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सवाल किस बात का है?

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सैंकड़ों जलती चिताएँ अनगिनत भटकते लोग, पैदल घर लौटती एक दुनिया प्यास-भूख से थमती साँसे, आँसुओं की अविरल धारा छोड़ गए साथियों का ग़म। कितना कुछ है यहाँ जिसे देखने के लिए आँखें नहीं करुणा की ज़रूरत है। वे पूछते हैं तुम किस पाली में हो? मैं ख़ुद से करता हूँ सवाल कि क्या अब भी देखा जाए एक ख़्वाब जिसमें धर्म की लकीरें न हों पैसों से पनपती खाई न हो घर लौटने वालो के लिए आराम हो अकेली लड़की के मन में खौफ़ न हो स्त्री के सिर पर तमाम बोझ न रखा हो बच्चों के खेलने का खुला मैदान हो मान-सम्मान के परे लोग मिलते हों बचपन से लाई गई हंसी हो युवाओं की ज़ुबाँ पर सवाल हो हुक्मरानों की नीति नहीं नियत साफ़ हो बगल में आग लगने पर  अपने घर में चादर ओढ़कर सोने वाले न हों! मैं चाहता हूँ कि  यह न पूछा जाए कि कौन किस पाली में बैठा है बल्कि सवाल चाहत का रहे; जैसे एक प्रेमी-युगल चाहे साथ बैठकर बातें करना ढलते सूरज को सुकूँ से देखना एक-दूजे के होंठो का चुम्बन भीड़ के डर से परे एक आलिंगन जिहाद से परे चाँदनी की एक सैर पहचान से बहुत दूर पनपती प्रेम और सिर्फ प्रेम की एक दुनिया।           ...

वर्तमान का ख़्वाब -

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हम सारी ज़िन्दगी उस ख़्वाब के लिए अपनी नींदे ख़राब कर देते हैं जो हमने अब तक की सबसे गहरी और ख़ूबसूरत नींद में देखा था। नींद जागने से उतनी भी अलग नहीं होती जितना इसे बना दिया गया है: बल्कि नींद में आप अपने जीवन के उस हिस्से को नए सिरे से जीने लगते हो जिसको आप जागते हुए जीने की हिम्मत करने से बहुत डरते हो। इन सारी चीजों से जुड़े रास्ते बहुत बिखरे हुए से लगते हैं मुझको। एक दिन ऐसा आएगा जब यह बिखरते बिखरते उलझने लगेंगे और फिर हममें से किसी को भी अपनी मंज़िल कभी भी नहीं मिल पाएगी; और तब मैं किसी पेड़ के नीचे एक किताब हाथ में लिए मुस्कुरा रहा होऊँगा। उस दिन मैं अपने द्वारा जिये गए तमाम लम्हों को समेटकर उनकी गठरी को उस नदी में जाकर फेंक आऊँगा जिस नदी में पैर डुबोना मुझे सबसे ज्यादा सुकून देता है। इस उम्मीद को अपने होने के किसी कोने में छुपाये कि शायद ऐसा करने से मैं अपना अतीत मिटा सकता हूँ जिसमें वे बिखरे-उलझे रास्ते भी मिट सकें। और तब मेरे पास शेष रह जायेगा निरा वर्तमान; जो मेरा अपना है। इस वर्तमान को मैं उस लड़की के हाथों में हाथ रखकर जीना चाहता हूँ जिसे पिछले कुछ दिनों से मेरे फ़ोन कॉल का इंतज़ार र...

इंतज़ार और तुम -

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   Source - Nojoto  इंतज़ार के क्षण दुनिया में घटने वाले सबसे लंबे और गहरे क्षणों में गिने जा सकते हैं। जब सारा संसार अपनी गति में तल्लीन होकर बेतहाशा गन्तव्यहीन सा भागा जा रहा होता है; ठीक उसी समय कुछ जोड़ी आँखें, अनेकों कान, अनगिनत होंठो के जोड़े और कई-कई हाथ अपने अस्तित्व में कुछ और जोड़ लेने की चाहत लिए, ख़ुद को इंतज़ार की अनंत परिधि में धकेल दिया करते हैं। इंतज़ार का वजूद केवल उन्हीं क्षणों में सिमटकर नहीं रहता अपितु ये लम्हें किसी व्यक्ति या विशेष के समूचे वर्तमान में ख़ुद को विस्तृत कर देते हैं; जो उसके स्वयं के संचालित होने के क्रम को धीमा करने लगता है और घड़ी दर घड़ी उसे गहराई की अनेकों परतों में उतार ले जाता है। मैं दुनिया में घटने वाले तमाम क्षणों में से कुछ-एक को चुनकर, उसके दीदार के लिए मुंतज़िर हो जाना चाहता हूँ। मैं उस क्षण के इंतज़ार में अपने होने को स्थगित करना चाहता हूँ, जब वह इन भागते हुए लम्हों में अपने प्रेम से सरोबार आलिंगन से; चंद पलों के लिए ही सही; इन्हें थाम कर रख देगी। - कमलेश

प्रेम, ज़िन्दगी, मिथ्या और तुम -

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जीवन का हर पल एक अवसर माना जाता है. प्रेम को हर कदम के लिए अहम माना जाता है. मिथ्याओं से पार पाना असंभव माना जाता है. लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मानने, समझने और जान-लेने में फर्क किसी को समझ नहीं आता है. लोग व्यंग भरी बातों से इस कठिन समय को हल्का करने में लगे हैं और सोचा करते हैं कि कब यह कोरोना नामक दानव इस धरा से अपना पिंड छुड़ाये, हाँ बिल्कुल सही पढ़ा; कोरोना को हमसे पिंड छुड़ाना पड़ेगा हम तो कतई न मानने वाले. अब तुम ख़ुद ही देख लो, इतनी सख्ती और गाइडलाइन के बावजूद हम पहुँच जाते हैं यह जताने कि हम कितना चाहते हैं तुम्हें और जताने के लिए भी कितने आतुर हैं उस प्रेम को तुमसे!  शीर्षक पढ़कर यह भ्रम भी पाला जा सकता है कि मैं कोई भावपूर्ण प्रेम अनुभव या कहानी लिख बैठा होऊँगा, लेकिन मेरे किसान पिता को हाल ही में लाये गये तथाकथित किसान-बिलों से संतुष्टि हो पाए तब न! मेरे दोस्त ने जिस लड़की से प्रेम किया वह अपना सर-नेम कुछ और लिखती है; वे दोनों बग़ैर किसी मुश्किल के जी पाए तब न! हर रोज़ 110 से ज्यादा बलात्कार के केस या ख़बरे पढ़ने के बावजूद मेरा दिल समझ पाए कि मेरी महिला दोस्त या बच्चियां इस देश मे...

केलि और कल

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Source - fr123rf.com ज़िन्दगी के पन्ने कितने ख़ाली हैं यह उनके भरते चले जाने के दौरान महसूस होता है. अपने अस्तित्व में से कुछ खो देने ग़म मुझे इस क्षण में महसूस होता है जब मैं कुछ भी नहीं दे पाने की स्थिति में होता हूँ. कल, यह एक सुरक्षित ख़्वाब है और एक याद भी जिसे अपनी सहजता के अनुसार जीवन में लाया जा सकता है. मेरा कल उन सारे ख़यालों का पुलिंदा है जिन्हें मैं ज़िन्दगी जीने के स्वांग में कहीं छोड़ बैठा हूँ; वे तमाम पल जिनको मैं अपने तईं नहीं जी सका. और इस विचार को देखकर यह लगता है जैसे मैं व्यर्थ ही जीए जा रहा हूँ. कल सजाने के फेर में जब हर दिन छोटी छोटी गलतियाँ करता जाता हूँ तो मुझे सपने में आने वाला कल एक बहुत बड़ी गलती के रूप में नज़र आता है. दुनिया ने इंसान का जीना आसान करने के लिए अनगिनत उपाय किये और किये जा रही है किन्तु मैं यह जानना चाहता हूँ कि ज़िन्दगी जीने की प्रक्रिया को आसान या मुश्किल करने का क्या अर्थ है!  कभी कभी मैं सोचता हूँ कि आदम और हव्वा ने अपने अप्रतिम और अतरंग क्षणों में कल का आविष्कार किया होगा और चाह रखी होगी कि कल भी उनकी केलि-क्रिया के समान सहज, सुन्दर और सजग बना र...

जब हमारे आसपास संकट हो तब जीवन कैसा दिखता है?

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Source- globalsharingweek.org हम अक्सर शिकायत करते हैं कि हम अपने करीबी लोगों और स्वयं के लिए समय नहीं दे पाने का कारण हमारे कामों की फ़ेहरिस्त का लम्बा होना है. लेकिन अब, हम अपने परिवार के साथ हैं, पक्षियों के चहचहाहट के साथ जागते हैं और ऑफिस के लिए तैयारी करने के जैसा कुछ भी नहीं है। इसके अलावा भी, समय पर घर लौटने, ट्रैफिक-जाम का सामना करने और परिवार के साथ समय बिताने के लिए चीजों को अलग रखने के लिए घबराने की ज़रूरत नहीं बची है। इन सभी गहरी इच्छाओं की पूर्ति का समय मिलने के बावजूद, आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हम में से कई तनावग्रस्त हैं और इसे मैनेज करने के लिए काउंसलर तक खोज रहे हैं, लेकिन हम ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या जिस तरह से हम महसूस करते हैं, बोलते हैं और काम करते हैं उसके बीच एक बड़ा अंतर है?      हमने कभी नहीं सोचा था कि इस तरह का जीवन भी हमारे हिस्से में होगा। हम अपने माता-पिता, भाई-बहनों, बच्चों और परिवार के सदस्यों के साथ पूरे पूरे दिन और रात बिता रहे हैं और साथ ही घर से ही अपने काम को अच्छे से मैनेज भी कर रहे हैं। और साथ में दुनिया के हर कोने से ...

प्रेम और करुणा... काफी है!

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घुप्प अँधेरे से भरी दुनिया में, हर कोई तलाश रहा है एक टुकड़ा रोशनी; जिसके सहारे उसे मिल सके अपने खोए हुए जीवन का पता. राहें खूँखार होती जा रही है, पानी में ज़हर घोलने वालों की संख्या बढ़ गई है चंद गुज़रे दिनों से: और भी न जाने कितनी तरह से मुश्किलों ने पाँव पसारे हैं यहाँ! मैं इतना तो जानता हूँ लेकिन कि मुझे कितने लम्हों में समेटना है अपनी आँखों के आगे फैले हुए संसार को, मुझे पता है यह भी कि कितना भाव दूँ किसी की नफ़रत को ताकि वह धरी की धरी रह जाए! और ख़ास बात तो यह है कि मुझसे कहा है किसी ने कि ख़ुद से किया गया प्रेम और सबके लिए उपजाई हुई करुणा इस दुनिया की तमाम मुश्किलों और हथियारों का सामना करने के लिए ज़रूरत से बहुत ज्यादा काफी हैं. -        कमलेश  तस्वीर के लिए शुक्रिया विजय भईया

प्रेम की आवश्यकता

दो सितारों की गुफ्तुगू सा एक रिश्ता पल रहा है मेरी पलकों के नीचे, न कोई वादा, न कोई मंज़िल बस सफ़र में चल रहा है कब से; कभी कोई किताब पढ़ता हूँ तो उसमें भी इसी की कहानी होती है, सुनता हूँ गर’ किसी के किस्से उनमें भी यही झलकता है. खेतों में फसल को पानी देते हुए, जानवरों के लिए चारा लाते हुए, किसी के हक़ में आवाज़ उठाते हुए, किसी कविता को लिखते हुए, ज़िन्दगी के किस्सों को सुनाते हुए, बदलाव की प्रक्रिया को अंगीकार करते हुए, दुनिया की राहों में ख़ुद को ढूंढते हुए, मैं नहीं खोज पाया आज तक और कुछ हर दफ़ा एक जवाब क़दमों को आकर्षित करता है कि दुनिया, मुझे और इस रिश्ते को प्रेम के साथ रहकर जीने की आवश्यकता है.                                                   - कमलेश

कृष्ण

तुम्हारे हँसने पर गर' तुम्हारी खिलखिलाहट में गूँजे वंशी, तो दुनिया से कह दूँ कि कृष्ण इंतज़ार में है तुम्हारे। रुक जाने पर तुम्हारे बैरागी हो जाएँ जो ये हवाएँ, तुम जान जाओगी ...

तुम

तुम, इसके सिवा कोई शब्द क्यों नहीं है दुनिया में कि जिसके उपयोग से तुम्हारे संबोधन को चरितार्थ करूँ मैं! तुम्हारा अस्तित्व उस नीम के पेड़ सा है जिसे मैं अपनी सेहत, सीरत और आरा...

कवितायें (दक्षिण यात्रा)

कविता - १ एक पगडंडी भाग रही है अपनी जान बचाने दौड़ती हुई रेल की पटरियों के साथ; शायद कोई पक्की सड़क, उसका पीछा कर रही है। ________________________________________ कविता - २ एक नज़र ने देखा मुझको दूरी के दूसरे छोर से, क...

वसीयतनामा

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किसी भी सफ़र के समय दो भागों में बँट जाती है दुनिया, मैं बन जाता हूँ दर्शक ताकि बचा हिस्सा दर्शन हो जाये, दार्शनिक का कोई अस्तित्व नहीं कहानी में: सब ढूँढ रहे हैं खुलापन पैरों में जंज़ीरों को ढोते हुए, उजाला दीखता तो है आँखों में पलकों में जमे हुए अँधेरे के पीछे। मैं चलता हूँ आसमाँ के नीचे जो घूरता है हर कदम मुझे, साथ चल रही लड़की कहती है दूर जाते हो तुम तो आँखों में बादल छा जाते हैं, मैं कहता हूँ  हाँफती धरती और घूरता आसमान, मौन से प्रतिपल होता संवाद और पलकों में लिपटा इंतज़ार प्रेम का दूसरा नाम है। दो हिस्सों में बँटते से सफ़र में झाँकता हूँ खिड़की से बाहर, तो दुनिया दीखती है नई सी जहाँ इंसान की कमी लगातार बढ़ रही है जहाँ सपनों का अकाल चल रहा है, मेरे हमनफ़स मेरे वसीयतनामे में मिलेंगे दो नाम: पहाड़ की गोद में बसा जंगल और मोर पंख रख पाओ सहेजकर तो रखना।                                           - कमलेश

प्रेम फलित होता ही तब जब जीत कर रह जाए हारा

प्रेम के वशीभूत होकर लिखता जा रहा है वह निरंतर, है घिरा सब ओर से भीड़ भाव और राग से, खोता जा रहा नित् ही पर हर क्षण अजर एकांत में: तुम रुको क्षण भर देखो दीखता क्या तुम्हें पन्नों ...

दुनिया की जरूरतें

आया तो उड़कर एक ही पत्थर था, लेकिन उसने दो आंखों में अँधेरा और साथ की दस नज़रों में खून भर दिया। रास्ते तो लगे ही थे दस साल की पीठ पर टंगे बैग की हिफाज़त में, लेकिन अभी अभी इंसान से ...

अनजानी सी तुम

यूँ ही घूमते हुए किसी पार्क में, जब देखता हूँ वहाँ खेल रहे बच्चों को, तो मेरा बचपन हिलोरें मारने लगता है मेरे भीतर। कुछ मुस्कुराहटें जो अनजान लोगों के चेहरे पर देखता हूँ, तो ...

वाकये, चुनाव और हम

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1. यह यमुना है, हाँ जी इस देश के 100 करोड़ से ज्यादा लोगों की यमुना मईया, जिसका पानी अभी ऐसी हालत में है जिसको पीना तो दूर छू लेने भर से आपको चर्म रोग और स्किन कैंसर जैसी बीमारी हो सकती है। एक तरफ हम इसकी माँ मानकर पूजा करते हैं और उसी पूजा के अंत में इसमें बेतहाशा कूड़ा करकट डाल देते हैं, तो जी यही है क्या शास्त्रों में पूजा का विधान?  भारतीयों के कर्मों और प्रकाण्डों ने जितना नुकसान प्राकृतिक संसाधनों को पहुँचाया है उतना बाकी चीजों ने नहीं। 2. हाल ही में दिल्ली में SEE के 3 दिवसीय लोकार्पण समारोह में पिछले 5 सालों से उसके लिए अथक प्रयास कर रहे दलाई लामा और उनकी टीम दिल्ली में थी, जिन्हें समारोह की समाप्ति के बाद प्रदूषण से उपजे संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। Source - Google 3. दिसम्बर में एक टीबी के मरीज़ को दिल्ली के एक नामी अस्पताल से डॉक्टरों ने 1 महीने तक जानबूझकर छुट्टी नहीं दी, क्योंकि डॉक्टरों का कहना था कि वह मरीज़ अगर अस्पताल से बाहर गया तो उसकी जान जाने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा, वजह दिल्ली का प्रदूषण। ऐसे अनगिनत वाकये हैं जिन्हें अगर हम देखें...

शहर

कोई भूलता नहीं अब रास्ते यहाँ सो भटकने की गुंजाइशें कम हो रही हैं, रास्ते नहीं आते लौटकर वापस अब शायद पीठ की आँखों पर पट्टी चढ़ गई है, दिन भर दौड़ता है सड़कों पर ये शहर, इसकी साँसे ...

खुशियाँ, हम और दुनिया

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आकस्मिक चीज़ें जितनी खुशियाँ देती है, वह खुशी निर्धारित चीजों से कभी नहीं मिल पाती। 2 नवंबर को मिले एक व्हाट्सअप मैसेज ने पिछले 5 दिनों में जितनी खुशियाँ, हँसी और यादें दी हैं वह मुझे ढूँढने पर तो कभी भी नहीं मिलती।                              मैं पिछले दिनों दीवाली पर घर गया था वहाँ प्रदूषण, न्याय और राजनीति जैसे मुद्दों पर काफी चर्चा का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला, क्योंकि ये चर्चा युवा दोस्तों और गाँव के लोगों के बीच बैठकर हुई। ऐसी घटनाओं से यह विश्वास और भी गहरा जाता है कि बदलाव किया जा सकता है और वह भी लोगों के साथ मिलकर, युवा दोस्तों में बहुत ऊर्जा है जिसका उपयोग वह सही दिशा में करना चाह रहे हैं, मार्गदर्शन जिस तरह अपने सहयोगियों से मुझे मिलता रहा है यह कवायद अब गाँव में भी शुरू हुई है कि जिस किसी को भी कोई सहयोग चाहिए वह सबसे संपर्क स्थापित करे ताकि समय पर काम हो सके। गाँव की बदलती हवा ने मुझे अपने सपनों और ज्यादा दृढ़ता से देखने की हिम्मत दी है।    ...

हमारी जीवनशैली और दुनिया

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Source- Khabarindia.com यह ख़बर लगभग हर उस व्यक्ति को पता होगी जो खबरें पढ़ता है कि दिल्ली में १ से १० नवम्बर तक आपातकाल (प्रदुषण का आपातकाल) घोषित किया गया है क्योंकि वहाँ की हवा दुनिया की सबसे ख़राब हवा है जोकि न तो सुबह की सैर के लायक है और न ही एक गहरी साँस लेने के | इसका मुख्य कारण है आसपास के राज्यों में जलाये गए फसलों के अवशेष और वहाँ के वाहनों का धुआँ, फिर भी लोग केवल एक दूसरे पर आरोप लगाते दिखाई पड़ते हैं | जानकारी के लिए यह बता दूँ कि २ करोड़ की दिल्ली की आबादी के लिए १ करोड़ वाहन हैं, एकमात्र शहर जहाँ लोग स्टेटस के लिए निकल पड़ते हैं सड़कों पर बगैर यह सोचे कि कल क्या होगा!  हवा की खराब हालत को देखते हुए ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में केवल २ घंटे पटाखे जलाने का  आदेश दिया है और बाकि राज्यों से यह अपील की है कि वह कम से कम प्रदुषण की ओर कुछ कदम जरूर बढ़ाएं | Source-Bharatkhabar.com                          हर वह शख़्स जो इस अपील या आदेश जिस तरह भी इसे देखते हैं, यह जान लें कि केवल...

मैं चाहता हूँ

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मुतमइन रहता था एक शख़्स, जब अपनी आँखों के आगे वह देखता था घने दरख़्त औ' सब्ज़ ज़मीं, एक रात थोड़ी ठहर कर गुज़री ऐसे उसे कोई सपन तक न आ पाया, सुबह तक दरख़्त औ' ज़मीं गर्दन तलक पानी में डूब चूके थे। गुहार लगाता भी तो वह किस से? जो थे सुनने वाले उन्हीं ने डैम के दरवाज़े साहब के कहने पर खुलवाये थे। Source - Imperiya.by अपने मुस्तक़बिल पर रोती है इक औरत पुराणों में जिसको वसुधा कहा है हमने, एक बार भी नहीं सोचते अब हम कि वासना का हमारी अंजाम किस दिशा से लौटकर आने वाला है! दिल थाम कर बैठिये अभी तो दिल्ली धुआँ हुई है, कल समंदर आपके घर का भी पता पूछने आएगा। वह रो रहा था कल नदी के किनारे बैठा कि मंदिर का फैसला जनवरी में आएगा, उसे तो यह तक याद नहीं कि ख़ुद उसने अपने पिता से ठीक से बात कब की थी? नाम बदलता है कोई करोड़ों में मेरे शहर का, जाकर देखे तो सही कोई रात में जे.जे. कॉलोनी का मंज़र, मज़ाल जो अगली सुबह हलक़ से निवाला उतर जाए! एक बिल्ली को पत्ते खिलाकर पालता है ख़ुद लोथड़े खाता इक परिवार, मैं जानता हूँ जिस दिन वह बंदर बच्चे के हाथ से रोटी छीनकर भागेगा, तब समझ में ...