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कृष्ण

तुम्हारे हँसने पर गर' तुम्हारी खिलखिलाहट में गूँजे वंशी, तो दुनिया से कह दूँ कि कृष्ण इंतज़ार में है तुम्हारे। रुक जाने पर तुम्हारे बैरागी हो जाएँ जो ये हवाएँ, तुम जान जाओगी कि वृंदावन सिर्फ वृंदावन तक सीमित नहीं। ब्रह्मांड की असीम कालिमा से जल उठेगा उस दिन एक दीपक, जब वक़्त लिख देगा विश्व के लिए एक और गीता। तुम जब जब करीब होती हो यह इंद्र रूठ जाता है मुझसे, तब मन करता है कि इसके विरोध में गोवर्धन उठा लूँ। प्रेम के ढाई अक्षरों में छुपा मोक्ष, नहीं जान पाएगी यह दुनिया इतनी आसानी से; मैं तब खोकर अपना स्वरूप पी लूँगा शिव की तरह तमाम नफ़रत और द्वेष दुनिया का, और बन जाऊँगा अमर लेकिन इस बार मेरा उपनाम 'नीलकंठ' नहीं 'कृष्ण' होगा।                                                 - कमलेश

तुम

तुम, इसके सिवा कोई शब्द क्यों नहीं है दुनिया में कि जिसके उपयोग से तुम्हारे संबोधन को चरितार्थ करूँ मैं! तुम्हारा अस्तित्व उस नीम के पेड़ सा है जिसे मैं अपनी सेहत, सीरत और आराम के लिए चाहता हूँ, शायद तुम नहीं जानती किसी बात को, यह कहना झूठ नहीं है क्योंकि तुम वाकई नहीं जान पाओगी कभी कि ढाई अक्षरों के एक शब्द में कैसे मैंने अपनी दुनिया और उसकी सारी ख़्वाहिशें सजा रखी है। मेरी ख़्वाहिश है कि तुम न जानो उसे, जब तुम बैठो सुकून की गोद में तो अपने हाथों की कोमलता उस शब्द के माथे को सहलाने के लिए बचा कर रखना: ताकि तुम परिभाषा के रिवाज़ परे रखकर, पहुँच सको ब्रह्माण्ड के उस कोने में जहाँ दो आँखों, अनगिनत ख़्वाहिशों, बच्चों और पेड़ की दुनिया रहती है।                                                       - कमलेश