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आईना देखो – ख़ुद से एक मुलाक़ात

इन्कलाब आएगा रफ़्तार से मायूस न हो, बहुत आहिस्ता नहीं है जो बहुत तेज़ नहीं..                                         -अली सरदार जाफ़री  

कितनी खूबसूरती से जाफ़री साहब ने बदलाव की गति को भी परिभाषित कर दिया अपने इस शेर में, जब सफर शुरु होता है किसी बदलाव का तो आरम्भ बड़ा ही पेचीदा और अनसुलझा हुआ दिखाई पड़ता है लेकिन जरुरत होती है उसके साथ ज्यादा से ज्यादा वक़्त गुजारने की. यह वक़्त मेरी ज़िन्दगी में आया आईना देखो के रूप में, मेरा गाँव मेरी दुनिया के साथ जब इस यात्रा का हिस्सा बना था तब केवल यही मन में था कि सीखने की यह यात्रा ऐसे ही अनवरत चलती रहे और बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा बनकर में कितना कुछ दोहरा सकता हूँ उन सारे कर्मों को जिन्होंने मेरी ज़िन्दगी को सँवारा है. बहुत कठिन होता है कि अनिश्चितताओं से भरे माहौल में आप काम कर पाओ लेकिन मैंने आईना देखो के माध्यम से सीखा कि अनिश्चितताएं हमारी कितनी अच्छी दोस्त हो सकती हैं! जब हम अपनी ख्वाहिशों को दरकिनार करना शुरु करते हैं वे सारी ख्वाहिशें जो केवल साधन हैं, तब हमें वह प्राप्त होना प्रारम्भ होता है जिसकी हम अपने संकुचित दायरे में सिमट कर कभी भी कल्प…

ज़िन्दगी और प्रेम की जोड़ी

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जब ज़िन्दगी की शुरुआत होती है, तब हमारे पास अपने रिश्ते चुनने का कोई विकल्प नहीं होता, लेकिन ज़िन्दगी के रफ़्तार पकड़ने के बाद भी शायद हमारे पास वह विकल्प नहीं होता. अटपटा लग सकता है सुनने में लेकिन हकीक़त यही है कि हम कोई भी रिश्ता नहीं चुनते अपनी ज़िन्दगी में, रिश्ते हमको चुनते हैं उनको जीने के लिए.
भावनाओं का समंदर कितना गहरा है कोई नहीं जानता फिर भी सब डुबकियाँ लगाते हैं, हम नहीं जानते कि हमारी एक मुस्कान या एक शब्द किसी के जीवन में क्या बदलाव ला सकता है. ज़िन्दगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन जितना कुछ इसके साथ रहकर सीखा है वह बहुत कमाल का है. रास्ते अपनी पहचान हमसे तब तक छुपाते हैं जब तक हम समर्पण न कर दें और समर्पण का पौधा विश्वास के बीज के बिना कभी भी नहीं उग सकता. विश्वास और समर्पण जब एक-दूजे में समाते हैं तब प्रेम पैदा होता है और प्रेम अपने कई स्वरुप में हमसे हर रोज़ बहता है.
प्रेम का बहाव हमारी बातों से शुरु होकर हमारे मौन पर रुकता है या शायद वहाँ भी न रुकता हो: कौन जानता है कि सच्चाई क्या है! जब रिश्तों के धागे अपने सही रास्ते पर होते हैं तब ज़िन्दगी में खू…

प्रेम और हम

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वो मिली थी मुझसे जब पहली दफा तो कभी सोचा नहीं था उसने कि यहाँ तक पहुंच जाएगी ज़िन्दगी ख़्वाबों के पहियों पर दौड़ते हुए, और न ही मैंने कभी ऐसा पुलाव पकाया था अपने दिल में। वो खिलखिलाती है तो सोचता हूँ कि सारी दुनिया को म्यूट पर डाल दूँ। ऐसी ही एक हँसी ने खींच लिया मुझको उस तक, और तब से मैं बस खिंचता चला जा रहा हूँ, कहाँ! यह अब तक रहस्य है। मैंने कहा था उससे कि मेरा इंतज़ार करते हुए पीपल के नीचे न खड़ी रहे, लेकिन उसने मेरी एक न सुनी, उसके न सुनने को प्रकृति ने इतनी गंभीरता से लिया कि जब भी मिलता हूँ उससे वो पीपल के पेड़ के पास ही मिलती है। पहाड़ों ने मुझे इतने ख़त लिखे लेकिन मैं उनके जवाब देने में आलस ही करता रहा ताउम्र, पिछले दिनों उसने ख़त लिखा मुझे और भेजा पहाड़ों के ज़रिए। पहाड़ इस बार मुझे उठा ही ले गया अपने जवाबों की ख़्वाहिश में, ज़िन्दगी ने भी समर्पण करते हुए समूचा दायित्व खुला छोड़ दिया प्रकृति के जिम्मे। 

        एक रात सड़क पर चलते हुए जब मैं किसी आवाज़ को सुनकर रुक गया तो उसने हाथ थाम लिया मेरा हौले से आकर, मैंने नज़रें उठाई ऊपर और मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया: हम पीपल के नीचे पहुँच गए थे। कु…

इंतज़ार और तुम

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तुम देखती हो थोड़ी सी गर्दन झुकाकर मेरी ओर तो ऐसा लगता है कि सूरजमुखी देख रहा है सूरज को। सातों आसमान के पार से जब गूँजता है तुम्हारा स्वर तो इतनी ज्यादा ख़ुशी होती है कि मैं जून में भी नंगे पैर चल लेता हूँ। तुम मिली इस दफा मुझे पहाड़ों की गोद में, जहाँ मुझे कई जन्मों से आना था शायद: वहाँ आकर तो यही लगा था मुझे, तो घर वापसी जैसा भाव पैदा हो गया। तुम्हारे साथ प्रकृति को इतना सहज पाता हूँ जैसे कि किसी ने इसकी जंज़ीरें खोल दी हों, तुम खिल उठती हो जब पानी की चंद बूँदों से तो मेरा मन करता है कि उतार दूँ बादलों का तमाम पानी जो तुम तक पहुँच कर अपना जीवन सफल कर ले। जिस तरह दुनिया संजो रही है सारे सूत्र और समीकरण, मुझे ऐसा लगता है उसने तुम्हें पहचाना ही नहीं अब तक, कभी कभी जी करता है कि बिग बैंग थ्योरी वाले वैज्ञानिक को तुमसे मिलाऊँ, ताकि वो अपनी भूल सुधार सके। तुम्हारे साथ रहता हूँ तो अकेलेपन के सारे सिद्धांत मुझे खोखले लगते हैं, तुम जब डर जाती हो किसी जानवर से, उससे अपना प्रेम जाहिर करते हुए तो तुम्हें भँवरा बनकर छेड़ने को जी करता है। 
          उस दिन जितनी सहजता और ध्यान से तुमको स्कूटी चलाते …

ज़िन्दगी का पर्याय - घर

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ज़िन्दगी के रास्तों में
ख्वाबों की खटपट जारी है
पिताजी जब घर से फ़ोन करते हैं,
तो चेहरे पर मुस्कान तारी होती है
और दिल में एक नया ख्याल पनपता है,
बहुत दिन हुए माँ की आवाज़ सुने भी;
सपने तो सारी दुनिया एक जैसे देखती है,
बस चलते हुए घड़ी का वक़्त हाथ में नहीं रहता। मैं खींच रहा हूँ,
पेड़ की जड़ में अटकी रस्सी
घर की ख्वाहिश है कि देखे मेरी सूरत,
मैं लेकिन लिपट कर सोना चाहता हूँ
दादाजी के पुराने कम्बल से; चार नए आम के पेड़
भैया-भाभी ने लगा दिए हैं घर के आगे,
बस पिताजी और माँ के साथ
नीम के नीचे रखे तख़्त पर बैठ चाय पीना बाकी है:
कुछ रातें चूल्हे के सामने बैठकर,
बतियाना चाहता हूँ जी भरकर भैया-भाभी से। बच्चों के साथ मिट्टी में खेलते हुए
खुद को भुला देना चाहता हूँ,
आम तोड़ने हैं कभी उचककर मुझको
जब कोई ज़िद करे कि आम चाहिए उसे।
ज़िन्दगी से चार ख़्वाब
मैं अपने हक़ की तरह ले लूँगा,
आम, नीम, चाय, तख़्त और बातें
मेरे बच्चों से ले लिया है मैंने ये उधार,
प्रेम की परछाईयाँ
जो खनकती है मेरे पहलुओं में,
चाहता हूँ कि मुझे चाँद की तरह देखने वाली
लड़की के हिस्से में भी बराबरी से बिखरे:
घड़ी के रुकने से पहले
सुकून से घर ल…

वसीयतनामा

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किसी भी सफ़र के समय दो भागों में बँट जाती है दुनिया, मैं बन जाता हूँ दर्शक ताकि बचा हिस्सा दर्शन हो जाये, दार्शनिक का कोई अस्तित्व नहीं कहानी में:
सब ढूँढ रहे हैं खुलापन पैरों में जंज़ीरों को ढोते हुए, उजाला दीखता तो है आँखों में पलकों में जमे हुए अँधेरे के पीछे।
मैं चलता हूँ आसमाँ के नीचे जो घूरता है हर कदम मुझे, साथ चल रही लड़की कहती है दूर जाते हो तुम तो आँखों में बादल छा जाते हैं, मैं कहता हूँ  हाँफती धरती और घूरता आसमान, मौन से प्रतिपल होता संवाद और पलकों में लिपटा इंतज़ार प्रेम का दूसरा नाम है।


दो हिस्सों में बँटते से सफ़र में झाँकता हूँ खिड़की से बाहर, तो दुनिया दीखती है नई सी जहाँ इंसान की कमी लगातार बढ़ रही है जहाँ सपनों का अकाल चल रहा है, मेरे हमनफ़स मेरे वसीयतनामे में मिलेंगे दो नाम: पहाड़ की गोद में बसा जंगल और मोर पंख रख पाओ सहेजकर तो रखना।                                           - कमलेश

महा मिलन

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दिवास्वप्न लगती हुई वह
रात जुगनुओं ने पा ली, साँझ के अंतिम क्षणों को बींध कर माला बना ली: उस क्षणिक सी चाँदनी में पाते रहे सब स्वर्ण रत्न अस्तित्व खोते उन अधर का बढ़ता घटता सा जतन।
पूर्णिमा का दूजा चाँद चल दिया पूर्ण से शून्य को बाँधे रहे समूची राह में दो हाथ अपने दो हाथ को: नित् खोते रहे दोनों ही तन  पाते रहे हर क्षण नया जीवन बिसरती रही सारी खुशबुएँ पाने को एक अनवरत लगन;
रह रह कर मूंदते दो नयन और, फिर और की प्यास में, खिल खिल उठा सारा जीवन कुछ गहरेपन की तलाश में: बेकाबू होते रहे मधुकलश जो थे साँझ तक जड़-स्थिर, रीत कर भी भरते रहे सब घूँट डूबती निशा में होकर निखर;



सारे अनजाने बंधनों का कोई भी पट न रहा छूटा, कोई न बचा तार ऐसा जो आवेग के बूते न टूटा: गढ़ता परिभाषा मौन की झंकृत स्वर पायलों का दुलारता तन का हर कोना

संवाद – बात से साथ का सफ़र

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इस दुनिया को कान की ज़रूरत है लेकिन हर कोई बस बोलना चाहता है...
यह कथन दो तरीकों से किस तरह देखा जा सकता है, बस उस देखने के तरीके की प्रक्रिया का नाम संवाद है. हर किसी के पास इतनी कहानियाँ है कि लिखते लिखते सारे पन्ने भरे जा सकते हैं और हर कोई उतना ही उत्सुक और आतुर है कि किसी और की कहानी सुनने के लिए उसके पास धैर्य नहीं है. ज़िन्दगी की राहों से पनपती कहानियाँ और उनसे जन्म लेते हुए हर पल के किस्से और किस्सों से उपजा खालीपन, मानसिक असंतुलन इतना बढ़ जाता है कि इंसान भूल जाता है उसे जीना किस तरह है! संवाद की प्रक्रिया में ठहराव और स्थिरता है ज़िन्दगी की रफ़्तार को समझने के लिए वक़्त प्रदान करती हुई. कानों और दिमाग को कितने आराम की ज़रूरत है इस बात का ख़याल शायद उम्र भर किसी को नहीं आता क्योंकि हर कोई, बस रोज़ भागने वाले हाथ और पैर को आराम देना चाहता है. संवाद की शुरुआत जिस मौन के साथ हुई उसने मुझे इस बात का सन्देश दिया कि अभी मेरे पास काफी वक़्त है जो मैं अपने सवालों के साथ बिता सकता हूँ और उनसे ज्यादा अच्छी तरह से वाकिफ़ हो सकता हूँ. बढ़ते दबाव और तनाव के बीच भी ख़ुद के लिए समय निकालना कितना महत्त्वपू…