बुधवार, 2 जनवरी 2019

प्रेम मुलाक़ात

"पहली बारिश को भी नहीं नसीब,
कहाँ से लाती हो अपने गेसुओं में वो ख़ुशबू!"
इन पंक्तियों के साथ मैंने तुम्हें अपने भीतर उतारा, जब तुम कई सौ किलोमीटर से मेरे नज़दीक चली आयी। तुम्हें देखना उस रोज़, हल्के कोहरे और मुस्कुराती ठंड में हर बार देखने से कतई अलग नहीं लगा मुझे किन्तु तुम्हारे कंधों के पर्यटक स्थल पर अपनी सारी बातें और दिल को रखकर जाना मैंने कि किस तरह नदी, सारे संताप और पेड़ की छाँव दर्द मिटा देती है। गहराइयों में उतरना जितना आसान होता है उतना ही कठिन होता है वहाँ से वापस लौटना, शायद इसीलिए कि आने में आँखें और लौटने में पीठ होती है। तुम्हें देखना अपने समक्ष इडली के ग्रास खाते हुए, मुझे इतना अचंभित करता रहा कि मैं मेरे द्वारा खाये गए तमाम इडली के ग्रास की याद में खो गया, तुम खाते हुए उतनी ही सहज लगी जितना कि होता है एक पेड़ किसी फल को पोषित करते हुए। एक सीट पर बैठा मैं, तुमसे केवल तीन साँस और एक व्यक्ति की दूरी पर, जब वह फासला पाटकर तुम्हारे नज़दीक पहुँचा तो ख़ुद को तुम्हारे हाथों की छाँव में पाया, तुम्हारे हाथ जब मेरे माथे पर घूमते हैं तब मुझे पता चलता है कि किस तरह चंद्रमा धरती के घेरे में घूमता है, मैं आँखों पर पलकों के पर्दे गिराता हूँ तो जान पाता हूँ कि रात का आसमान से क्या रिश्ता है!
          तुम्हें उस रात अपनी कृतज्ञता को बयान करने के लिए छूना, मुझे दुनिया से इतर प्रेम के आयाम पर पहुँचाता है। जीवन के लम्हें गुज़रने की आवाज़ को सुनने की ताक़त किसी में नहीं होती फिर भी मैं तुम्हें किसी शाम मुस्कुराते हुए सुनना चाहूँगा और जिस राज़ को दफ़नाया गया था कभी, उसे तुम्हारे चश्मे के उतारते ही फिर ज़िंदा करूँगा ताकि तुम जान सको कि हमनफ़स होने और हमसफर होने में कितना अंतर होता है और कितनी समानताएं। तुम्हें रोकना अपने पास कभी भी सुकून नहीं देता मुझे, मेरी चाहत तुम्हें हमेशा रुख़सत करते वक़्त गले लगाकर मेरा प्रेम और तुम्हारे प्रति आभार जताने की इक अधूरी कोशिश की होती है।
                                                           - कमलेश

रविवार, 2 दिसंबर 2018

अनुभव और आवश्यकताएँ

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही,
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही|
                                               - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
Source - Parwarish Cares

हाल ही में मैं 'लैंगिक साक्षरता' पर एक प्रशिक्षण में शामिल होने का अवसर मिला। जिसमें टीम आओ बात करें के लिए जुटे प्रतिभागियों के साथ हम सबने बहुत सी यादों और एक वातावरण को सबके साथ सह-निर्मित किया। उस वातावरण से ऊपजे माहौल में लोगों को 'सेक्स', 'यौन शोषण' और हमारे समाज की निषिद्ध चीजों के समूह पर बहुत ही आराम से बात करते देखना एक सुकून देने वाला अनुभव भी है। आओ बात करें की टीम ने मुझे अपने स्कूल शिक्षा के वर्तमान पाठ्यक्रम में 'सेक्स-एजुकेशन' और 'वैल्यू-बेस्ड-एजुकेशन' को समाहित करने वाले अपने विचार पर दृढ़ रहने का हौसला दिया है। हमारे समाज के कुछ सवेंदनशील लोगों द्वारा समय की आवाज़ को सुना जा रहा है और वे इस पर काम भी कर रहे हैं लेकिन समय की आवाज़ सुनना बाकियों के लिए भी आवश्यक हो गया है। हमें इस समय में खुद से एक प्रश्न पूछने की जरूरत है कि "क्या 'सेक्स' और 'यौन शोषण' जैसी चीजों के बारे में घरों की चार दीवारों में या कानों को मिलाकर खुसुर पुसुर करना भर बदलाव ला सकता है?"           
जिस तरह से हमारे आसपास की चीज़ों और माहौल में पिछले 15 वर्षों में चीजें बदली हैं, उससे निपटने के लिए वास्तव में इन सब मुद्दों पर बातचीत बहुत ज्यादा जरूरी हो गई है। और यह उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना अपने बच्चों से बाकी सब चीजों के बारे में बात करना। हम एक समाज के रूप में हमारे साथी और बच्चों के साथ 'सेक्स' और 'यौन दुर्व्यवहार' के बारे में बात नहीं करना चाहते, लेकिन उम्मीद करते हैं कि एक दिन बलात्कार, उत्पीड़न और यौन दुर्व्यवहार जैसी गतिविधियां खत्म हो जाएंगी। पर कैसे? क्या हम अब तक ऐसा कुछ सोच पायें हैं जिसके माध्यम से हम खुद को सशक्त बना सकते हैं और साथ ही आगामी पीढ़ी को भी, जिसके माध्यम से वे खुद को बचा सकने में सक्षम हो सकें।     

Source - Parwarish Cares

जमीनी तौर पर सक्रिय रूप से लगभग हर प्रकार की गतिविधियों में शामिल होते रहने के तौर पर और आओ-बात करें अभियान का हिस्सा बनकर, मुझे कई चीजों के बारे में पता चला है जिसके माध्यम से हम खुद को और दूसरों को बदल सकते हैं। तो आइये हम हमारे तथाकथित सुसंस्कृत समाज के निषिद्ध मुद्दों के बारे में बात करते हैं और इससे जुड़े मिथकों और गलत धारणाओं को हटाने की प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं।
शुक्रिया शब्द कभी भी परवरिश (www.parwarish.co.in) के द्वारा मेरे और कई युवाओं तथा बच्चों के जीवन में किये गए बदलाव के समक्ष न्याय करने में सक्षम नहीं है, यह एक यात्रा है जिसमें हम सभी एक साथ चलते हैं, बढ़ते हैं और सीखते हैं।
प्रेम और शुभकामनाएँ :-)
                                                                    - कमलेश 

बुधवार, 14 नवंबर 2018

खुशियाँ, हम और दुनिया

आकस्मिक चीज़ें जितनी खुशियाँ देती है, वह खुशी निर्धारित चीजों से कभी नहीं मिल पाती। 2 नवंबर को मिले एक व्हाट्सअप मैसेज ने पिछले 5 दिनों में जितनी खुशियाँ, हँसी और यादें दी हैं वह मुझे ढूँढने पर तो कभी भी नहीं मिलती।
             
               मैं पिछले दिनों दीवाली पर घर गया था वहाँ प्रदूषण, न्याय और राजनीति जैसे मुद्दों पर काफी चर्चा का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला, क्योंकि ये चर्चा युवा दोस्तों और गाँव के लोगों के बीच बैठकर हुई। ऐसी घटनाओं से यह विश्वास और भी गहरा जाता है कि बदलाव किया जा सकता है और वह भी लोगों के साथ मिलकर, युवा दोस्तों में बहुत ऊर्जा है जिसका उपयोग वह सही दिशा में करना चाह रहे हैं, मार्गदर्शन जिस तरह अपने सहयोगियों से मुझे मिलता रहा है यह कवायद अब गाँव में भी शुरू हुई है कि जिस किसी को भी कोई सहयोग चाहिए वह सबसे संपर्क स्थापित करे ताकि समय पर काम हो सके। गाँव की बदलती हवा ने मुझे अपने सपनों और ज्यादा दृढ़ता से देखने की हिम्मत दी है।
       
Source - Labhya.org
          गाँव से दिल्ली की वापसी में मैं पिछले 4 दिन मथुरा के पानीगाँव में बिताकर लौटा हूँ, लभ्य फाउंडेशन(www.labhya.org) टीम के 5 सदस्य वेदान्त, अमन, रमा, कोमल और मैं, एक माध्यमिक विद्यालय को अपनी कोशिशों से खूबसूरत बनाने में लगे रहे, जिसमें वहाँ के उपप्राचार्य जितेंद्र जोशी जी का अमूल्य योगदान रहा और हमें इनसे जोड़ने वाली विद्यालय विस्तार टीम का भी, जोकि भारत विकास न्यास के साथ वर्तमान में कार्यरत है। 4 दिनों में वहाँ के बच्चों और रहवासियों के साथ ढेर सारी बातें भी हुई और स्कूल की पेंटिंग भी। मुझे कुछ गाँव वालों से निजी तौर पर भी बातें करने का अवसर मिला, जिसमें उन्होंने गाँव के हालात और अपनी मुश्किलों का ज़िक्र भी किया कि किस तरह सरकारी या आसपास के गाँव से मदद न मिलने के कारण वहाँ के अधिकांश लोग एक ही फ़सल बोते हैं बावजूद इसके कि उनके पास विकल्प उपलब्ध हैं। गाँव की ओर से मुँह मोड़ती सरकारी नीतियाँ और आधुनिक विकास की राह, इस बात का संकेत है कि हम स्वार्थीपन को बढ़ावा देने के सिवाय कुछ नहीं कर रहे, विकास की पगडण्डी जब तक गाँव से होकर नहीं गुज़रेगी हम नए शिखर तो पाएँगे लेकिन उतनी ही गहरी ख़ुद की कब्र खोदने के बाद। जब तक समग्र सततपोषणीय विकास(sustainable development) की नीतियाँ नहीं बनेगी तब तक प्रदूषण, बाढ़, तूफान और तो और दंगे-फसाद जैसी मुश्किलें ख़त्म नहीं होंगी।
Source - Labhya.org

                  आईये मिलकर कुछ सोचते हैं, जिससे हमारी मुश्किलों को सुलझाया जा सके और गाँव के साथ साथ इस दुनिया तथा समस्त प्राणी जीवन को एक नया जीवन जीने की राह की ओर बढ़ सकें।
प्रेम और शुभकामनाएं 
                                                   - कमलेश

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

तेरा होना

जितनी बार में चला तन्हा
उन रास्तों पर जो तेरा पता बताते हैं,
तेरी खुशबुओं को वहाँ महकते पाया है;
ठहर के जहाँ
तूने कभी खनकाई थी अपनी हँसी
जम जाते हैं मेरे पाँव वहीं
जैसे तूने ठहरने के लिए कहा हो।

तेरे बिन सुना सा लगता है आँगन
मेरे आशियाने का,
जो तेरे होने से चहकता रहा है;
बिन किसी वादे के चल देना बनकर हमसफ़र
इतना आसान तो नहीं ही होता,
जितनी आसानी से तुझे पा गया था मैं।

हर वो चीज़ जो हमारे साथ रही
मुझे कारगर लगती है अब,
ख़ुद को समेटने के लिए;
इस दिवाली मैं
उन सब को कुमकुम लगाऊँगा।
                                        - कमलेश