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एकता दिवस और हम

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Source - Times Now सरदार वल्लभ भाई पटेल की शख़्सियत पर मुझे कोई शंका नहीं लेकिन उनके नाम के तले जो पाखण्ड हो रहा है उसके बारे में हमें एक दफ़ा तो ज़रूर सोचना चाहिए। एक तरफ जहाँ 24 करोड़ लोग भूख, पानी, स्वास्थ्य की सुविधाओं से वंचित हैं सरकारें अपना अहं संतुष्ट करने के लिए प्रतिमाएं बनवा रही हैं, जी हाँ मैं गुजरात की एकता की प्रतिमा और महाराष्ट्र में कुछ समय में बनाई जाने वाली शिवाजी की प्रतिमा और साथ ही मंदिरों, मस्जिदों और अन्य धर्मस्थलों के बनाये जाने की ख़िलाफ़त करता हूँ। 3000 करोड़ रुपयों की रकम जो लग चुकी है और वह जो आगे खर्च की जाएगी, हर तरह से उन 24 करोड़ लोगों तथा 134 करोड़ देशवासियों के हित में उपयोग की जा सकती थी। प्रतिमा बनाने के निर्णय का समर्थन करने वाले एक दफ़ा वहाँ जाकर देख आएं कि क्या मंज़र है! वहाँ के रहवासियों को कितनी तकलीफें उठानी पड़ी हैं, आज के कार्यक्रम के लिए नदी को पानी से भरा हुआ दिखाना है जिसकी कीमत वहाँ के छोटे किसान चुकायेंगे, क्योंकि उनको बग़ैर किसी पूर्व जानकारी के डैम से पानी छोड़ दिया गया है, अब इतना तो सोच ही लीजिए कि खड़ी फसल या सब्जियाँ पांच से छः दिन पान...

योजनाएं, हकीक़त और सरकार

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पेट्रोल और डीजल के दामों का घोर विरोध कर जनता का मन 2014 में पूरी तरह मोह लेने वाली सरकार के राज में दोनों की कीमतें पिछले 7 सालों में अपने उच्चतम स्तर पर हैं। कर वसूलने के नाम पर अंधाधुंध वसूली और लूट मचाने का सरकारी तरीका ईजाद किया है सरकार ने, केंद्रीय कर असल कीमत का 24-26% और राज्य कर 20-25%, लेकिन इन करों की उपयोगिता का कोई प्रमाण सरकार अब तक नहीं दे पाई है। न ही इनको जीएसटी से बाहर रखने का उचित कारण अभी तक जनता के सामने आया है। हाल ही में एलपीजी सिलेंडर के बढ़ते दाम फिर से इन्हीं सवालों को उठाते हैं कि क्या देश की इकोनॉमी का बढ़ता फिगर ही सब कुछ है, उसके आगे आम आदमी की जेब, मजदूरों की रोटी और किसानों की ज़िन्दगी कोई मायने नहीं रखती?                साल के पहले क्वार्टर में जीडीपी अपने ऊंचे स्तर पर पहुंची है जिसे सब के द्वारा देश का विकास सूचक करार दिया जा रहा है, तो फिर रुपए के गिरते दाम किस की तरफ इशारा कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब शायद सबके पास है लेकिन कोई भी उसे स्वीकारने को तैयार नहीं, रुपए और डॉलर के युद...

वर्तमान भारत, गांधी और भगत सिंह

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बढ़ता है ये ग़ुबार क्यूं ? कैसा चलता यह कारवां ? ना आस कोई, ना साथ कोई, दिशाहीन पथ पर युवा, जिसने चाहा था अंतस से, स्वर्णिम भारत का सपना, बाँट के उसके नाम तले, गर्त में धकेल दी सब आस्था । Source- Google क्यूं नाम है होंठो पर भगत का ? क्यूं नहीं है उसके बोल अभी ? नकार दिया था उसने उनको भी, जो व्यर्थ पिटते थे ढोल कभी । कि क्रांति नहीं आये समाज को तोड़ने से, कि क्रांति नहीं आये लाशों को गिराने से, कि क्रांति नहीं आये व्यर्थ लहू बहाने से, राजगुरु-सुखदेव संग क़ुरबानी दी उसने, पर देखकर केवल एक ख्व़ाब कि आये क्रांति तो विचारों में, कि आये क्रांति तो कामों में, कि आये क्रांति तो ज़बानों में । यहाँ बैठे हैं अब भगत के नाम के इतने ठेकेदार, क्रांति शब्द से अनभिज्ञ हैं, हैं सारे के सारे गद्दार । रुकता क्यूं नहीं ये सिलसिला मंदिर-मस्जिद के जाप का, घर की माता-बहनें रोती और ये ठेका लेते हैं एक गाय का, अपनी स्त्री के जीवन को बना के बैठे हैं सब नरक यहाँ, किन्तु मुरादों के लालच में, जाते वैष्णों देवी और मक्का । क्यों नाम है होंठो पर गाँधी का ? क्यों नहीं उतरता जेहन में ? गाँ...

तुमने ( सियासतदार )

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Source - Hindustan Times फिर मुस्कराहट को खामोश कर दिया तुमने, फिर एक दिये की लौ को बुझा दिया तुमने । अभी तो यह जहान् देख भी नहीं पाये थे वो, जिनको इस जहान् से ही मिटा दिया तुमने । अपने गुनाहों को छुपाने की कोशिश में फिर, किसी बेगुनाह की साँसो को काट दिया तुमने । शरम अब तो करो ए सियासत के पहरेदारों, एक माँ की कोख को शमशान कर दिया तुमने । माँ है वो बद्दुआ तो कभी दे ही ना सकेगी, भले ही उसके नाजुक दामन को नोच लिया तुमने ।                                    .....कमलेश.....   " श्रद्धांजलि "