एक सैनिक की जुबानी ...
Source-Oneindia वो रोज़ हम पर पत्थर फेकते है , हम उन पर गोलियां नहीं दाग़ते बल्कि उनको महफूज़ रखने की कोशिश करते है । जब कुदरत ने अपना कहर बरपाया हमने जान पर खेल कर उनको बचाया , उस वक़्त ना मज़हब देखा ना ज़ात सोचा तो बस देश और इंसानियत के बारे में । जब कभी आतंकीयो ने उनको सताया हमारे दोस्तो की कुर्बानीयों ने बचाया । हम भी इंसान है इन सब की तरह दिल हमारा भी तो धड़कता है वैसे ही , हमने पहली बार अपनी इज्ज़त की खातिर इनको सबक क्या सिखा दिया, हंगामा खड़ा कर दिया नैतिकता के इन् ठेकेदारों ने तब क्यों वो पट्टी बांध लेते हैं ? जब वो हम पर पत्थर बरसाते है , कौन प्यारा है ?हम पूछते है ये पत्थरबाज़ या जाँबाज़ सैनिक ! ...