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संवाद – बात से साथ का सफ़र

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इस दुनिया को कान की ज़रूरत है लेकिन हर कोई बस बोलना चाहता है...
यह कथन दो तरीकों से किस तरह देखा जा सकता है, बस उस देखने के तरीके की प्रक्रिया का नाम संवाद है. हर किसी के पास इतनी कहानियाँ है कि लिखते लिखते सारे पन्ने भरे जा सकते हैं और हर कोई उतना ही उत्सुक और आतुर है कि किसी और की कहानी सुनने के लिए उसके पास धैर्य नहीं है. ज़िन्दगी की राहों से पनपती कहानियाँ और उनसे जन्म लेते हुए हर पल के किस्से और किस्सों से उपजा खालीपन, मानसिक असंतुलन इतना बढ़ जाता है कि इंसान भूल जाता है उसे जीना किस तरह है! संवाद की प्रक्रिया में ठहराव और स्थिरता है ज़िन्दगी की रफ़्तार को समझने के लिए वक़्त प्रदान करती हुई. कानों और दिमाग को कितने आराम की ज़रूरत है इस बात का ख़याल शायद उम्र भर किसी को नहीं आता क्योंकि हर कोई, बस रोज़ भागने वाले हाथ और पैर को आराम देना चाहता है. संवाद की शुरुआत जिस मौन के साथ हुई उसने मुझे इस बात का सन्देश दिया कि अभी मेरे पास काफी वक़्त है जो मैं अपने सवालों के साथ बिता सकता हूँ और उनसे ज्यादा अच्छी तरह से वाकिफ़ हो सकता हूँ. बढ़ते दबाव और तनाव के बीच भी ख़ुद के लिए समय निकालना कितना महत्त्वपू…

तुम्हारे अधर

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बारिशें खंगाल रही हैं धरती की कोख़ आंधियाँ पलट रही है तमाम वस्त्र,
लोग भूलते जा रहे हैं  जो कुछ देखा, किया और सीखा उन्होंने, रातें छुपी हुई हैं दीवारों के पीछे दिन ढूँढ रहा है पनाह एक गड्डे में;
आँखें चीख रही हैं मौन  हाथ लिखते जा रहे हैं भविष्य, पैरों को भुला गई हैं सारी राहें, थकान भर चुकी हैं साँसों में।
तुम आती हो तब जीवन के संताप को हरने, मैं हो जाता हूँ ग़ुम तुम्हारे हाथों की परिधि में।
मिट जाती हैं व्यंजनाएँ तमाम एक प्रेम से सरोबार आलिंगन में, खुलते हैं इन्द्रियों के पैबंद चटकने लगते हैं दिनो-रात।
प्रकृति के इस पुनर्जीवन पर सृष्टि-सर्जन के गीतों को गाते तुम्हारे सुकोमल गुलाबी अधर;
मैं रख देता हूँ  अपने मुख को उन पर, पढ़ने को वे तमाम रतजगे विषाद के दिनों से संजोये हुए: जो कहने आयीं तुम अपने अधरों पर रखकर।                                 - कमलेश