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क्यूं नहीं.........अगर मैं

क्यूं प्यास ना बुझाई जाए अगर मैं समन्दर को पी सकता हूं, क्यूं सोया जाए जबरन गर मेरी आंखे तारों को देखना चाहती है, क्यूं बिखेर कर समेटा जाए किसी को अगर मैं कुछ संवारने की ताकत रखता हूं । क्यों वादों को पूरा ही किया जाए अगर कोई उन्हें अधूरा छोड़ना चाहता है, क्यूं सपनों पर दीवारें बनाई जाए गर उनके लिए आसमान भी छोटा पड़ता है, क्यूं वापसी की उम्मीद लगाई जाए किसी से गर जाए कोई तो फ़िर लौट नहीं पाता है । क्यूं मजबूरन दौड़ा जाए रेस में गर मैं धीमे धीमे भी चल सकता हूं, क्यूं बांधा जाए मेरी रूह को यूं अगर मैं खुल कर जीना चाहता हूं, क्यूं हो एक ही मरतबा मोहब्बत गर मैं हजारों दफा प्रेम कर सकता हूं ।                                       -- कमलेश

कार्य

   "वह नास्तिक है जो अपने आप में विश्वास नहीं रखता |”                                                                 -- स्वामी विवेकानंद विचारों की प्रक्रिया में हिस्सेदार बनकर, आसपास के वातावरण को सुनकर और उसका  अवलोकन  करने के बाद हम अच्छी तरह चीजों के  दोहराव  तथा उनका  आकलन करके उनसे ज्यादा प्रभावी तरीके से सीख सकते हैं | किसी विचार के तथ्यों को सुनकर, उसके महत्वपूर्ण पहलुओं को ध्यान में रखकर हमें अपने काम करने की प्रणाली को बहुत ही सुदृढ़ रखना होता है अगर हम सही मायनों में काम से लगाव रखते हैं | काम की शुरुआत से पहले हमारा उससे जुड़े सारे पहलुओं से अवगत होना अत्यंत आवश्यक है कि किस तरह वो हमारे काम को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं और किस प्रकार उनसे निपटा जाना चाहिए, जोकि बाद में हमें बाकि हिस्सों के निर्धारण में सहायता प्रदान करता है; इस प्रक्रिया को अंग्रेजी में  डिज़ाइन थिंकिंग  कहते हैं | अपने पुरे काम के सुनियोजित निर्धारण के बाद उसका निचले सिरे से शुरुआत तक आकलन करना भी बहुत आवश्यक है ताकि काम की रुपरेखा, काम करने के मध्य में भंग होने से बच सके और हमारे तथ्यों की ज़मी

बीज का चांद

कुछ दिनों से मुकद्दर कशमकश में जी रहा है, शायद कुछ फैसले उसे मेरे वक़्त के साथ करने हैं । बेख़याली में नहीं ना सही होश में ही सही कोई तो ये ख़बर सुनाए, के आज मुकद्दर ने इस धरती का कर्ज़ा चुकता कर दिया है और अब सब के साथ इंसाफ़ ही होगा ; चाहे फ़िर वो पत्थर हो या इंसान । बचकानी लगती है मुझको चमत्कारों की सारी कहानियां पिछले दिनों के बाद से, शायद कोई झूठ बोला गया था मुझे जिसका सच मैं अब नहीं चाहता । बीज के चांद को गर जो देखता हूं, आसमान के तारों के बीच, तो उसके बाकी हिस्से की परछाई भी मुझे दिखाई पड़ती है अब ।                              -- कमलेश

समय छटपटा रहा है.....

तमाम गुनाहों के हिसाब जिस दिन को लिए जाएंगे कितने ही अछूते रह लें हम-तुम पर बच नहीं पाएंगे । सोचोगे तुम गर कि नहीं हैं खून में तुम्हारे ये हाथ तो, गुनाह तब हाथों के नहीं विचारों के भी खोजे जाएंगे । बचने की कड़ी में लगे किसी को विचारों का आसरा, तो जो नहीं बोल पाए थे वे भी गुनहगार कहलाएंगे । मत होना खुश तुम गर जो अब तक बचते आए हो, नहीं सोचने वाले कुछ, भी संगीन अपराधी हो जाएंगे । मौत की सज़ा के लायक तो हम शायद हैं ही नहीं पर, अगर जीते छोड़ दिए गए तो क्या यह समझ पाएंगे ? समय छटपटा रहा है सामने हमारी आंखों के अभी, गर ना चेते अब तो फ़िर इसके कहर में ही बह जायेंगे ।।                                                           -- कमलेश

इबादत

बेवक़्त की बारिश ने आज सारे ज़ख्मों को धोया, बदलियाँ स्वागत में जुटी है, हवाओं ने अभी अभी एक ख़त पहुँचाया, जिसे आसमान ने चीख-चीखकर पढ़ा, ख़बर है कि तुम आने वाले हो । इतनी जल्दी भी क्या है वैसे ? मुझे तसल्ली से नशा करने दो इस जवान होते इश्क़ का, देख लेने दो जी भरकर इंतज़ार में तड़पते रिश्ते को, जान लेने दो मुझको ख़्वाबों में छिपे सब राज़ । खोद लेने दो एक खूबसुरत कब्र प्रेम में मौत के बाद, सुकून से दफ़न होने के लिए । तुम्हें पसंद है हवाओं की सादगी, और मुझे मोहब्बत है बेगानेपन से; तुम्हारी हसरत है बाद बारिश के साथ मेरे शामें गुज़ारने की, मैं चाहता हूँ कि आसमां रोता रहे उम्रभर ज़मीन से अपने इश्क़ में । कितनी अजीब है हमारी इबादत की तरकीबें ? तुम सवेरे-सवेरे खोजती हो घर में पूजा का कोना, मैं सुबह इबादत की बजाय तुम्हारे साथ चाय पीना चाहता हूँ ।                                   -- कमलेश

वर्तमान भारत, गांधी और भगत सिंह

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बढ़ता है ये ग़ुबार क्यूं ? कैसा चलता यह कारवां ? ना आस कोई, ना साथ कोई, दिशाहीन पथ पर युवा, जिसने चाहा था अंतस से, स्वर्णिम भारत का सपना, बाँट के उसके नाम तले, गर्त में धकेल दी सब आस्था । Source- Google क्यूं नाम है होंठो पर भगत का ? क्यूं नहीं है उसके बोल अभी ? नकार दिया था उसने उनको भी, जो व्यर्थ पिटते थे ढोल कभी । कि क्रांति नहीं आये समाज को तोड़ने से, कि क्रांति नहीं आये लाशों को गिराने से, कि क्रांति नहीं आये व्यर्थ लहू बहाने से, राजगुरु-सुखदेव संग क़ुरबानी दी उसने, पर देखकर केवल एक ख्व़ाब कि आये क्रांति तो विचारों में, कि आये क्रांति तो कामों में, कि आये क्रांति तो ज़बानों में । यहाँ बैठे हैं अब भगत के नाम के इतने ठेकेदार, क्रांति शब्द से अनभिज्ञ हैं, हैं सारे के सारे गद्दार । रुकता क्यूं नहीं ये सिलसिला मंदिर-मस्जिद के जाप का, घर की माता-बहनें रोती और ये ठेका लेते हैं एक गाय का, अपनी स्त्री के जीवन को बना के बैठे हैं सब नरक यहाँ, किन्तु मुरादों के लालच में, जाते वैष्णों देवी और मक्का । क्यों नाम है होंठो पर गाँधी का ? क्यों नहीं उतरता जेहन में ? गाँ