शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

तुम्हारी आँखें

तेरे दीदार से उपजी बेफ़िक्री के बाद,
हम नहीं देखते कि लोग क्या देखते हैं।
                                                 - नागेश
ये पंक्तियाँ उतनी ही सार्थक होती हैं जब तुम्हें अपने नज़दीक पाता हूँ मैं, जितनी कि इस दुनिया में जीवन की हकीक़त। मुसलसल चल रहे कितने ही ख़यालों और चिंताओं का सफ़र एक पल में ख़त्म हो जाता है, जब तुम्हें अपनी ओर आते हुए देखता हूँ मैं। जितना कुछ भी लिखा या पढ़ा गया है इश्क़ की इबादत में, या तुम्हारी तारीफ़ों में उसे एक दिन उन्हीं कागज़ों में चूर होकर मिट जाना है। जो कसीदे पढ़े या गढ़े गए दिलों की ख़्वाहिशों पर वे भी एक दिन बूढ़ाकर शमशान का रूख़ करना चाहेंगे। जब तुम पास होती हो तो मेरी बातें तुमसे नहीं होती, तुम्हारे जिस्म का हर क़तरा बतियाने पर उतारू हो जाता है। इश्क़ एक किताब है जिसे मैं अपने सवालों के जवाब न मिलने की चाहत लिए पढ़ता हूँ। तुम्हारे काँपते हाथों से तुम्हारे लिखे को पढ़ना तुमने मुझे छू कर उतना ही सरल और सहज कर दिया जितना कि एक दो साल के बच्चे के लिए 'माँ' शब्द को कहना हो जाता है।
         ख़ामोशी की उम्र कितनी है यह आज तक कोई जान नहीं पाया, शायद ये ब्रम्हांड बनने के पूर्व से ही अस्तित्व में है। चाँद की काली रातें खामोशी को परिभाषित करती सी प्रतीत होती है। मैं किसी चाँदनी रात से पनपते अँधेरे में तुम्हारे साथ बैठकर अपनी हर बात को अधूरा छोड़ना चाहता हूँ ताकि तुम्हारी ख़ामोशी उन्हें पूर्णता दे सके। तुमसे दूर चले आना, किसी छोटी मुलाक़ात के बाद मुझे फिर मिलने की उम्मीद का बीज बोने जैसा लगता है। मैं चाहूँगा किसी दिन कि तुम पर लिखा गया सब कुछ मिट जाए और तुम सुनो उन ख़ामोशियों को जो मेरी सारी बातें तुम तक पहुँचाएगी और मैं देखता रहूँगा तुम्हारी मासूमियत से लबरेज़ आँखों को, जिन्हें तुमने उस तरह से नहीं देखा होगा कभी, जिस नज़र को मैंने पहुंचते देखा है तुम तक हमारी हर मुलाक़ात में। तुम सुनना खामोशियाँ, मैं देखूँगा तुम्हारी आँखें; तुम जानती नहीं, आँखें बहुत शोर करती है तुम्हारी।
                                                            - कमलेश

रविवार, 6 जनवरी 2019

खोज

कोई नहीं देख पाता सालों तक कि वह क्या ढूंढ रहा है, मैंने पाया तुम्हें तो जान पाया कि मैं तुम्हारी हकीक़त का पीछा कर रहा था। तुम दिखती हो बोधिवृक्ष सी जिसके तले पहुँचकर मैं बुद्घ सा वैराग नहीं, कृष्ण सी मुहब्बत चाहता हूँ। दुनिया ढूँढ रही है समस्याओं का हल क्रांतियों और आंदोलनों में, मुझे लेकिन तुम्हारे बगल में बैठकर सोचना कि प्रेम ही सारी बातों का समाधान है, अत्यधिक सुकूनदायक लगता है। मैं नहीं कहूँगा कि तुम प्रतीत होती हो किसी रिश्ते सी जो ज़िन्दगी को ख़ुशियों से भर दे, मैं नहीं बताउंगा किसी को भी तुम्हारा पता, क्योंकि मैंने उसे जानने की कोशिश नहीं की अब तक। मैं केवल तुम्हें पूरे रास्ते मेरे दाईं ओर चलते देखना चाहता हूँ, ताकि बिस्तर के कोने से खींचकर तुम्हें वर्तमान की क्रिया बनाकर रख सकूँ।
                      तुमने मुझे दिया अपना वक़्त तो मैं जान सका कि मैं कई बार कितने ही रिश्तों को वक़्त नहीं दे पाया। मैंने रखा अपना सिर तुम्हारी गोद में तो मुझे पता चला कि क्यूँ एक प्रेमी अपनी प्रेमिका में माँ तलाशने की गलती करता है। तुमने मेरे माथे को अपने हाथों में लेकर मुझसे जताया कि मैं पिछले 11 सालों से माँ को नहीं उसके मातृत्व को तलाश रहा था। तुमने बंद नहीं की कोई भी खिड़की जो हवा को अंदर आने से रोके और पकड़ ले मुझे बाहर जाने से पहले, मैं जितना चल पाया हूँ रिश्तों की सड़कों पर, तुम्हारे होने ने इस वाक्य को प्रमाणित किया है कि साधन नहीं साध्य ज्यादा बड़ी चीज़ है। मैं रुकूँगा वहीं, उस वक़्त की बालकनी में, जहाँ से मैं तुम्हें मुस्कुराता हुआ देख सकूँ, केवल वही रास्ता नहीं चुनूँगा जिसमें तुम मुझे अपनी माँ सी प्रतीत होती हो, किन्तु तुम्हारे वो सारे रास्ते खुले हैं जिनमें तुम अपनी आज़ादी देखती हो।
                                                      - कमलेश

बुधवार, 2 जनवरी 2019

प्रेम मुलाक़ात

"पहली बारिश को भी नहीं नसीब,
कहाँ से लाती हो अपने गेसुओं में वो ख़ुशबू!"
इन पंक्तियों के साथ मैंने तुम्हें अपने भीतर उतारा, जब तुम कई सौ किलोमीटर से मेरे नज़दीक चली आयी। तुम्हें देखना उस रोज़, हल्के कोहरे और मुस्कुराती ठंड में हर बार देखने से कतई अलग नहीं लगा मुझे किन्तु तुम्हारे कंधों के पर्यटक स्थल पर अपनी सारी बातें और दिल को रखकर जाना मैंने कि किस तरह नदी, सारे संताप और पेड़ की छाँव दर्द मिटा देती है। गहराइयों में उतरना जितना आसान होता है उतना ही कठिन होता है वहाँ से वापस लौटना, शायद इसीलिए कि आने में आँखें और लौटने में पीठ होती है। तुम्हें देखना अपने समक्ष इडली के ग्रास खाते हुए, मुझे इतना अचंभित करता रहा कि मैं मेरे द्वारा खाये गए तमाम इडली के ग्रास की याद में खो गया, तुम खाते हुए उतनी ही सहज लगी जितना कि होता है एक पेड़ किसी फल को पोषित करते हुए। एक सीट पर बैठा मैं, तुमसे केवल तीन साँस और एक व्यक्ति की दूरी पर, जब वह फासला पाटकर तुम्हारे नज़दीक पहुँचा तो ख़ुद को तुम्हारे हाथों की छाँव में पाया, तुम्हारे हाथ जब मेरे माथे पर घूमते हैं तब मुझे पता चलता है कि किस तरह चंद्रमा धरती के घेरे में घूमता है, मैं आँखों पर पलकों के पर्दे गिराता हूँ तो जान पाता हूँ कि रात का आसमान से क्या रिश्ता है!
          तुम्हें उस रात अपनी कृतज्ञता को बयान करने के लिए छूना, मुझे दुनिया से इतर प्रेम के आयाम पर पहुँचाता है। जीवन के लम्हें गुज़रने की आवाज़ को सुनने की ताक़त किसी में नहीं होती फिर भी मैं तुम्हें किसी शाम मुस्कुराते हुए सुनना चाहूँगा और जिस राज़ को दफ़नाया गया था कभी, उसे तुम्हारे चश्मे के उतारते ही फिर ज़िंदा करूँगा ताकि तुम जान सको कि हमनफ़स होने और हमसफर होने में कितना अंतर होता है और कितनी समानताएं। तुम्हें रोकना अपने पास कभी भी सुकून नहीं देता मुझे, मेरी चाहत तुम्हें हमेशा रुख़सत करते वक़्त गले लगाकर मेरा प्रेम और तुम्हारे प्रति आभार जताने की इक अधूरी कोशिश की होती है।
                                                           - कमलेश

ख़्वाहिश

कॉलेज के गेट से
स्कार्फ बांधे निकली लड़की,
और
स्टेशन के ओवरब्रिज की सीढ़ियाँ
अनमनेपन से चढ़ रहा लड़का,
ज्यादा कुछ नहीं
केवल
किसी बिंदू पर पहुँचकर,
फिर मिल जायेंगे ऐसा चाहते हैं।
                                         - कमलेश