज सी।

हज़ार राहें गुज़र गईं
इन 22 बरस के क़दमों तले होकर,
मुझे मिली हर स्त्री ने मुझको
दिया ज़िन्दगी के अनमोल पाठों का सार;
मैंने ज़िद, समझ, विश्वास, समर्पण, प्रेम
करुणा, ममता, आदर सी लगती हर बात को
सीखा है स्त्री के वजूद से टपकते सच में।

मेरा जीवन अधूरा है उस कली के खिलने तक
जिसे किसी दिन खेत में काम करने आयीं,
और अपने पसीने से लथपथ तन से
समूचे विश्व के अस्तित्व का भार उठाती:
एक निश्चल सी स्त्री ने पानी पीने के बाद
लौठे में बचे पानी को गिराया होगा पौधे पर।

मेरी आंखों के आगे फैले संसार में
जितना कुछ मैं देख पाता हूँ
मुझे यकीन है कि
स्त्री के होने से ही मिल जाया करती हैं
मेरे अस्तित्व को अनगिनत परिभाषाएं,
दुनिया ढूंढ़ रही है सारे समाधान
किताबों, विज्ञान और अंतरिक्ष की सीमाओं में;
मैं लेकिन पा ल…

ज़िन्दगी और रास्तों का चुनाव

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लगभग सारे ही किनारों पर पसरी हुई हैं ख़ामोशियाँ पिछले कुछ दिनों से, जहाँ खनकती थी कभी ख़ुशियाँ।
फैलती जा रही है यह दुनिया वैश्वीकरण के सिद्धांतों तले, सिमटता जा रहा है पर इंसान अकेलेपन से उपजे अवसादों में।
सामने आए हुए दो रास्तों में, मैंने हर दफ़ा वही चुना जिस पर चलकर मुझे हमेशा लगता रहा कि मैं ख़ुद की परतें उतारने में लगा हूँ।
आज खेत की मेड़ पर बैठे बैठे ऐसा महसूस हो रहा है जैसे, खोज रहा था उम्र भर से जिसको छुपा हुआ था वह मेरे प्रेम के तरीकों में।
कल फ़ोन पर बतियाते हुए मित्र ने कहा कि 'should' और 'can' में से जिसे चुनोगे, वही तुम्हें परिभाषित करेगा! मैं चुन चूका हूँ वह राह जो आज़ाद है  मेरी परिभाषाओं और वक़्त से, लेकिन धँसा हुआ है गहरे तक ज़िन्दगी को देखने के मेरे तरीकों में।
- कमलेश
शुक्रिया वसुधा जी इस तस्वीर के लिए...

जीवन यात्रा के २२ वर्ष और रोज़ पलटते पन्ने

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ख़तों में उपजी अभिव्यक्ति और भावों का सम्मिश्रण जीवन के पड़ावों में ख़ूबसूरती बिखेरता है! हम कितनी समस्याओं या चुनौतियों से जूझ रहे हैं यह हमारे प्रेम करने और जीने के तरीकों से इतर हमें कदम-कदम पर एहसासों की डोर थामे रहने की ताक़त देता है. लेखन से मुझे ख़ुद को व्यक्त करने में सक्षम होने की खुशी और संतुष्टि मिलती है। वह वक़्त सबसे ख़ूबसूरत होता है जब मैं अपने रिश्तों में उनके लिए नियत प्रेम और पलों को बाँट पाता हूँ और जो रिश्ते हवाओं के साथ धुँधला रहे हैं उनकी खुशबुओं को फिर महसूसने के अनुभव को आत्मसात कर पाता हूँ. दुनिया में प्रेम और करुणा के साथ जी सकने वाले अनगिनत कारण हैं जिनके ज़रिये आसपास पनपते दूषित माहौल का सामना करना ज़रा सहज और साहस भरा हो जाया करता है. मैं नहीं जानता कि कोई किस तरह मेरे किसी काम को देखता है लेकिन मेरे लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि मैं ख़ुद के द्वारा किये गये काम, लिए गये फैसलों और जिए गये पलों को कैसे देखता हूँ!
समय ने मुझे विभिन्न रिश्तों और घटनाओं के माध्यम से प्यार और सहयोग को भारी मात्रा में मुझ तक पहुँचाया है। इस साल की शुरुआत में ख़ुद के लिए वक़्त निकालना और अपना ख़याल …

प्रेम और करुणा... काफी है!

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घुप्प अँधेरे से भरी दुनिया में, हर कोई तलाश रहा है एक टुकड़ा रोशनी; जिसके सहारे उसे मिल सके अपने खोए हुए जीवन का पता.
राहें खूँखार होती जा रही है, पानी में ज़हर घोलने वालों की संख्या बढ़ गई है चंद गुज़रे दिनों से: और भी न जाने कितनी तरह से मुश्किलों ने पाँव पसारे हैं यहाँ!
मैं इतना तो जानता हूँ लेकिन कि मुझे कितने लम्हों में समेटना है अपनी आँखों के आगे फैले हुए संसार को, मुझे पता है यह भी कि कितना भाव दूँ किसी की नफ़रत को ताकि वह धरी की धरी रह जाए!
और ख़ास बात तो यह है कि मुझसे कहा है किसी ने कि ख़ुद से किया गया प्रेम और सबके लिए उपजाई हुई करुणा इस दुनिया की तमाम मुश्किलों और हथियारों का सामना करने के लिए ज़रूरत से बहुत ज्यादा काफी हैं. -कमलेश 

तस्वीर के लिए शुक्रिया विजय भईया

तुम, मैं या वक़्त?

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मुझे नहीं पता कि मैं क्या दे सकता हूँ तुम्हें, लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि अगर देखोगे मेरी आँखों में कभी जो उम्मीदों के साये के साथ तो वहाँ तुम्हें इतना तो हौसला मिल जायेगा कि मैं खड़ा हूँ वहीं जहाँ तुम मुझे अपने लिए देखना चाहते हो। ज़िन्दगी को इस तरह जीना की उसका ख़ुद का मन करे कि वह तुम्हारे इर्द गिर्द हमेशा ही घूमती रहे जिस तरह तुम अपने प्रेम और जीवन के आसपास घूमते हो। बहुत आसान होता है किसी की ज़िन्दगी में अपने लिए एक जगह बना लेना लेकिन उस जगह रहकर भी सामने वाले शख्स़ को उसकी जगह और उसका वक़्त नियत समय पर देते रहना बहुत कठिन है। मैं देखना चाहूँगा तुम्हें उसी तरह अपने मुक़ाम पर बैठे हुए जिस तरह मैंने देखा था पहली बार एक तितली को फूल पर बैठे हुए, मेरा प्रेम तुम्हारे रास्ते में उतना ही आड़े आएगा जितना कि बुद्ध का अपनों से किया प्रेम आया था उनके निर्वाण के रास्ते में। तुम देखना किसी रोज़ शांत नदी को, जब तुम्हें लगने लगे थकान इन सारे कामों और यात्राओं से जो तुम इतने वर्षों से करते जा रहे हो, तब मैं तुम्हें देखूँगा उस नज़र से जिसमें तुम ख़ुद को ढूंढने की छवि देख पाओ, मैं छोड़ दूँगा वो सारे ख़…

वक़्त की कारस्तानियाँ और प्रेम का दीया

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नवरी का पहला दिन वसुंधरा के लिए कई अनमोल तोहफे और अनगिनत यादें सहेजने का अवसर लेकर आया था, जितनी ख़ुश और खुली हुई वह आज दिख रही थी उतनी बहुत ही कम मौकों पर दिखाई पड़ती थी। वसुंधरा अपने काम से फुरसत पाकर इस समय कच्छ में अपने कुछ साथियों के साथ उसको जानने की प्रक्रिया में लगी हुई थी, वसुंधरा ने साल 2019 के पहले दिन में कुछ लोगों से इस तरह मुलाक़ात और बातें की जैसे गए साल में उसने कभी उन लोगों को देखा ही नहीं। अपनी खुशियों और आज़ादी को जीते हुए उसे एक पल को हिम का ख़याल आया और उसने आज उसे कॉल करने की बजाय संदेश भेजने के लिए अपना फोन देखा और तब वह अपने फोन में प्राप्त संदेश को पढ़कर कुछ पल के लिए उस लम्हें में ही ठहर गई शायद उसे पूर्ण रुप से आत्मसात करने के लिए। हिम ने उसके लिए एक छोटा सा संदेश छोड़ा था नए साल की शुभकामनाओं के साथ जिसमें उसकी भावनाएं पढ़ना उतना ही आसान था जितना कि पहली के बच्चे का हिंदी वर्णमाला के अक्षरों को पहचानना। वसुंधरा ने बिना कोई भाव ज़ाहिर किये उस लेख को जाने कितने दिनों तक अपने भीतर ज़िंदा रखा ताकि उसकी ऊष्मा बरकरार रहे। कच्छ से फिर लौटकर उसने अपने कामों की सुध ली जिसमें…