संदेश

तुम लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रकृति का वादा - तुम

चित्र
प्रकृति के मूल सिद्धांतों में जुड़ाव निहित है, इसके वचनों से हर कोई भीगा हुआ है वह भी जिन्हें वादों से दूर रहना भाता है। ज़िन्दगी के लम्हों को गुज़ारते हुए एक दिन ऐसे ही प्रकृति का कोई नियम अपने चेहरे पर से पर्दा हटा सामने आ जाता है और फिर उसकी ख़ुमारी से निकलने का वक़्त ही नहीं रहता इंसान के पास। मैंने जब पहली बार तुम्हें देखा था तो मुझे महसूस हुआ कि कोई अनकहा वादा लौट आया है मुझ तक जिसे पूरा करना जीवन के निश्चित मकसदों में से एक है। तुम्हारे साथ ऐसा लगता है कि प्रकृति के साथ मेरा रिश्ता गूढ़ होता चला जा रहा है। प्रेम की परिभाषा के परे मैं महसूसना चाहता हूँ वे सारे क्षण जिनमें लिखी गईं हैं कुछ खामोशियाँ और अनगिनत एहसास। जीवन के जिस अंदाज़ से तुमने मेरा परिचय करवाया है उसे अकेले देख पाना संभव तो है किंतु सहज नहीं। वक़्त की डोर को थामे हुए अब लगने लगा है कि साधन नहीं साध्य महत्त्वपूर्ण है; मेरे जीवन के अघटित पहलुओं को तुम्हारे प्रेम से मायने मिलने की आस है और ख़ुशी भी। मुलाक़ातों के बोझ से दूर मैं चाहता हूँ कि हृदय के रास्ते हम एक-दूजे की खोज ख़बर रख पाएँ। तुमसे मिल जाना इस तरह जीवन के...

वर्तमान का ख़्वाब -

चित्र
हम सारी ज़िन्दगी उस ख़्वाब के लिए अपनी नींदे ख़राब कर देते हैं जो हमने अब तक की सबसे गहरी और ख़ूबसूरत नींद में देखा था। नींद जागने से उतनी भी अलग नहीं होती जितना इसे बना दिया गया है: बल्कि नींद में आप अपने जीवन के उस हिस्से को नए सिरे से जीने लगते हो जिसको आप जागते हुए जीने की हिम्मत करने से बहुत डरते हो। इन सारी चीजों से जुड़े रास्ते बहुत बिखरे हुए से लगते हैं मुझको। एक दिन ऐसा आएगा जब यह बिखरते बिखरते उलझने लगेंगे और फिर हममें से किसी को भी अपनी मंज़िल कभी भी नहीं मिल पाएगी; और तब मैं किसी पेड़ के नीचे एक किताब हाथ में लिए मुस्कुरा रहा होऊँगा। उस दिन मैं अपने द्वारा जिये गए तमाम लम्हों को समेटकर उनकी गठरी को उस नदी में जाकर फेंक आऊँगा जिस नदी में पैर डुबोना मुझे सबसे ज्यादा सुकून देता है। इस उम्मीद को अपने होने के किसी कोने में छुपाये कि शायद ऐसा करने से मैं अपना अतीत मिटा सकता हूँ जिसमें वे बिखरे-उलझे रास्ते भी मिट सकें। और तब मेरे पास शेष रह जायेगा निरा वर्तमान; जो मेरा अपना है। इस वर्तमान को मैं उस लड़की के हाथों में हाथ रखकर जीना चाहता हूँ जिसे पिछले कुछ दिनों से मेरे फ़ोन कॉल का इंतज़ार र...

इंतज़ार और तुम -

चित्र
   Source - Nojoto  इंतज़ार के क्षण दुनिया में घटने वाले सबसे लंबे और गहरे क्षणों में गिने जा सकते हैं। जब सारा संसार अपनी गति में तल्लीन होकर बेतहाशा गन्तव्यहीन सा भागा जा रहा होता है; ठीक उसी समय कुछ जोड़ी आँखें, अनेकों कान, अनगिनत होंठो के जोड़े और कई-कई हाथ अपने अस्तित्व में कुछ और जोड़ लेने की चाहत लिए, ख़ुद को इंतज़ार की अनंत परिधि में धकेल दिया करते हैं। इंतज़ार का वजूद केवल उन्हीं क्षणों में सिमटकर नहीं रहता अपितु ये लम्हें किसी व्यक्ति या विशेष के समूचे वर्तमान में ख़ुद को विस्तृत कर देते हैं; जो उसके स्वयं के संचालित होने के क्रम को धीमा करने लगता है और घड़ी दर घड़ी उसे गहराई की अनेकों परतों में उतार ले जाता है। मैं दुनिया में घटने वाले तमाम क्षणों में से कुछ-एक को चुनकर, उसके दीदार के लिए मुंतज़िर हो जाना चाहता हूँ। मैं उस क्षण के इंतज़ार में अपने होने को स्थगित करना चाहता हूँ, जब वह इन भागते हुए लम्हों में अपने प्रेम से सरोबार आलिंगन से; चंद पलों के लिए ही सही; इन्हें थाम कर रख देगी। - कमलेश

प्रेम, ज़िन्दगी, मिथ्या और तुम -

चित्र
जीवन का हर पल एक अवसर माना जाता है. प्रेम को हर कदम के लिए अहम माना जाता है. मिथ्याओं से पार पाना असंभव माना जाता है. लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मानने, समझने और जान-लेने में फर्क किसी को समझ नहीं आता है. लोग व्यंग भरी बातों से इस कठिन समय को हल्का करने में लगे हैं और सोचा करते हैं कि कब यह कोरोना नामक दानव इस धरा से अपना पिंड छुड़ाये, हाँ बिल्कुल सही पढ़ा; कोरोना को हमसे पिंड छुड़ाना पड़ेगा हम तो कतई न मानने वाले. अब तुम ख़ुद ही देख लो, इतनी सख्ती और गाइडलाइन के बावजूद हम पहुँच जाते हैं यह जताने कि हम कितना चाहते हैं तुम्हें और जताने के लिए भी कितने आतुर हैं उस प्रेम को तुमसे!  शीर्षक पढ़कर यह भ्रम भी पाला जा सकता है कि मैं कोई भावपूर्ण प्रेम अनुभव या कहानी लिख बैठा होऊँगा, लेकिन मेरे किसान पिता को हाल ही में लाये गये तथाकथित किसान-बिलों से संतुष्टि हो पाए तब न! मेरे दोस्त ने जिस लड़की से प्रेम किया वह अपना सर-नेम कुछ और लिखती है; वे दोनों बग़ैर किसी मुश्किल के जी पाए तब न! हर रोज़ 110 से ज्यादा बलात्कार के केस या ख़बरे पढ़ने के बावजूद मेरा दिल समझ पाए कि मेरी महिला दोस्त या बच्चियां इस देश मे...

कृष्ण

तुम्हारे हँसने पर गर' तुम्हारी खिलखिलाहट में गूँजे वंशी, तो दुनिया से कह दूँ कि कृष्ण इंतज़ार में है तुम्हारे। रुक जाने पर तुम्हारे बैरागी हो जाएँ जो ये हवाएँ, तुम जान जाओगी ...

तुम

तुम, इसके सिवा कोई शब्द क्यों नहीं है दुनिया में कि जिसके उपयोग से तुम्हारे संबोधन को चरितार्थ करूँ मैं! तुम्हारा अस्तित्व उस नीम के पेड़ सा है जिसे मैं अपनी सेहत, सीरत और आरा...

इंतज़ार और तुम

चित्र
तुम देखती हो थोड़ी सी गर्दन झुकाकर मेरी ओर तो ऐसा लगता है कि सूरजमुखी देख रहा है सूरज को। सातों आसमान के पार से जब गूँजता है तुम्हारा स्वर तो इतनी ज्यादा ख़ुशी होती है कि मैं जून में भी नंगे पैर चल लेता हूँ। तुम मिली इस दफा मुझे पहाड़ों की गोद में, जहाँ मुझे कई जन्मों से आना था शायद: वहाँ आकर तो यही लगा था मुझे, तो घर वापसी जैसा भाव पैदा हो गया। तुम्हारे साथ प्रकृति को इतना सहज पाता हूँ जैसे कि किसी ने इसकी जंज़ीरें खोल दी हों, तुम खिल उठती हो जब पानी की चंद बूँदों से तो मेरा मन करता है कि उतार दूँ बादलों का तमाम पानी जो तुम तक पहुँच कर अपना जीवन सफल कर ले। जिस तरह दुनिया संजो रही है सारे सूत्र और समीकरण, मुझे ऐसा लगता है उसने तुम्हें पहचाना ही नहीं अब तक, कभी कभी जी करता है कि बिग बैंग थ्योरी वाले वैज्ञानिक को तुमसे मिलाऊँ, ताकि वो अपनी भूल सुधार सके। तुम्हारे साथ रहता हूँ तो अकेलेपन के सारे सिद्धांत मुझे खोखले लगते हैं, तुम जब डर जाती हो किसी जानवर से, उससे अपना प्रेम जाहिर करते हुए तो तुम्हें भँवरा बनकर छेड़ने को जी करता है।          ...

तुम्हारे गले लगकर

तुम्हारे गले लगकर, मैंने जाना कि ख़ुशी, सुकून, प्रेम और इंतज़ार को किस तरह जिया जाता है! तुम्हारे हाथों में अपने हाथों को छोड़कर, मैं जान पाया कि तरंगों का जीवन क्या होता है! तुम्...

प्रेम फलित होता ही तब जब जीत कर रह जाए हारा

प्रेम के वशीभूत होकर लिखता जा रहा है वह निरंतर, है घिरा सब ओर से भीड़ भाव और राग से, खोता जा रहा नित् ही पर हर क्षण अजर एकांत में: तुम रुको क्षण भर देखो दीखता क्या तुम्हें पन्नों ...

तुम्हारे अधर

चित्र
Source - artist.com बारिशें खंगाल रही हैं धरती की कोख़ आंधियाँ पलट रही है तमाम वस्त्र, लोग भूलते जा रहे हैं  जो कुछ देखा, किया और सीखा उन्होंने, रातें छुपी हुई हैं दीवारों के पीछे दिन ढूँढ रहा है पनाह एक गड्डे में; आँखें चीख रही हैं मौन  हाथ लिखते जा रहे हैं भविष्य, पैरों को भुला गई हैं सारी राहें, थकान भर चुकी हैं साँसों में। तुम आती हो तब जीवन के संताप को हरने, मैं हो जाता हूँ ग़ुम तुम्हारे हाथों की परिधि में। मिट जाती हैं व्यंजनाएँ तमाम एक प्रेम से सरोबार आलिंगन में, खुलते हैं इन्द्रियों के पैबंद चटकने लगते हैं दिनो-रात। प्रकृति के इस पुनर्जीवन पर सृष्टि-सर्जन के गीतों को गाते तुम्हारे सुकोमल गुलाबी अधर; मैं रख देता हूँ  अपने मुख को उन पर, पढ़ने को वे तमाम रतजगे विषाद के दिनों से संजोये हुए: जो कहने आयीं तुम अपने अधरों पर रखकर।                                 - कमलेश

अनजानी सी तुम

यूँ ही घूमते हुए किसी पार्क में, जब देखता हूँ वहाँ खेल रहे बच्चों को, तो मेरा बचपन हिलोरें मारने लगता है मेरे भीतर। कुछ मुस्कुराहटें जो अनजान लोगों के चेहरे पर देखता हूँ, तो ...

ग़ज़ल

कोई लम्हा ठहरा नहीं जम के एक अरसे से यहाँ, आँखें बिछी हुई थीं कब से तुम्हारे इंतज़ार में यहाँ। तुम आये काली घटाओं के साये में मिलने मुझसे, बदलकर रख दिया तस्सवूर तुमने पल भर में ...

अभिव्यक्ति व्यर्थ है और व्यर्थ हैं परिभाषाएं सारी

चित्र
Source - Time.com कुछ रातें ज़िन्दगी का आईना सामने रखती हैं। जब मैंने तुम्हें देखा अपने क़रीब बैठे हुए तो मैंने जाना कि प्रेम सबसे ताकतवर और असरदार हथियार है किसी भी लम्हें में ख़ुद को जी लेने के लिए। तुम प्रेम हो यह बात मैंने तब जानी, जिस दिन तुमने मुझसे कहा था कि हमारा रिश्ता प्रेम की बुनियाद पर खड़ा है। तुम्हें रखना किसी दिन के आठों पहर अपने सामने और खो देना तुमको ठीक अगले ही दिन ख़ुद में से, यह और कुछ नहीं मेरे प्रेम में डूबने के मार्ग को आसान बनाता है। मैंने यही चाहा है हमेशा कि प्रेम में खोकर, सब कुछ ही खो दिया जाये, प्रेम को भी! लेकिन मैं नहीं जानता यह कथन कितना सत्य है! जब तुम बातें करती हो, कई नदियों, जंगलों, शहरों और पर्वतों के पार से, तो मुझे कालिदास की याद आ जाती है। तुम कालिदास के लिए सदैव अकल्पनीय ही रही, केवल मुझे ही अब तक तुम्हें प्रकति के प्रेम के ज़रिए ख़त लिख सकने का सुख प्राप्त है। तुम्हें ढूँढना उगते हुए सूरज में, मुझे पंछियों की चहचहाहट से दूर नहीं करता। किसी रेगिस्तान में मैं तुम्हारी ख़ुशबू के क़रीब चला आता हूँ उसकी रेत को अपने हाथों में थाम लेने भर से। कोई भ...

मैं वहीं हूँ

मैं वहीं हूँ, जहाँ लेते हो तुम साँस जहाँ उठकर देखी धूप तुमने, हूँ वहीं उस छुअन में मैं। जब जब चले तुम्हारे कदम धरा पर, तब तब पाया है मैंने अपने पैरों में धूल को चिपके हुए; हूँ वह...

ख़ताओं की पवित्रता

ख़तायें, कितना छोटा और पेचीदा है यह देखने और सोचने में, लेकिन मैंने कभी इतना ख़याल किया नहीं इस शब्द पर, शायद मैं ज़रूरतों को वक़्त देने में व्यस्त था जिसका परिणाम यह हुआ कि ज़िन्द...

केवल तुम सच हो

तुम्हारे दूर होने पर, मैं ढूँढता हूँ तुम्हें अपने लिखे शब्दों में और शब्दों में तुम्हारे होने की हकीक़त को, तुम्हारी हकीक़त में तुम्हारे होने के एहसास को तुम्हारे होने में ...

तुम्हारी आँखें

तेरे दीदार से उपजी बेफ़िक्री के बाद, हम नहीं देखते कि लोग क्या देखते हैं।                                                  - नागेश ये पंक्तियाँ उतनी ही सार्थक होती हैं जब तुम...

अँधेरे में तुम

तराशता है जुगनू अपने पंख रात की ख़ामोशियों से, फिर ढलक जाते हैं किसी की पलकों से आँसू जब रात सीढ़ियाँ चढ़ रही होती है। मेरे शहर के कंधों पर वज़न बढ़ जाता है रात के होने का, जब तुम देख...

काफी नहीं होगा

मेरे आसुंओं पर बड़ा देना यूँ रुमाल काफी नहीं होगा, हर बार की तरहा मेरे ग़म बाँट लेना काफी नहीं होगा। वक़्त बाँटने की कीमतें आसमान छूने लगी हैं अब तो, सिर्फ एक शाम के लिए यहाँ आना ...

तुम ख़ुद एक भाषा हो

    कुछ बातों को मुझे लिखने की ज़रूरत नहीं क्योंकि मुझे उनका साथ होना ज्यादा अच्छा लगता है ऐसी बातें लिख देने से मर जाया करती हैं। मैं तेरे किस्से कभी कभार लिखता हूँ इस आस में ...