मंगलवार, 12 मार्च 2019

आईना देखो – ख़ुद से एक मुलाक़ात


इन्कलाब आएगा रफ़्तार से मायूस न हो,
बहुत आहिस्ता नहीं है जो बहुत तेज़ नहीं..
                                        -अली सरदार जाफ़री  
                                


कितनी खूबसूरती से जाफ़री साहब ने बदलाव की गति को भी परिभाषित कर दिया अपने इस शेर में, जब सफर शुरु होता है किसी बदलाव का तो आरम्भ बड़ा ही पेचीदा और अनसुलझा हुआ दिखाई पड़ता है लेकिन जरुरत होती है उसके साथ ज्यादा से ज्यादा वक़्त गुजारने की. यह वक़्त मेरी ज़िन्दगी में आया आईना देखो के रूप में, मेरा गाँव मेरी दुनिया के साथ जब इस यात्रा का हिस्सा बना था तब केवल यही मन में था कि सीखने की यह यात्रा ऐसे ही अनवरत चलती रहे और बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा बनकर में कितना कुछ दोहरा सकता हूँ उन सारे कर्मों को जिन्होंने मेरी ज़िन्दगी को सँवारा है. बहुत कठिन होता है कि अनिश्चितताओं से भरे माहौल में आप काम कर पाओ लेकिन मैंने आईना देखो के माध्यम से सीखा कि अनिश्चितताएं हमारी कितनी अच्छी दोस्त हो सकती हैं! जब हम अपनी ख्वाहिशों को दरकिनार करना शुरु करते हैं वे सारी ख्वाहिशें जो केवल साधन हैं, तब हमें वह प्राप्त होना प्रारम्भ होता है जिसकी हम अपने संकुचित दायरे में सिमट कर कभी भी कल्पना नहीं कर सकते.
                                
                २५ लोगों के द्वारा तैयार किया गया एक वातावरण जो समानुभूति, करुणा और अन्य मूल्यों से पनपा हो, वह ख़ुद में हो रहे बदलाव को इतने क़रीब से देखने में सहायक हो सकता है यह मेरे लिए शब्दों में बयां कर देना बहुत कठिन है. छोटे छोटे काम और उनसे जुड़े भावों को नज़दीकी से देख पाना और उनके चलन को पहचान पाना, अपने मुश्किल भरे समय में भी ख़ुद की तथा सामने खड़े किसी भी शख्स की भावनाओं और ज़रूरतों को प्राथमिकता दे पाना बजाय किसी प्रतिक्रिया के, यह दो पहलू मेरी ज़िन्दगी की किताब के कभी न मिटने वाले पन्ने बन चुके हैं जिन्हें मैं हमेशा अपने साथ रखना चाहूँगा.
                       
                         आईना देखो के विचार से उसके हकीक़त होने की प्रक्रिया में कई सारे ऐसे अनुभव हैं जिनमें मैंने ख़ुद की क्षमताओं और कमजोरियों को बहुत अच्छे से जाँचा और परखा है ताकि मैं ख़ुद को बेहतर बनाने वाली ज़रूरतों और मूल्यों पर ख़ुद को कायम रख सकूँ. इस यात्रा के लिए गाँवों में घूमना और लोगों से उनके और उनके जीवन से जुड़ी बहुत सी बातें करना जो कई बार बहुत अतरंग भी हुई, इन सारे अनुभवों ने बहुत कुछ सीखाया और साथ ही गाँव को लेकर दिमाग में पल रही कुछ भ्रांतियों को भी दूर किया. ६ दिनों की यात्रा के लिए सारे साथियों को अपनी समूची उर्जा के साथ काम करते हुए देखना अपनी सारी मुश्किलों को किनारे रखकर, सब को देखना एक साथ संघ के भाव के साथ मुझमें काफी ज्यादा संभावनाओं और उम्मीदों को जन्म देता है. बातचीत और साथ रहने भर से कितना कुछ सीखा जा सकता है! मेरे लिए आईना देखो से बेहतर उदाहरण इस वाक्य के लिए नहीं हो सकता, टीम और प्रतिभागी जैसा कुछ भी रेखांकन पूरी यात्रा में न महसूस करना, यह एहसास जितना सुकून मुझे पहुँचाता है उतना ही सारे लोगों को मिला होगा ऐसा मेरा मत है. एक समता भरे माहौल में ख़ुद को खोलकर देखना और अपने बारे में अपने साथियों के साथ रहकर जानना, यह मंथन की सबसे असरदार प्रक्रिया रही है मेरे लिए. काम और अनिश्चितताओं के रहते भी आज़ाद, शांत और ख़ुद के प्रति दयावान होकर जी पाना मेरे लिए बहुत कीमती पाठ रहा है और इसके लिए मैं हर एक साथी की उपस्थिति के लिए शुक्रगुज़ार हूँ. ऐसे दोस्त और साथी जिन्होंने कुछ देर की बातचीत में ख़ुद को अपनी मर्यादाओं से बाहर लाकर अपने असीम की ओर कदम रखे और पुरे सहयोग के साथ इस यात्रा को मुकम्मल होने में अपना योगदान दिया, उनका साथ होना ही मेरे कदमों के निशां को मजबूती प्रदान करता है. मैं आभारी हूँ सबके प्रति जिन्होंने मुझे स्वीकार करना सिखाया है शत प्रतिशत विश्वास के साथ, कि जो आया है तुम तक वह स्वीकारने के लिए ही है, यह अनमोल है.
                               

इस वक़्त काफी सारे सवाल और विचार दिलो’दिमाग में घूम रहे हैं, जिनके साथ मैं कुछ वक़्त गुजारना पसंद करूँगा ताकि अपने ‘आप’ को मंथन और बदलाव की प्रक्रिया से बेहतर तरीके से जान सकूँ.
फिलहाल दिल के किसी कोने से एक आवाज़ सी उठ रही है जिसे एजाज़ रहमानी साहब के शेर ने उसका स्वरुप दे दिया है, आप भी पढ़िए..
अभी से पाँव के छाले न देखो,
अभी यारो सफ़र की इब्तिदा है.....

प्रेम, आभार और शुभकामनाएँ  💖💗💓

रविवार, 10 मार्च 2019

२१ साल और बातें


                                     कई दफ़ा हम नहीं जान पाते कि हम कैसे जी रहे हैं लेकिन जब हमें बिन ढूँढे इस सवाल का जवाब मिल जाता है तो ऐसा लगता है कि हमसे ख़ुशकिस्मत इंसान इस दुनिया में नहीं है. आप कहीं भी रहो, आप कभी भी अकेले नहीं रहते आपके साथ आपका अनुभव, आपकी रिवायतें, आपके रिश्ते, आपका परिवार और आपका प्रेम जैसी कई चीजें आपके साथ रहती हैं. मैं पिछले कुछ दिनों में इन बातों को और बेहतर तरीके से जानकर आत्मसात कर पाया हूँ क्योंकि मैं एक ऐसे वातावरण का हिस्सा रहा हूँ जिसने मुझे ख़ुद के प्रति थोड़ा और दयावान होने की प्रेरणा दी है. मेरे जीवन के २१ सालों में मैंने अपने वातावरण और इस जीवन से कितना प्रेम किया है यह तो मैं नहीं जानता लेकिन मैं क्या सीख सकता हूँ इस प्रेम, विश्वास और समर्पण से उपजे मेरे जीवन से, यह ज्यादा स्पष्ट दीखता है मुझे. जब मैं अपने प्रियजनों से कई मील दूर अपने आपको टटोलने में वयस्त था तब यही प्रियजन मुझे मेरे जीवन के अनमोल क्षण का अनुभव देने की कोशिश में लगे हुए थे, जब आप ख़ुद को भूलकर कुछ करने की कोशिश करते हो तो आपके कई सारे काम या ज़रूरतें आपकी मोहताज नहीं रह जाती, उन्हें यह प्रकृति पूरा करती है.
                    
                                गुजिस्ता दिनों में, मैं जब लोगों से बातचीत करते हुए उन्हें समझने की सीढ़ी पर अपने पैर जमाये खड़ा हुआ था, तब मुझे भान हुआ कि मैं केवल बातचीत के माध्यम से कितना कुछ सीख सकता हूँ, कितना अधिक मंथन की प्रक्रिया में जा सकता हूँ. जब आप विश्वास को प्राथमिकता देते हो तब आपको ज्यादा मजबूत जुड़ाव महसूस होता है क्योंकि विश्वास वह बीज है जहाँ से सारे रिश्ते जन्मते हैं, मैंने अपने जीवन के इतने अरसे में केवल तीन शब्दों से मुलाक़ात की है और वह हैं विश्वास, प्रेम और समर्पण. और कितना खुबसूरत होता है वह पल जब मैं इनसे मिलकर इन्हें जान पाता हूँ, इनसे बातें कर पाता हूँ, इसके अनुभव को बयां करने के लिए कोई शब्द नहीं. अपने जन्मदिन पर एक ऐसी जगह होना जहाँ मैं पहले कभी नहीं रहा और उन दिनों में पूरी तरह से चुनौतीपूर्ण माहौल का हिस्सा बनते हुए ख़ुद से बातचीत करना और बातचीत से सीखना, यह प्रक्रिया जिससे मैं पिछले दिनों गुज़रा हूँ मुझे सशक्त ही बनाती है. एक परिवार जो आपको सुनना चाहता है आपसे अपनी ज़िन्दगी के पलों को बाँटना चाहता है, ऐसे परिवार के साथ अपना जन्मदिन मनाना, इससे बेहतर तोहफा मेरे लिए नहीं हो सकता था. और उस पर भी जब आपके प्रियजन आप तक अपनी शुभकामनाएँ पहुँचाये, जो आप तक किसी व्हाट्सएप चैट से शुरु होकर, किसी मेल या किसी फ़ोन कॉल के रास्ते, कई सौ किलोमीटर का रास्ता तय करते हुए, रेगिस्तान के तपते माहौल में आप तक पहुँचकर आपके दिल को सुकून दे. यह प्रेम है सारे व्यक्तियों का जिन्होंने शुभकामनाओं की यात्रा को मुकम्मल किया है और उन सारे हाथों के प्रति भी कृतज्ञ हूँ मैं, जिन्होंने मेरे जन्मदिन को मेरी उम्मीदों से कहीं ज्यादा खुबसूरत और अनोखा बनाया.
                               

प्रेम, आभार और शुभकामनाएँ  💓💗

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

तुम्हारी आँखें

तेरे दीदार से उपजी बेफ़िक्री के बाद,
हम नहीं देखते कि लोग क्या देखते हैं।
                                                 - नागेश
ये पंक्तियाँ उतनी ही सार्थक होती हैं जब तुम्हें अपने नज़दीक पाता हूँ मैं, जितनी कि इस दुनिया में जीवन की हकीक़त। मुसलसल चल रहे कितने ही ख़यालों और चिंताओं का सफ़र एक पल में ख़त्म हो जाता है, जब तुम्हें अपनी ओर आते हुए देखता हूँ मैं। जितना कुछ भी लिखा या पढ़ा गया है इश्क़ की इबादत में, या तुम्हारी तारीफ़ों में उसे एक दिन उन्हीं कागज़ों में चूर होकर मिट जाना है। जो कसीदे पढ़े या गढ़े गए दिलों की ख़्वाहिशों पर वे भी एक दिन बूढ़ाकर शमशान का रूख़ करना चाहेंगे। जब तुम पास होती हो तो मेरी बातें तुमसे नहीं होती, तुम्हारे जिस्म का हर क़तरा बतियाने पर उतारू हो जाता है। इश्क़ एक किताब है जिसे मैं अपने सवालों के जवाब न मिलने की चाहत लिए पढ़ता हूँ। तुम्हारे काँपते हाथों से तुम्हारे लिखे को पढ़ना तुमने मुझे छू कर उतना ही सरल और सहज कर दिया जितना कि एक दो साल के बच्चे के लिए 'माँ' शब्द को कहना हो जाता है।
         ख़ामोशी की उम्र कितनी है यह आज तक कोई जान नहीं पाया, शायद ये ब्रम्हांड बनने के पूर्व से ही अस्तित्व में है। चाँद की काली रातें खामोशी को परिभाषित करती सी प्रतीत होती है। मैं किसी चाँदनी रात से पनपते अँधेरे में तुम्हारे साथ बैठकर अपनी हर बात को अधूरा छोड़ना चाहता हूँ ताकि तुम्हारी ख़ामोशी उन्हें पूर्णता दे सके। तुमसे दूर चले आना, किसी छोटी मुलाक़ात के बाद मुझे फिर मिलने की उम्मीद का बीज बोने जैसा लगता है। मैं चाहूँगा किसी दिन कि तुम पर लिखा गया सब कुछ मिट जाए और तुम सुनो उन ख़ामोशियों को जो मेरी सारी बातें तुम तक पहुँचाएगी और मैं देखता रहूँगा तुम्हारी मासूमियत से लबरेज़ आँखों को, जिन्हें तुमने उस तरह से नहीं देखा होगा कभी, जिस नज़र को मैंने पहुंचते देखा है तुम तक हमारी हर मुलाक़ात में। तुम सुनना खामोशियाँ, मैं देखूँगा तुम्हारी आँखें; तुम जानती नहीं, आँखें बहुत शोर करती है तुम्हारी।
                                                            - कमलेश

रविवार, 6 जनवरी 2019

खोज

कोई नहीं देख पाता सालों तक कि वह क्या ढूंढ रहा है, मैंने पाया तुम्हें तो जान पाया कि मैं तुम्हारी हकीक़त का पीछा कर रहा था। तुम दिखती हो बोधिवृक्ष सी जिसके तले पहुँचकर मैं बुद्घ सा वैराग नहीं, कृष्ण सी मुहब्बत चाहता हूँ। दुनिया ढूँढ रही है समस्याओं का हल क्रांतियों और आंदोलनों में, मुझे लेकिन तुम्हारे बगल में बैठकर सोचना कि प्रेम ही सारी बातों का समाधान है, अत्यधिक सुकूनदायक लगता है। मैं नहीं कहूँगा कि तुम प्रतीत होती हो किसी रिश्ते सी जो ज़िन्दगी को ख़ुशियों से भर दे, मैं नहीं बताउंगा किसी को भी तुम्हारा पता, क्योंकि मैंने उसे जानने की कोशिश नहीं की अब तक। मैं केवल तुम्हें पूरे रास्ते मेरे दाईं ओर चलते देखना चाहता हूँ, ताकि बिस्तर के कोने से खींचकर तुम्हें वर्तमान की क्रिया बनाकर रख सकूँ।
                      तुमने मुझे दिया अपना वक़्त तो मैं जान सका कि मैं कई बार कितने ही रिश्तों को वक़्त नहीं दे पाया। मैंने रखा अपना सिर तुम्हारी गोद में तो मुझे पता चला कि क्यूँ एक प्रेमी अपनी प्रेमिका में माँ तलाशने की गलती करता है। तुमने मेरे माथे को अपने हाथों में लेकर मुझसे जताया कि मैं पिछले 11 सालों से माँ को नहीं उसके मातृत्व को तलाश रहा था। तुमने बंद नहीं की कोई भी खिड़की जो हवा को अंदर आने से रोके और पकड़ ले मुझे बाहर जाने से पहले, मैं जितना चल पाया हूँ रिश्तों की सड़कों पर, तुम्हारे होने ने इस वाक्य को प्रमाणित किया है कि साधन नहीं साध्य ज्यादा बड़ी चीज़ है। मैं रुकूँगा वहीं, उस वक़्त की बालकनी में, जहाँ से मैं तुम्हें मुस्कुराता हुआ देख सकूँ, केवल वही रास्ता नहीं चुनूँगा जिसमें तुम मुझे अपनी माँ सी प्रतीत होती हो, किन्तु तुम्हारे वो सारे रास्ते खुले हैं जिनमें तुम अपनी आज़ादी देखती हो।
                                                      - कमलेश