रविवार, 2 दिसंबर 2018

अनुभव और आवश्यकताएँ

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही,
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही|
                                               - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
Source - Parwarish Cares

हाल ही में मैं 'लैंगिक साक्षरता' पर एक प्रशिक्षण में शामिल होने का अवसर मिला। जिसमें टीम आओ बात करें के लिए जुटे प्रतिभागियों के साथ हम सबने बहुत सी यादों और एक वातावरण को सबके साथ सह-निर्मित किया। उस वातावरण से ऊपजे माहौल में लोगों को 'सेक्स', 'यौन शोषण' और हमारे समाज की निषिद्ध चीजों के समूह पर बहुत ही आराम से बात करते देखना एक सुकून देने वाला अनुभव भी है। आओ बात करें की टीम ने मुझे अपने स्कूल शिक्षा के वर्तमान पाठ्यक्रम में 'सेक्स-एजुकेशन' और 'वैल्यू-बेस्ड-एजुकेशन' को समाहित करने वाले अपने विचार पर दृढ़ रहने का हौसला दिया है। हमारे समाज के कुछ सवेंदनशील लोगों द्वारा समय की आवाज़ को सुना जा रहा है और वे इस पर काम भी कर रहे हैं लेकिन समय की आवाज़ सुनना बाकियों के लिए भी आवश्यक हो गया है। हमें इस समय में खुद से एक प्रश्न पूछने की जरूरत है कि "क्या 'सेक्स' और 'यौन शोषण' जैसी चीजों के बारे में घरों की चार दीवारों में या कानों को मिलाकर खुसुर पुसुर करना भर बदलाव ला सकता है?"           
जिस तरह से हमारे आसपास की चीज़ों और माहौल में पिछले 15 वर्षों में चीजें बदली हैं, उससे निपटने के लिए वास्तव में इन सब मुद्दों पर बातचीत बहुत ज्यादा जरूरी हो गई है। और यह उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना अपने बच्चों से बाकी सब चीजों के बारे में बात करना। हम एक समाज के रूप में हमारे साथी और बच्चों के साथ 'सेक्स' और 'यौन दुर्व्यवहार' के बारे में बात नहीं करना चाहते, लेकिन उम्मीद करते हैं कि एक दिन बलात्कार, उत्पीड़न और यौन दुर्व्यवहार जैसी गतिविधियां खत्म हो जाएंगी। पर कैसे? क्या हम अब तक ऐसा कुछ सोच पायें हैं जिसके माध्यम से हम खुद को सशक्त बना सकते हैं और साथ ही आगामी पीढ़ी को भी, जिसके माध्यम से वे खुद को बचा सकने में सक्षम हो सकें।     

Source - Parwarish Cares

जमीनी तौर पर सक्रिय रूप से लगभग हर प्रकार की गतिविधियों में शामिल होते रहने के तौर पर और आओ-बात करें अभियान का हिस्सा बनकर, मुझे कई चीजों के बारे में पता चला है जिसके माध्यम से हम खुद को और दूसरों को बदल सकते हैं। तो आइये हम हमारे तथाकथित सुसंस्कृत समाज के निषिद्ध मुद्दों के बारे में बात करते हैं और इससे जुड़े मिथकों और गलत धारणाओं को हटाने की प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं।
शुक्रिया शब्द कभी भी परवरिश (www.parwarish.co.in) के द्वारा मेरे और कई युवाओं तथा बच्चों के जीवन में किये गए बदलाव के समक्ष न्याय करने में सक्षम नहीं है, यह एक यात्रा है जिसमें हम सभी एक साथ चलते हैं, बढ़ते हैं और सीखते हैं।
प्रेम और शुभकामनाएँ :-)
                                                                    - कमलेश 

बुधवार, 14 नवंबर 2018

खुशियाँ, हम और दुनिया

आकस्मिक चीज़ें जितनी खुशियाँ देती है, वह खुशी निर्धारित चीजों से कभी नहीं मिल पाती। 2 नवंबर को मिले एक व्हाट्सअप मैसेज ने पिछले 5 दिनों में जितनी खुशियाँ, हँसी और यादें दी हैं वह मुझे ढूँढने पर तो कभी भी नहीं मिलती।
             
               मैं पिछले दिनों दीवाली पर घर गया था वहाँ प्रदूषण, न्याय और राजनीति जैसे मुद्दों पर काफी चर्चा का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला, क्योंकि ये चर्चा युवा दोस्तों और गाँव के लोगों के बीच बैठकर हुई। ऐसी घटनाओं से यह विश्वास और भी गहरा जाता है कि बदलाव किया जा सकता है और वह भी लोगों के साथ मिलकर, युवा दोस्तों में बहुत ऊर्जा है जिसका उपयोग वह सही दिशा में करना चाह रहे हैं, मार्गदर्शन जिस तरह अपने सहयोगियों से मुझे मिलता रहा है यह कवायद अब गाँव में भी शुरू हुई है कि जिस किसी को भी कोई सहयोग चाहिए वह सबसे संपर्क स्थापित करे ताकि समय पर काम हो सके। गाँव की बदलती हवा ने मुझे अपने सपनों और ज्यादा दृढ़ता से देखने की हिम्मत दी है।
       
Source - Labhya.org
          गाँव से दिल्ली की वापसी में मैं पिछले 4 दिन मथुरा के पानीगाँव में बिताकर लौटा हूँ, लभ्य फाउंडेशन(www.labhya.org) टीम के 5 सदस्य वेदान्त, अमन, रमा, कोमल और मैं, एक माध्यमिक विद्यालय को अपनी कोशिशों से खूबसूरत बनाने में लगे रहे, जिसमें वहाँ के उपप्राचार्य जितेंद्र जोशी जी का अमूल्य योगदान रहा और हमें इनसे जोड़ने वाली विद्यालय विस्तार टीम का भी, जोकि भारत विकास न्यास के साथ वर्तमान में कार्यरत है। 4 दिनों में वहाँ के बच्चों और रहवासियों के साथ ढेर सारी बातें भी हुई और स्कूल की पेंटिंग भी। मुझे कुछ गाँव वालों से निजी तौर पर भी बातें करने का अवसर मिला, जिसमें उन्होंने गाँव के हालात और अपनी मुश्किलों का ज़िक्र भी किया कि किस तरह सरकारी या आसपास के गाँव से मदद न मिलने के कारण वहाँ के अधिकांश लोग एक ही फ़सल बोते हैं बावजूद इसके कि उनके पास विकल्प उपलब्ध हैं। गाँव की ओर से मुँह मोड़ती सरकारी नीतियाँ और आधुनिक विकास की राह, इस बात का संकेत है कि हम स्वार्थीपन को बढ़ावा देने के सिवाय कुछ नहीं कर रहे, विकास की पगडण्डी जब तक गाँव से होकर नहीं गुज़रेगी हम नए शिखर तो पाएँगे लेकिन उतनी ही गहरी ख़ुद की कब्र खोदने के बाद। जब तक समग्र सततपोषणीय विकास(sustainable development) की नीतियाँ नहीं बनेगी तब तक प्रदूषण, बाढ़, तूफान और तो और दंगे-फसाद जैसी मुश्किलें ख़त्म नहीं होंगी।
Source - Labhya.org

                  आईये मिलकर कुछ सोचते हैं, जिससे हमारी मुश्किलों को सुलझाया जा सके और गाँव के साथ साथ इस दुनिया तथा समस्त प्राणी जीवन को एक नया जीवन जीने की राह की ओर बढ़ सकें।
प्रेम और शुभकामनाएं 
                                                   - कमलेश

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

तेरा होना

जितनी बार में चला तन्हा
उन रास्तों पर जो तेरा पता बताते हैं,
तेरी खुशबुओं को वहाँ महकते पाया है;
ठहर के जहाँ
तूने कभी खनकाई थी अपनी हँसी
जम जाते हैं मेरे पाँव वहीं
जैसे तूने ठहरने के लिए कहा हो।

तेरे बिन सुना सा लगता है आँगन
मेरे आशियाने का,
जो तेरे होने से चहकता रहा है;
बिन किसी वादे के चल देना बनकर हमसफ़र
इतना आसान तो नहीं ही होता,
जितनी आसानी से तुझे पा गया था मैं।

हर वो चीज़ जो हमारे साथ रही
मुझे कारगर लगती है अब,
ख़ुद को समेटने के लिए;
इस दिवाली मैं
उन सब को कुमकुम लगाऊँगा।
                                        - कमलेश

रविवार, 4 नवंबर 2018

हमारी जीवनशैली और दुनिया

Source- Khabarindia.com

यह ख़बर लगभग हर उस व्यक्ति को पता होगी जो खबरें पढ़ता है कि दिल्ली में १ से १० नवम्बर तक आपातकाल (प्रदुषण का आपातकाल) घोषित किया गया है क्योंकि वहाँ की हवा दुनिया की सबसे ख़राब हवा है जोकि न तो सुबह की सैर के लायक है और न ही एक गहरी साँस लेने के | इसका मुख्य कारण है आसपास के राज्यों में जलाये गए फसलों के अवशेष और वहाँ के वाहनों का धुआँ, फिर भी लोग केवल एक दूसरे पर आरोप लगाते दिखाई पड़ते हैं | जानकारी के लिए यह बता दूँ कि २ करोड़ की दिल्ली की आबादी के लिए १ करोड़ वाहन हैं, एकमात्र शहर जहाँ लोग स्टेटस के लिए निकल पड़ते हैं सड़कों पर बगैर यह सोचे कि कल क्या होगा!  हवा की खराब हालत को देखते हुए ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में केवल २ घंटे पटाखे जलाने का  आदेश दिया है और बाकि राज्यों से यह अपील की है कि वह कम से कम प्रदुषण की ओर कुछ कदम जरूर बढ़ाएं |
Source-Bharatkhabar.com
                         हर वह शख़्स जो इस अपील या आदेश जिस तरह भी इसे देखते हैं, यह जान लें कि केवल प्रदुषण से ही भारत में हर वर्ष 13.56 लाख लोगों की मौत हो जाती है जबकि 2015 में यह आंकड़ा 25 लाख तक जा पहुंचा था | मतलब हर घंटे 150 लोग प्रदुषण की वजह से अपनी जान खो देते हैं | अब इस आदेश का विरोध करने वाले भी जान लें कि दिवाली के समय जोरशोर से पटाखे जलाने का चलन ज्यादा पुराना नहीं है इसे दो व्यापारियों ने 1940 में कुछ पटाखों की फैक्ट्रियां डाल, अपने फायदे के लिए लोगों को अपना ग्राहक बनाया था, और तब से यह चलन शुरु हुआ | रामायणकाल में तो वैसे भी पटाखों का ज़िक्र नहीं है वहाँ तो केवल मिट्टी के दीयों से दिवाली मनाई जाती थी, और पटाखों की पैरवी करने वाले कम से कम यह तय कर लें कि उन्हें अपने बच्चों को धुएँ और गंध से भरी दुनिया देनी हैं या फिर एक अच्छा भविष्य ! दिवाली अकेला ऐसा त्योहार नहीं है जो प्रदूषण में अपनी भूमिका निभाता है बल्कि क्रिसमस के दौरान भी ऐसे कई सारे तत्वों का उपयोग होता है जो हवा को बहुत ही बुरी तरीके से प्रभावित करते हैं जिनमें पार्टी प्रोपर्स का बहुत बड़ा योगदान है, साथ ही नए साल पर होने वाले जश्न भी वायु और ध्वनि प्रदूषण में अपनी अच्छी खासी भागीदारी रखते हैं।
          इन बातों से अवगत करवाने का मेरा प्रथम तात्पर्य यह है कि आप अपने तौर तरीकों पर सवाल उठाना शुरू कीजिए कि उनका पालन करना कहाँ तक सही है? और वह भी ऐसे युग में जहाँ हम पहले ही कई तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं लेकिन अपने त्योहार मनाने के तरीकों को बदलकर हम समाज को और आने वाली पीढ़ी को एक नया रास्ता तैयार कर के दे सकते हैं।
Source-Jagran.com

              उपरिलिखित आंकड़े प्रदुषण के सामूहिक आंकड़े हैं जिसमें अगर जल प्रदुषण की बात की जाये तो केवल इसकी वजह से 5.68 लाख लोगों की जान जाती है जिनमें अधिकतर गरीब या वंचित तबके के लोग होते हैं जिन्हें बुनियादी सुविधाओं का लाभ अभी तक सरकारें नहीं दे पाई है | हमारी कोशिशें यह होनी चाहिए कि हम हर इंसान को एक सा देख पाएं उसे वही सम्मान दें जो हम खुद के लिए चाहते हैं लेकिन दृश्य बिल्कुल उलट है। हाल ही में महाराष्ट्र राज्य के कुछ जिले सूखाग्रस्त घोषित किए गए हैं और वहाँ यह हालात है कि पानी 10 किलोमीटर तक नसीब नहीं, इसी साल की शुरुआत में केपटाउन शहर में पानी खत्म हो गया था जोकि समय पर बारिश आने की वजह से सुलझ गया लेकिन यह सब प्रकृति की हमारे लिए चेतावनियाँ ही हैं, जिनसे अगर हमने सबक नहीं लिया तो न जाने क्या होगा। समय रहते अपनी जीवन शैली को बदलने की क़वायद हमें करनी होगी, अन्यथा वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी बहुत ही जल्दी सच होना शुरू जाएंगी और तब हमारे पास वक़्त नहीं होगा|
             एक और पहलू की ओर मैं ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा जोकि प्लास्टिक रूपी कचरे का उत्सर्जन है केवल भारत देश 15342 टन कचरे का रोज़ाना उत्पादन करता है, जो विश्व के प्लास्टिक कचरा उत्पादन में खासा योगदान देता है जोकि  8.34 लाख टन रोज़ाना है | हमारे द्वारा किये गए सालाना प्लास्टिक उत्पादन में से 80 लाख टन कचरा समुद्र या अन्य जल स्त्रोतों में मिलता है जिससे 1000 से ज्यादा समुद्री जीवों की प्रजातियाँ प्रभावित हो रही है इसका मतलब यह है कि सीधे सीधे लगभग 2 करोड़ समुद्री जीवों का जीवन खतरे में है। जल में प्लास्टिक के मिलने से प्रदुषण का आलम यह है कि अब तो समुद्री पानी से निकाले किए गए नमक में प्लास्टिक इस कदर घुल चुका है कि उसे अलग करना काफी मुश्किल हो चुका है। हमारे घर में आने वाले नमक का 60 फीसदी हिस्सा प्रदूषित है। चाहे कंपनियां कोई भी दावा करती रहें, हक़ीकत को झुठलाया नहीं जा सकता|
             मेरा निवेदन है उन सभी लोगों की तरफ से जो इस धरती को बचाने में लगे हैं कि प्लास्टिक आपके जीवन में नहीं हो या काफी कम हो इसकी भी कोशिश हम कर सकते हैं केवल सरकारें और प्रशासन के नियम बना देने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला जोकि इस देश की सच्चाई भी है कि बावजूद लगभग सारे राज्यों में प्लास्टिक (पॉलीथीन) प्रतिबंधित होने के, धड़ल्ले से बिक रही है। जल प्रदूषण के अन्य कारणों में कारखानों द्वारा उत्सर्जित कचरे का भी नाम है, जहाँ हम एक तरफ साफ पानी की उपलब्धता की कमी से जूझ रहे हैं वहीं हमारा समाज केवल अपने अपने अहं को संतुष्ट करने के लिए और खुद को ऊंचा दिखाने के लिए विभिन्न त्योहारों पर जल को प्रदूषित करता है जिनमें होली, गणेश विसर्जन, दुर्गापूजा, छठ पूजा तथा ईद जैसे बड़े त्योहार भी शामिल हैं। इन त्योहारों से केवल जल ही नहीं वरन मिट्टी प्रदूषण भी बहुत अधिक मात्रा में होता है, क्योंकि होली पर विभिन्न प्रकार के केमिकल्स, मूर्ति विसर्जन में प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियाँ, छठ पूजा के दौरान विभिन्न सामग्रियाँ जो नदी के पानी में प्रवाहित कर दी जाती है,खासकर गंगा और यमुना जिनमें कोई भी बाहरी वस्तु डालने पर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण(NGT) द्वारा प्रतिबन्ध लगा है, तथा ईद में जानवरों का खून और उपयोग न किया जाने वाला माँस,यह चारों परम्पराएं के द्वारा मुख्य रूप से जल-मिट्टी प्रदूषण में भागीदारी का कड़वा सच है।
Source-IndiaTv.com

          समाज से मेरा यह सवाल है कि ऐसी पूजा और कुर्बानियों का क्या फायदा जिनमें कई मूक जीवों खासकर ईद( सालाना 10 करोड़ जानवरों की बलि) और मुंडन संस्कार(सालाना 1 करोड़ जानवरों की बलि)  को अपनी जान केवल तथाकथित तार्किक मानव के लालच के लिए देनी पड़ती है और आने वाली पीढ़ी को भी हम एक सुरक्षित स्थान न दे पाने की स्थिति में हैं? खुद सोचिये, इस लेख पर सवाल उठाने से पहले सोचिये कि क्या आप अपने बच्चों को ऐसी नदियों के पास रहने देंगे जिनका पानी, पानी नहीं ज़हर है, ऐसी हवा में साँस लेने देंगे जो रोज़ाना 40 से 50 सिगरेट के धुएँ के बराबर हो, ऐसी मिट्टी में पैदा हुई सब्जियां खाने देंगे जिसमें कुदरती खाद कम, केमिकल्स बहुतेरे हों?
        इस समाज को सारे त्योहारों विशेषरुप से जो प्रदूषण में अपनी भागीदारी निभाते हैं, उनका तरीका साथ मिलकर, साथ बैठकर बदलना होगा ताकि हम आने वाले समय में अपने बच्चों के उलाहने न सुनें बल्कि उन्हें भी सततपोषणीय विकास के इस रास्ते पर चलने के लिए मार्गदर्शित करें। अपील केवल इतनी हैं कि आँख बंद रखकर अपनी परम्पराओं को मानने से पहले वर्तमान की जरूरतों को भी एक बार अपनी सोच की प्रक्रिया में शामिल करें| 
बाकी सभी त्योहारों की शुभकामनाएं...
                                               - कमलेश
नोट : बहस आमंत्रित है लेकिन केवल तर्कसंगत बातों के साथ,अपना आधा-अधूरा ज्ञान प्रदर्शित न करें |