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मैं और ख़्वाब

मैं देख रहा हूँ खिड़की से लटकते इन सारे अधूरे अजनबी ख़्वाबों को, ये सपने जो कभी मेरे नहीं रहे ये लोग जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा, अचानक से किसी रोज़ आएँगे मेरे शहर और माँगेगे अपनी हक़ीक़त के सवालों के जवाब; मैं रहूँगा उसी तरह ख़ामोश जिस तरह अपने ख़्वाब के खोने पर हो जाता हूँ, तब मैं याद करुँगा वो सारे क़िस्से, जो ख़्वाब को फिर देखने के लिए सुनाए थे मैंने ख़ुद को पास बैठाकर। मैं नहीं जानता कि कोई क्या चाहता है मुझसे, मैं जानता हूँ केवल इतना ही कि ढूँढ लेगी मेरी राहें हर उस पल को, हर उस शख़्स को, जहाँ तक मुझे पहुँचना लिखा है।                                       - कमलेश

जब तुम्हारी याद आती है...

भूख,प्यास, भावनाएँ, सब भूल जाता हूँ, और नींद, जागना, सपने, ख्यालों को भी भूल जाता हूँ, जब मुझे तुम्हारी याद आती है... साँसे रहती हैं वहीं की वहीं, कदम ठहर जाते हैं सड़कों पर चलते हुए, रूक जाता हूँ मैं ख़ुद को लिखते हुए मौन हो जाता हूँ किसी गीत को गाते, जब तुम्हारी याद आती है मुझे... निकलता हूँ जब अपना चोला उतारकर जंगल की राह पर, देखता हूँ उसके दरख्त और सब्ज़ जमीं को तब पंछियों के चहचहाने में ढलते सूरज की रोशनी में, एक अक्स दिखाई पड़ता है वहाँ; जब मुझे तुम्हारी याद आती है... शाम के ढलते साये में जब टिका लेता हूँ अपनी पीठ उम्मीदों के घर की छत पर बनी मुंडेर से, टिमटिमाता है रात का पहला तारा आसमान के किसी कोने में, निकल आता है चाँद अचानक से, और बदल जाता है मौसम मेरे हालातों का जब तुम्हारी याद आती है मुझे...                                       - कमलेश

जब इश्क़ उतरने लगता है

उनींदी आँखों से सपने चूती उम्मीदें जब तकियों पर सिर पटकते हुए, अपनी मौत का रोना रोते रोते थक जाती है; तब बिस्तर की सिलवटों की ज़ंजीरें ख़ामोशी में चीख़ती बातों को, वैसे ही निगल ...

ज़रूरत नहीं

खुशियों के बहानों को तुम्हारे तुम्हें भुलाने की ज़रुरत नहीं, हंसी के अंदाज़ को अपने छुपाने की ज़रुरत नहीं । जैसी ज़िन्दगी तुमने गुज़ारी है अब तक, वैसे ही आगे जियोगी तो बेहतर होग...

गुज़रना

मेट्रो स्टेशन पर बस का इंतज़ार करते हुए, मेट्रो के गुज़र जाने का गुमान नहीं होता । गुज़रना इंतज़ार का और तुम्हारा बिलकुल ही अलग-अलग होगा मेरे लिए, लेकिन सपनों के गुज़रने और जिंदगी के गुज़र जाने में अनगिनत समानताएं होंगी । तुम चाहो कभी मुझसे कुछ भी तो मैं केवल इतना ही चाहूँगा कि गुज़रो कभी तो ऐसे गुज़रना जैसे चुनावी वादा गुज़रता है ।                           .....कमलेश.....

सच्चाई

मैंने देखी ग्यारह साल की ढोलक, और छः साल की बेक फ्लीप । ऐसा लगा कि जाकिर साहब और टाइगर श्राॅफ ने, व्यर्थ ही कर दिया जिंदगी को क्योंकि यह दोनों पूरी दुनिया को प्रशिक्षण दे सकत...

फिर मैं कविता लिखता हूँ ।

इन अंधियारों के बाहर जाकर मैं अंधियारों में झांकता हूँ, उन दरवाजों के भीतर जाकर मैं दरवाजों में देखता हूँ, तुम जो चाह रहे हो सुनना कभी ना तुमसे कहता हूँ, निकलकर खुद से बाहर फिर मैं कविता लिखता हूँ | टूटे हुए को जोड़कर फिर नए सिरे से चुनता हूँ, समेटकर बिखरे हुए इंसान   नित नए खिलोनें बुनता हूँ, जिनको कर दिया है विलुप्त तुमने बच्चों के बचपन से, छीन लिया जिनको तुमने अपने वजूद के सपनों से, मत ग्रास करों यूँ इनको एक बच्चा बन यह कहता हूँ, पाकर सब कुछ खो देता जब फिर मैं कविता लिखता हूँ | तुमको वाजिब लगता है यूँ उठाना सवाल मेरे शब्दों पर, पूछता हूँ मैंने कब कहे हैं कोई शब्द ही अपने कथनों में, बन चूके ग़ुलाम तुम औरों के इस क़दर के खुद को भूल गए, ना देख पाए आईना भी तुम फिर मुरझाये से फूल हुए, अब भी नहीं कहता हूँ तुमसे बस खुद को यह समझाता हूँ, जुड़ जाता हूँ बिखरकर जब फिर मैं कविता लिखता हूँ |                                 .....कमलेश.....    

कोटा वृतांत

चित्र
४ मई २०१५, वो अपने पापा के साथ डकनिया तलाव रेलवे स्टेशन पर खड़ा था, ये भी नहीं जानता था की जाना कहा है । एक ऑटो वाले से पूछा “यंहा IIT की कोचिंग कहा है ?” ऑटो वाले ने जवाब दिया “कौन सी बिल्डिंग जाना है भैया ?” खैर उसने अपना बैग निकाला और देखा एक पुराने लैटर को जिसमे सबसे उपर CP लिखा हुआ था, लड़के ने कहा “जी CP ले चलो ।” ५मिनट के बाद वो अपने पापा के साथ CP TOWER में था । एडमिशन सेक्शन में जाकर उसने पूछा “ IIT JEE के लिए कहा एडमिशन होंगे ?’’ कुछ वक़्त बाद वंहा के हेल्पर ने उसे पूरी जानकारी दी और कुछ २ घंटे बाद वह भी कोटा का छात्र बन चूका था, उन १ लाख स्टूडेंट की लिस्ट में उसका भी नाम लिख चूका था जो यंहा हर साल सिर्फ कोचिंग करने आते थे । १० मई २०१५ ,          इंदिरा कॉलोनी का C -५१ मकान, फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरे में बैठा ये लड़का एक साल बाद खुद को IITIAN बनते देख रहा था । शाम को ५ बजे ओरिएंटेशन सेशन में जाकर डॉ. प्रमोद माहेश्वरी का आत्मविश्वास से ओतप्रोत भाषण सुनकर रात के ९ बजे अपने हाथ मेें 4 किताबे और होठ पर हलकी मुस्कराहट लेकर अपने कमरे पर पहुंचा,...

तुम, मैं और मोक्ष

कभी दरिया में बहता कभी किनारों से टकराता, किसी उपवन में ठहरकर कुछ पल को सुस्ताता, चला जा रहा है मन मेरा एक मंजिल की ओर । सफर अकेले शुरू हुआ मगर अब थोड़ी तन्हाई साथ है, कुछ तारीखे...