संदेश

सवाल लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सवाल किस बात का है?

चित्र
सैंकड़ों जलती चिताएँ अनगिनत भटकते लोग, पैदल घर लौटती एक दुनिया प्यास-भूख से थमती साँसे, आँसुओं की अविरल धारा छोड़ गए साथियों का ग़म। कितना कुछ है यहाँ जिसे देखने के लिए आँखें नहीं करुणा की ज़रूरत है। वे पूछते हैं तुम किस पाली में हो? मैं ख़ुद से करता हूँ सवाल कि क्या अब भी देखा जाए एक ख़्वाब जिसमें धर्म की लकीरें न हों पैसों से पनपती खाई न हो घर लौटने वालो के लिए आराम हो अकेली लड़की के मन में खौफ़ न हो स्त्री के सिर पर तमाम बोझ न रखा हो बच्चों के खेलने का खुला मैदान हो मान-सम्मान के परे लोग मिलते हों बचपन से लाई गई हंसी हो युवाओं की ज़ुबाँ पर सवाल हो हुक्मरानों की नीति नहीं नियत साफ़ हो बगल में आग लगने पर  अपने घर में चादर ओढ़कर सोने वाले न हों! मैं चाहता हूँ कि  यह न पूछा जाए कि कौन किस पाली में बैठा है बल्कि सवाल चाहत का रहे; जैसे एक प्रेमी-युगल चाहे साथ बैठकर बातें करना ढलते सूरज को सुकूँ से देखना एक-दूजे के होंठो का चुम्बन भीड़ के डर से परे एक आलिंगन जिहाद से परे चाँदनी की एक सैर पहचान से बहुत दूर पनपती प्रेम और सिर्फ प्रेम की एक दुनिया।           ...

जब हमारे आसपास संकट हो तब जीवन कैसा दिखता है?

चित्र
Source- globalsharingweek.org हम अक्सर शिकायत करते हैं कि हम अपने करीबी लोगों और स्वयं के लिए समय नहीं दे पाने का कारण हमारे कामों की फ़ेहरिस्त का लम्बा होना है. लेकिन अब, हम अपने परिवार के साथ हैं, पक्षियों के चहचहाहट के साथ जागते हैं और ऑफिस के लिए तैयारी करने के जैसा कुछ भी नहीं है। इसके अलावा भी, समय पर घर लौटने, ट्रैफिक-जाम का सामना करने और परिवार के साथ समय बिताने के लिए चीजों को अलग रखने के लिए घबराने की ज़रूरत नहीं बची है। इन सभी गहरी इच्छाओं की पूर्ति का समय मिलने के बावजूद, आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हम में से कई तनावग्रस्त हैं और इसे मैनेज करने के लिए काउंसलर तक खोज रहे हैं, लेकिन हम ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या जिस तरह से हम महसूस करते हैं, बोलते हैं और काम करते हैं उसके बीच एक बड़ा अंतर है?      हमने कभी नहीं सोचा था कि इस तरह का जीवन भी हमारे हिस्से में होगा। हम अपने माता-पिता, भाई-बहनों, बच्चों और परिवार के सदस्यों के साथ पूरे पूरे दिन और रात बिता रहे हैं और साथ ही घर से ही अपने काम को अच्छे से मैनेज भी कर रहे हैं। और साथ में दुनिया के हर कोने से ...

मैं और ख़्वाब

मैं देख रहा हूँ खिड़की से लटकते इन सारे अधूरे अजनबी ख़्वाबों को, ये सपने जो कभी मेरे नहीं रहे ये लोग जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा, अचानक से किसी रोज़ आएँगे मेरे शहर और माँगेगे अपनी हक़ीक़त के सवालों के जवाब; मैं रहूँगा उसी तरह ख़ामोश जिस तरह अपने ख़्वाब के खोने पर हो जाता हूँ, तब मैं याद करुँगा वो सारे क़िस्से, जो ख़्वाब को फिर देखने के लिए सुनाए थे मैंने ख़ुद को पास बैठाकर। मैं नहीं जानता कि कोई क्या चाहता है मुझसे, मैं जानता हूँ केवल इतना ही कि ढूँढ लेगी मेरी राहें हर उस पल को, हर उस शख़्स को, जहाँ तक मुझे पहुँचना लिखा है।                                       - कमलेश

ज़िन्दगी और प्रेम की जोड़ी

चित्र
जब ज़िन्दगी की शुरुआत होती है, तब हमारे पास अपने रिश्ते चुनने का कोई विकल्प नहीं होता, लेकिन ज़िन्दगी के रफ़्तार पकड़ने के बाद भी शायद हमारे पास वह विकल्प नहीं होता. अटपटा लग सकता है सुनने में लेकिन हकीक़त यही है कि हम कोई भी रिश्ता नहीं चुनते अपनी ज़िन्दगी में, रिश्ते हमको चुनते हैं उनको जीने के लिए.                                                   भावनाओं का समंदर कितना गहरा है कोई नहीं जानता फिर भी सब डुबकियाँ लगाते हैं, हम नहीं जानते कि हमारी एक मुस्कान या एक शब्द किसी के जीवन में क्या बदलाव ला सकता है. ज़िन्दगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन जितना कुछ इसके साथ रहकर सीखा है वह बहुत कमाल का है. रास्ते अपनी पहचान हमसे तब तक छुपाते हैं जब तक हम समर्पण न कर दें और समर्पण का पौधा विश्वास के बीज के बिना कभी भी नहीं उग सकता. विश्वास और समर्पण जब एक-दूजे में समाते हैं तब प्रेम पैदा होता है और प्रेम अपने कई स...

संवाद – बात से साथ का सफ़र

चित्र
       इस दुनिया को कान की ज़रूरत है          लेकिन हर कोई बस बोलना चाहता है... यह कथन दो तरीकों से किस तरह देखा जा सकता है, बस उस देखने के तरीके की प्रक्रिया का नाम संवाद है. हर किसी के पास इतनी कहानियाँ है कि लिखते लिखते सारे पन्ने भरे जा सकते हैं और हर कोई उतना ही उत्सुक और आतुर है कि किसी और की कहानी सुनने के लिए उसके पास धैर्य नहीं है. ज़िन्दगी की राहों से पनपती कहानियाँ और उनसे जन्म लेते हुए हर पल के किस्से और किस्सों से उपजा खालीपन, मानसिक असंतुलन इतना बढ़ जाता है कि इंसान भूल जाता है उसे जीना किस तरह है!       संवाद की प्रक्रिया में ठहराव और स्थिरता है ज़िन्दगी की रफ़्तार को समझने के लिए वक़्त प्रदान करती हुई. कानों और दिमाग को कितने आराम की ज़रूरत है इस बात का ख़याल शायद उम्र भर किसी को नहीं आता क्योंकि हर कोई, बस रोज़ भागने वाले हाथ और पैर को आराम देना चाहता है. संवाद की शुरुआत जिस मौन के साथ हुई उसने मुझे इस बात का सन्देश दिया कि अभी मेरे पास काफी वक़्त है जो मैं अपने सवालों के साथ बिता ...

क्यूं नहीं.........अगर मैं

क्यूं प्यास ना बुझाई जाए अगर मैं समन्दर को पी सकता हूं, क्यूं सोया जाए जबरन गर मेरी आंखे तारों को देखना चाहती है, क्यूं बिखेर कर समेटा जाए किसी को अगर मैं कुछ संवारने की ताकत ...

क्यों

अग्नि परीक्षा की ज्वाला में जलती हर बार सीता ही क्यों, देती है स्वयं जलकर अपने होने का प्रमाण क्यों । भय के समाज से तजता है राम उसको, कितने ही वचनों को तोड़ रघुकुल की रीति निभ...

पूछना

तुम्हारा यह सवाल करना कि तुम कवितायेँ कैसे लिखते हो ? उतना ही स्वाभाविक है जितना कि तुम्हारा, एक गोलगप्पे वाले से पूछ लेना कि कैसे वो इतने अच्छे गोलगप्पे बनाता है ? इस सवाल क...

सवाल

मेरे साथ राहों पर घूमते हुए, मेरी साँसों के चलने की वजह बनते हुए, एक सवाल तुमने जो पूछ लिया था मुझसे कि कहाँ तक जाना चाहता हूँ तुम्हारे साथ  ? मैं वहाँ जाना चाहता हूँ, जहाँ तुम ...

तुम्हें याद है ना ?

चित्र
Source - Daily Mail                            उस दिन मैं अपने घर वापस आया था कुछ दिन की छुट्टियाँ लेकर , सबसे मिलना जुलना हो चूकने के बाद जब खाना खाने बैठा तब तुम्हारा फोन आया । तुम बहुत नाराज थी क्योंकि मैं इस बार भी तुमसे मिलने नही आ पाया था तुम्हें बहुत देर समझाने के बाद कहीं जाकर तुम सामान्य हुए वह भी इस वादे के साथ कि वापसी के वक्त तुमसे मिलकर जाऊं । उस बातचीत के बाद मेरे दिन तुम्हारे साथ मुलाकात के सपने देखते हुए कब गुजर गए पता ही नहीं चला ।                             उस रोज शनिवार था मैंने उठकर सबसे पहले तुम्हे फोन किया था ताकि तुमको बता सकूँ के मैं आ रहा हूँ ,तुम कह रही थी के दोपहर तक आ जाना मैं इंतजार करूँगी । मैं उस फोन के बाद काम में इतना उलझ गया था कि तुम्हारे पास आते आते बहुत लेट हो गया था,फिर बस से उतरकर पागलों की तरह भागते हुए तुम तक पहुँचा तो बस स्टॉप की उस बेतरतीब भीड़ में तुम्हें व्यवस्थित और खामोश प...