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माँ तुम बहुत याद आती हो

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मेरा चेहरा हर वक्त अपनी आँखो में लेकर
मेरा किस्सा हर वक्त अपनी जुबान पर लेकर
मेरे बारे में ही हर किसी को बताती हो
माँ तुम बहुत याद आती हो
माँ तुम बहुत याद आती हो।

हर वक्त हाथो में लेकर मुझको प्यार किया
मेरी खुशियों पर तुमने जीवन अपना वार दिया
हर मुश्किल में समझाकर हौसला मेरा बढाती हो
माँ तुम बहुत याद आती हो।

जब स्कूल ना जाने की जिद मैं किया करता था
तब तुम्हारा दुलार पापा से बचाया करता था
बिन कहे हमेशा मेरी ख्वाहिशें जान जाती हो
माँ तुम बहुत याद आती हो।

इतनी उम्र जी चुका हूँ दुनिया जाने क्या समझती है
अपने मतलब के लिए यह जिंदगी छिन लेती है
इन्ही राहों की मुश्किलों में तुम नजर आती हो
माँ तुम बहुत याद आती हो।

ना कह सकता मैं किसी से ना ही किसे बतलाता हूँ

शेर - ओ'- शायरी

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* अपनी नजदीकियों का सोमरस घोल दे मुझमें,
   के अब दूरियों का हलाहल पिया नहीं जाता |


* बनाकर चश्मे के लेन्स को दिवार घूमता हूँ,
   डर है लोग आँखों में तेरी सूरत न देख ले |


* उन हजारो ख्वाहिशों का गुनेहगार हूँ मैं,
   जिनका क़त्ल तेरी गैरमौजूदगी में किया है |


*. जिंदगी में रोशनी के लिए उजाले की ज़रुरत नही,
   अपने प्रेम का दिया जला दो इतना ही काफी है |


* दर्द बढाने की चाहत है मेरी,
   इस उम्मीद में की दर्द कम हो जाये |


* बातो से बातो की बात करते हुए,
   कुछ बातचीत अधूरी रहे तो अच्छा है |


* जो मेरी राहो में कांटे बिछाने का शौक रखते है,
   दुआ करता हूँ उनकी राहो में फूलो की बारिश हो |


* एहसास होने लगा है मुझको एक नया,
   के तू मेरी याद में पलकें भिगोने लगी है |


* तुम पर चार मिसरें लिखना थी मुझे,
   ये ग़ालिब की नज़्म पड़कर याद आया |

.....कमलेश.....

व्यथा

हर बीती बात अब पराई लगती है,
ऐ जिंदगी अब मुझे धूप लगती है ।उड़कर आते थे कभी खुशी से घर,
अपने घर में तो अब घुटन लगती है ।चाहा के ना लिखूं किसी के दर्द को पर,
हर तकलीफ अब मुझे अपनी लगती है ।ये जो घूमते है कंधो पर अपने बेटे लेकर,
कहदो मुझको तो अब बेटियाँ अच्छी लगती है ।भले ही लगाये वो काजल आँखो में अपनी,
मुझे तो बिन श्रंगार के ही अब अच्छी लगती है ।
                                                  .....कमलेश.....

कुछ मेरा भी वक्त ज़ाया किया करो ।

कुछ मेरा भी वक्त ज़ाया किया करो,
कभी हमे भी फोन लगा लिया करो ।रोज़ इसी राह से  काॅलेज जाते हो,
कभी तो देखकर मुस्कुरा दिया करो ।दर्द होने लगेगा   तुम्हारे  पैरों में,
इतना भी बस का इंतजार ना किया करो ।अपनी खूबसूरती यूँ छुपाया नही करते,
खुली रख के सुरत हमें भी दिखाया करो ।बोर हो जाओगे किताबो को पढ़कर तुम,
कभी हमारे दिल को भी पढ़ लिया करो ।  .....कमलेश.....

घर लौटकर आना नही चाहता ।

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सोच रहा हूँ इस दफा
कुछ कपड़े और खरीद लूँ,
गाँव की हर एक गली
घूमकर आँखो में समेट लूँ,
जानने वाले हर शख्स से
एक बार फिर मुलाकात करूँ,
घर की दीवार में लगी
तस्वीर को अपने साथ ले चलूँ,
दिल आज के बाद
घर लौटकर आना नही चाहता । कुछ लतीफे जो अधूरे है
बच्चों को सुनाकर पूरे कर दूँ,
कुछ रिश्ते जो रुठे है
मनाकर प्यार से गले लगा लूँ,
रोज़ की राहों को छोड़कर
नयी मंजिलें तलाश करूँ,
ख्वाहिशों को अधूरा रख के
घर लौटकर आना नही चाहता । अपने सपनो में प्राण फूंक
नये रास्तों को अपना लूँ,
मेरी तकदीर मेरे साथ रहे
ऐसा कोई अफ़साना बना लूँ,
इस घर, परिवार, और गली से
आज से अजनबी हो जाऊं,
जिंदगी का सूकून गंवाकर
घर लौटकर आना नही चाहता । .....कमलेश.....

ओढ़कर बैठा हूँ

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ओढ़करबैठाहूँमैंएकख़ामोशीकीचादरको
इसबारख्यालोमेंआओतोचुप्पीतोड़चलेजाना
कडवीलगतीहैवोफ्रीज़मेंरक्खीमीठीलस्सीभी
बेस्वादहोगयाहैनाश्ताऔरमेराफेवरेटखाना
नहींजंचतीमुझेकोईभीधुनआजकल

मेरा इश्क

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कालीघटाओंसीतेरीजुल्फें

जबहवाकेसंगलहरातीहै,

ऐसालगताहैमानोके

कुछपलमेंबारिशहोनेवालीहै|

तेरीआँखेलगतीहैझीलसी

जहांआशिक़ीकेख्वाबतेररहेहैं,

मुस्कानअधरोंपरऐसेछातीहै

जैसेसूर्योदयकेवक़्तकीलालिमा |

झुका