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ग़ज़ल

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Source - Pinterest.pt ये आँखें तुम्हारी शराब है क्या, नाज़ुक होंठ कोई गुलाब है क्या । महकती है खुश्बू हर-तरफ तेरी, जिस्म ये तुम्हारा गुलशन है क्या । रातों से तकरार-चांद से मौसिक़ी, तुझसे इश्क़ कोई मज़ाक है क्या । छू लें तुम्हें जो कभी बेशर्मी से हम, तो बतलाओ कोई ऐतराज़ है क्या । ऐसे वक़्त ज़ाया नहीं किया करते, हसीन शामें हर रोज़ आती है क्या । मेरे सवालों पर ऐसे ख़ामोश बैठ गए, किसी बात की तुम्हें नाराज़गी है क्या । ये ज़माना सताता ही है चाहने वालों को, पर खुद सोचो इसकी औकात ही है क्या । माना कि एक दिन सबको मरना है, तो बतलाओ हम जीना छोड़ दें क्या । कुछ दिनों से ख़फा हैं चंद मिलने वाले, सोचता हूँ ये लोग कहीं के नवाब है क्या । मौत आए तो उसे कहना इंतज़ार करे, तेरे दीदार के बगैर ही मर जाएंगे क्या ।                                           ...

मेरे गुलशन का नायाब गुलाब तुम हो

मेरे गुलशन का इक नायाब गुलाब तुम हो, देखता ही रहूँ जिसको वो ख्वाब तुम हो । गुज़रता है वक़्त तो इसे गुज़रने दिया जाए, जहाँ मैं ठहर जाऊं इसमें वो मुकाम तुम हो । अंधेरे से भरी उन त...

तुम और वेदांत दर्शन .....

तुम मेरे वेदांत दर्शन का, वह मूल प्रश्न हो जिसका उत्तर जानने पर, मैं समूचे ब्रम्हांड को जान सकूंगा । तुम सच्चिदानंद की वह अवस्था हो, जिसमें खुद को खोकर मैं सब कुछ पा सकता हूँ ...

मैं

मैं वह नहीं, जिसके साथ तुम बाँट सको अपने ग़म, जिसको दिखा दो तुम गुज़रे हुए पल । मैं वह भी नहीं, जिससे तुम : उम्मीद रखो कि मैं तुम्हारी उम्मीदें पूरी करुंगा, जिस पर तुम्हें गर्व ह...

नदी और समंदर

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Source-YouTube  सालों-साल के अपने बर्फीले आँगन को छोड़कर, वो चल पड़ती है हरियाली साड़ी ओढ़े, चाँदनी का आलेप लगाए, चट्टानों का सुनहरा गहना पहने, मछलियों का काजल आँजे, फूलों की लाली अपने अधरों पर सजाकर, कल कल करती पाजेब पहनकर, हर पड़ाव पर प्रेम बिखेरती हुई, अपने प्रियतम के आँगन पहुंच जाती है, अपने पिता पर्वत को विस्मृत कर, तब सूर्योदय की लालिमा से अपनी प्रेयसी की मांग भरकर, वह उसे अपने आगोश में समेट लेता है, और इस तरह नदी समंदर में मिल जाती है ।                                  .....कमलेश.....

भगवान् होने के लिए. . .

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  Source - How.fn कोई हलचल तो होगी इस विरान बियाबान में, कोई कोयल तो कूकेगी जीवन के इस उपवन में, उल्लास निरंतर आएगा मायूसी समेटे आँगन में, रोशनी का उत्सव होगा अंधेरे पर श्री के बाद, खुशी जन्म लेगी फिर दुख के निर्वाण के लिए, घर को त्याग कोई जाएगा पिता की प्रतिष्ठा के लिए, हलाहल का पान करेगा वो समूचे जग के हित को, राधा भी विरह में तड़पेगी प्रेम की अमरता के लिए, कोई अवतरित होगा यँहा खुद भगवान् होने के लिए ।                            .....कमलेश.....

गांव और देश का विकास

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 Source - Financial Express                                         हमारा देश इस वक़्त विकास के ऐसे दौर से गुज़र रहा है जिसमें हमें शहरों के साथ साथ गाँवो का विकास करने की भी बहुत ज्यादा आवश्यकता है । कुछ महात्वाकांक्षी लोगों की सोच काफी सही है कि अगर गाँव का विकास देश के विकास से जुड़ा है तो हमें गाँव का विकास राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की सपनों के तले करना चाहिए । वे कहते थे कि " मैं चाहता हूँ कि भारत के सारे गाँव खुद के प्रयासों से इतने आत्मनिर्भर हो जाएं कि उन्हें अपनी किसी भी ज़रुरत के लिए किसी और पर निर्भर नहीं रहना पड़े।" उक्त कथन से स्पष्ट है कि गाँधी जी गांवो को सम्पूर्ण विकास के बावजूद भी गाँव ही रहने देना चाहते थे।                     गाँव हमारे देश का प्रतिबिम्ब हैं जो प्रकृति के दर्पण में अपनी खूबसूरती लिए झलकता है या यूँ कहे कि इस देश का आँगन है गाँव। आँगन की परिभाषा है घर के सामने क...

तुम, मैं और मोक्ष

कभी दरिया में बहता कभी किनारों से टकराता, किसी उपवन में ठहरकर कुछ पल को सुस्ताता, चला जा रहा है मन मेरा एक मंजिल की ओर । सफर अकेले शुरू हुआ मगर अब थोड़ी तन्हाई साथ है, कुछ तारीखे...

व्यथा

हर बीती बात अब पराई लगती है, ऐ जिंदगी अब मुझे धूप लगती है । उड़कर आते थे कभी खुशी से घर, अपने घर में तो अब घुटन लगती है । चाहा के ना लिखूं किसी के दर्द को पर, हर तकलीफ अब मुझे अपनी लगत...

घर लौटकर आना नही चाहता ।

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Source - Bindaas Attitude  सोच रहा हूँ इस दफा कुछ कपड़े और खरीद लूँ, गाँव की हर एक गली घूमकर आँखो में समेट लूँ, जानने वाले हर शख्स से एक बार फिर मुलाकात करूँ, घर की दीवार में लगी तस्वीर को अपने साथ ले चलूँ, दिल आज के बाद घर लौटकर आना नही चाहता । कुछ लतीफे जो अधूरे है बच्चों को सुनाकर पूरे कर दूँ, कुछ रिश्ते जो रुठे है मनाकर प्यार से गले लगा लूँ, रोज़ की राहों को छोड़कर नयी मंजिलें तलाश करूँ, ख्वाहिशों को अधूरा रख के घर लौटकर आना नही चाहता । अपने सपनो में प्राण फूंक नये रास्तों को अपना लूँ, मेरी तकदीर मेरे साथ रहे ऐसा कोई अफ़साना बना लूँ, इस घर, परिवार, और गली से आज से अजनबी हो जाऊं, जिंदगी का सूकून गंवाकर घर लौटकर आना नही चाहता ।                             .....कमलेश.....

मेरा इश्क

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 Source - Google काली घटाओं सी तेरी जुल्फें जब हवा के संग लहराती है , ऐसा लगता है मानो के कुछ पल में बारिश होने वाली है | तेरी आँखे लगती है झील सी जहां आशिक़ी के ख्वाब तेर रहे हैं, मुस्कान अधरों पर ऐसे छाती है जैसे सूर्योदय के वक़्त की लालिमा | झुका लेती हो गर्दन जब शरमा के प्रेम के दिए जल उठते हैं , बाहें फैलाकर करती हो आलिंगन जब मेरा हर अंग तुझमें बिखर जाता है | सोचता हूँ कर के कैद उस पल को हासिल कर लूं तेरी बेशुमार मोहब्बत | तेरे कदम इस तरह चलते हैं जैसे उर्वर्शी धरा पर आई हो , पदचिन्ह तुम्हारे जब देखता हूँ लगता है लक्ष्मी वसुधा पर आई है | समेट कर के तेरी इस काया को नाम दे दिया है मोहब्बत मैंने , ठहरी है निगाहें और धड़कन खुद को तेरे नाम कर दिया मैंने |                  ...