रविवार, 4 नवंबर 2018

हमारी जीवनशैली और दुनिया

Source- Khabarindia.com

यह ख़बर लगभग हर उस व्यक्ति को पता होगी जो खबरें पढ़ता है कि दिल्ली में १ से १० नवम्बर तक आपातकाल (प्रदुषण का आपातकाल) घोषित किया गया है क्योंकि वहाँ की हवा दुनिया की सबसे ख़राब हवा है जोकि न तो सुबह की सैर के लायक है और न ही एक गहरी साँस लेने के | इसका मुख्य कारण है आसपास के राज्यों में जलाये गए फसलों के अवशेष और वहाँ के वाहनों का धुआँ, फिर भी लोग केवल एक दूसरे पर आरोप लगाते दिखाई पड़ते हैं | जानकारी के लिए यह बता दूँ कि २ करोड़ की दिल्ली की आबादी के लिए १ करोड़ वाहन हैं, एकमात्र शहर जहाँ लोग स्टेटस के लिए निकल पड़ते हैं सड़कों पर बगैर यह सोचे कि कल क्या होगा!  हवा की खराब हालत को देखते हुए ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में केवल २ घंटे पटाखे जलाने का  आदेश दिया है और बाकि राज्यों से यह अपील की है कि वह कम से कम प्रदुषण की ओर कुछ कदम जरूर बढ़ाएं |
Source-Bharatkhabar.com
                         हर वह शख़्स जो इस अपील या आदेश जिस तरह भी इसे देखते हैं, यह जान लें कि केवल प्रदुषण से ही भारत में हर वर्ष 13.56 लाख लोगों की मौत हो जाती है जबकि 2015 में यह आंकड़ा 25 लाख तक जा पहुंचा था | मतलब हर घंटे 150 लोग प्रदुषण की वजह से अपनी जान खो देते हैं | अब इस आदेश का विरोध करने वाले भी जान लें कि दिवाली के समय जोरशोर से पटाखे जलाने का चलन ज्यादा पुराना नहीं है इसे दो व्यापारियों ने 1940 में कुछ पटाखों की फैक्ट्रियां डाल, अपने फायदे के लिए लोगों को अपना ग्राहक बनाया था, और तब से यह चलन शुरु हुआ | रामायणकाल में तो वैसे भी पटाखों का ज़िक्र नहीं है वहाँ तो केवल मिट्टी के दीयों से दिवाली मनाई जाती थी, और पटाखों की पैरवी करने वाले कम से कम यह तय कर लें कि उन्हें अपने बच्चों को धुएँ और गंध से भरी दुनिया देनी हैं या फिर एक अच्छा भविष्य ! दिवाली अकेला ऐसा त्योहार नहीं है जो प्रदूषण में अपनी भूमिका निभाता है बल्कि क्रिसमस के दौरान भी ऐसे कई सारे तत्वों का उपयोग होता है जो हवा को बहुत ही बुरी तरीके से प्रभावित करते हैं जिनमें पार्टी प्रोपर्स का बहुत बड़ा योगदान है, साथ ही नए साल पर होने वाले जश्न भी वायु और ध्वनि प्रदूषण में अपनी अच्छी खासी भागीदारी रखते हैं।
          इन बातों से अवगत करवाने का मेरा प्रथम तात्पर्य यह है कि आप अपने तौर तरीकों पर सवाल उठाना शुरू कीजिए कि उनका पालन करना कहाँ तक सही है? और वह भी ऐसे युग में जहाँ हम पहले ही कई तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं लेकिन अपने त्योहार मनाने के तरीकों को बदलकर हम समाज को और आने वाली पीढ़ी को एक नया रास्ता तैयार कर के दे सकते हैं।
Source-Jagran.com

              उपरिलिखित आंकड़े प्रदुषण के सामूहिक आंकड़े हैं जिसमें अगर जल प्रदुषण की बात की जाये तो केवल इसकी वजह से 5.68 लाख लोगों की जान जाती है जिनमें अधिकतर गरीब या वंचित तबके के लोग होते हैं जिन्हें बुनियादी सुविधाओं का लाभ अभी तक सरकारें नहीं दे पाई है | हमारी कोशिशें यह होनी चाहिए कि हम हर इंसान को एक सा देख पाएं उसे वही सम्मान दें जो हम खुद के लिए चाहते हैं लेकिन दृश्य बिल्कुल उलट है। हाल ही में महाराष्ट्र राज्य के कुछ जिले सूखाग्रस्त घोषित किए गए हैं और वहाँ यह हालात है कि पानी 10 किलोमीटर तक नसीब नहीं, इसी साल की शुरुआत में केपटाउन शहर में पानी खत्म हो गया था जोकि समय पर बारिश आने की वजह से सुलझ गया लेकिन यह सब प्रकृति की हमारे लिए चेतावनियाँ ही हैं, जिनसे अगर हमने सबक नहीं लिया तो न जाने क्या होगा। समय रहते अपनी जीवन शैली को बदलने की क़वायद हमें करनी होगी, अन्यथा वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी बहुत ही जल्दी सच होना शुरू जाएंगी और तब हमारे पास वक़्त नहीं होगा|
             एक और पहलू की ओर मैं ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा जोकि प्लास्टिक रूपी कचरे का उत्सर्जन है केवल भारत देश 15342 टन कचरे का रोज़ाना उत्पादन करता है, जो विश्व के प्लास्टिक कचरा उत्पादन में खासा योगदान देता है जोकि  8.34 लाख टन रोज़ाना है | हमारे द्वारा किये गए सालाना प्लास्टिक उत्पादन में से 80 लाख टन कचरा समुद्र या अन्य जल स्त्रोतों में मिलता है जिससे 1000 से ज्यादा समुद्री जीवों की प्रजातियाँ प्रभावित हो रही है इसका मतलब यह है कि सीधे सीधे लगभग 2 करोड़ समुद्री जीवों का जीवन खतरे में है। जल में प्लास्टिक के मिलने से प्रदुषण का आलम यह है कि अब तो समुद्री पानी से निकाले किए गए नमक में प्लास्टिक इस कदर घुल चुका है कि उसे अलग करना काफी मुश्किल हो चुका है। हमारे घर में आने वाले नमक का 60 फीसदी हिस्सा प्रदूषित है। चाहे कंपनियां कोई भी दावा करती रहें, हक़ीकत को झुठलाया नहीं जा सकता|
             मेरा निवेदन है उन सभी लोगों की तरफ से जो इस धरती को बचाने में लगे हैं कि प्लास्टिक आपके जीवन में नहीं हो या काफी कम हो इसकी भी कोशिश हम कर सकते हैं केवल सरकारें और प्रशासन के नियम बना देने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला जोकि इस देश की सच्चाई भी है कि बावजूद लगभग सारे राज्यों में प्लास्टिक (पॉलीथीन) प्रतिबंधित होने के, धड़ल्ले से बिक रही है। जल प्रदूषण के अन्य कारणों में कारखानों द्वारा उत्सर्जित कचरे का भी नाम है, जहाँ हम एक तरफ साफ पानी की उपलब्धता की कमी से जूझ रहे हैं वहीं हमारा समाज केवल अपने अपने अहं को संतुष्ट करने के लिए और खुद को ऊंचा दिखाने के लिए विभिन्न त्योहारों पर जल को प्रदूषित करता है जिनमें होली, गणेश विसर्जन, दुर्गापूजा, छठ पूजा तथा ईद जैसे बड़े त्योहार भी शामिल हैं। इन त्योहारों से केवल जल ही नहीं वरन मिट्टी प्रदूषण भी बहुत अधिक मात्रा में होता है, क्योंकि होली पर विभिन्न प्रकार के केमिकल्स, मूर्ति विसर्जन में प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियाँ, छठ पूजा के दौरान विभिन्न सामग्रियाँ जो नदी के पानी में प्रवाहित कर दी जाती है,खासकर गंगा और यमुना जिनमें कोई भी बाहरी वस्तु डालने पर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण(NGT) द्वारा प्रतिबन्ध लगा है, तथा ईद में जानवरों का खून और उपयोग न किया जाने वाला माँस,यह चारों परम्पराएं के द्वारा मुख्य रूप से जल-मिट्टी प्रदूषण में भागीदारी का कड़वा सच है।
Source-IndiaTv.com

          समाज से मेरा यह सवाल है कि ऐसी पूजा और कुर्बानियों का क्या फायदा जिनमें कई मूक जीवों खासकर ईद( सालाना 10 करोड़ जानवरों की बलि) और मुंडन संस्कार(सालाना 1 करोड़ जानवरों की बलि)  को अपनी जान केवल तथाकथित तार्किक मानव के लालच के लिए देनी पड़ती है और आने वाली पीढ़ी को भी हम एक सुरक्षित स्थान न दे पाने की स्थिति में हैं? खुद सोचिये, इस लेख पर सवाल उठाने से पहले सोचिये कि क्या आप अपने बच्चों को ऐसी नदियों के पास रहने देंगे जिनका पानी, पानी नहीं ज़हर है, ऐसी हवा में साँस लेने देंगे जो रोज़ाना 40 से 50 सिगरेट के धुएँ के बराबर हो, ऐसी मिट्टी में पैदा हुई सब्जियां खाने देंगे जिसमें कुदरती खाद कम, केमिकल्स बहुतेरे हों?
        इस समाज को सारे त्योहारों विशेषरुप से जो प्रदूषण में अपनी भागीदारी निभाते हैं, उनका तरीका साथ मिलकर, साथ बैठकर बदलना होगा ताकि हम आने वाले समय में अपने बच्चों के उलाहने न सुनें बल्कि उन्हें भी सततपोषणीय विकास के इस रास्ते पर चलने के लिए मार्गदर्शित करें। अपील केवल इतनी हैं कि आँख बंद रखकर अपनी परम्पराओं को मानने से पहले वर्तमान की जरूरतों को भी एक बार अपनी सोच की प्रक्रिया में शामिल करें| 
बाकी सभी त्योहारों की शुभकामनाएं...
                                               - कमलेश
नोट : बहस आमंत्रित है लेकिन केवल तर्कसंगत बातों के साथ,अपना आधा-अधूरा ज्ञान प्रदर्शित न करें |

बुधवार, 31 अक्तूबर 2018

मैं चाहता हूँ

मुतमइन रहता था एक शख़्स,
जब अपनी आँखों के आगे वह
देखता था घने दरख़्त औ' सब्ज़ ज़मीं,
एक रात थोड़ी ठहर कर गुज़री ऐसे
उसे कोई सपन तक न आ पाया,
सुबह तक दरख़्त औ' ज़मीं
गर्दन तलक पानी में डूब चूके थे।
गुहार लगाता भी तो वह किस से?
जो थे सुनने वाले उन्हीं ने
डैम के दरवाज़े साहब के कहने पर खुलवाये थे।
Source - Imperiya.by

अपने मुस्तक़बिल पर रोती है इक औरत
पुराणों में जिसको वसुधा कहा है हमने,
एक बार भी नहीं सोचते अब हम
कि वासना का हमारी अंजाम
किस दिशा से लौटकर आने वाला है!
दिल थाम कर बैठिये अभी तो दिल्ली धुआँ हुई है,
कल समंदर आपके घर का भी पता पूछने आएगा।
वह रो रहा था कल नदी के किनारे बैठा
कि मंदिर का फैसला जनवरी में आएगा,
उसे तो यह तक याद नहीं कि ख़ुद उसने
अपने पिता से ठीक से बात कब की थी?
नाम बदलता है कोई करोड़ों में मेरे शहर का,
जाकर देखे तो सही कोई रात में
जे.जे. कॉलोनी का मंज़र,
मज़ाल जो अगली सुबह हलक़ से निवाला उतर जाए!
एक बिल्ली को पत्ते खिलाकर पालता है
ख़ुद लोथड़े खाता इक परिवार,
मैं जानता हूँ जिस दिन वह बंदर
बच्चे के हाथ से रोटी छीनकर भागेगा,
तब समझ में आएगा उन्हें
कि कैसे एक कुत्ता बिल्ली
और नेवला साँप को पालता है!
किसी कंपनी को मिलता है ग्रांट
तो नींद अजनबी हो जाती है,
कोई तूफां गुज़रता है जब कहीं
तो हफ़्तों का रतजगा दे जाता है,
Source - India.com

कल हम सबके बच्चे स्कूल बस में बैठेंगे
मैं चाहता हूँ तो केवल इतना कि,
शाम तलक गाड़ी सलामती से बच्चे घर छोड़ जाए।
                                                            - कमलेश

एकता दिवस और हम


Source - Times Now

सरदार वल्लभ भाई पटेल की शख़्सियत पर मुझे कोई शंका नहीं लेकिन उनके नाम के तले जो पाखण्ड हो रहा है उसके बारे में हमें एक दफ़ा तो ज़रूर सोचना चाहिए। एक तरफ जहाँ 24 करोड़ लोग भूख, पानी, स्वास्थ्य की सुविधाओं से वंचित हैं सरकारें अपना अहं संतुष्ट करने के लिए प्रतिमाएं बनवा रही हैं, जी हाँ मैं गुजरात की एकता की प्रतिमा और महाराष्ट्र में कुछ समय में बनाई जाने वाली शिवाजी की प्रतिमा और साथ ही मंदिरों, मस्जिदों और अन्य धर्मस्थलों के बनाये जाने की ख़िलाफ़त करता हूँ। 3000 करोड़ रुपयों की रकम जो लग चुकी है और वह जो आगे खर्च की जाएगी, हर तरह से उन 24 करोड़ लोगों तथा 134 करोड़ देशवासियों के हित में उपयोग की जा सकती थी। प्रतिमा बनाने के निर्णय का समर्थन करने वाले एक दफ़ा वहाँ जाकर देख आएं कि क्या मंज़र है! वहाँ के रहवासियों को कितनी तकलीफें उठानी पड़ी हैं, आज के कार्यक्रम के लिए नदी को पानी से भरा हुआ दिखाना है जिसकी कीमत वहाँ के छोटे किसान चुकायेंगे, क्योंकि उनको बग़ैर किसी पूर्व जानकारी के डैम से पानी छोड़ दिया गया है, अब इतना तो सोच ही लीजिए कि खड़ी फसल या सब्जियाँ पांच से छः दिन पानी में रहेंगी तो क्या हाल होगा।
       मैं एक बार पुनः दोहराता हूँ कि यह काज केवल और केवल अहं की संतुष्टि और ख़ुद को बड़ा दिखाने के लिए किया जा रहा है। सरदार अगर होते तो इसका कदापि समर्थन नहीं करते, बाकी मैं इतना अधिक आशावादी भी नहीं कि इस सब के बावजूद एकता दिवस की शुभकामनाएं भी दे सकूं।
                                                  - कमलेश

सोमवार, 22 अक्तूबर 2018

हम

Source - Bharatkhabar.com

पिछले हफ्ते गांव घूमने के लिए गया हुआ था, इस बार चुनावी चहल पहल के साथ साथ और भी कई सारी चीज़ों ने ध्यान आकर्षित किया। कुछ लोगों से उनके बच्चों के भविष्य के बारे में बातचीत हुई, जिसमें उन्होंने शिक्षा से उपजी बुराइयों और उनसे जुड़ी नकारात्मक चीज़ों का हवाला देते हुए यह ज़ाहिर किया कि वे अपने बच्चों को आगे की शिक्षा के लिए नहीं भेजना चाहते। गांव के लोगों का शिक्षा व्यवस्था के प्रति ऊपजता यह अविश्वास बेहद गंभीर विषय है, जिस पर हमें यानि कि युवा वर्ग को मंथन करने की ज़रुरत है कि किस तरह इस अविश्वास का समाधान किया जा सकता है और सरकार को हम किस तरह से प्रभावित कर सकते हैं! इसके बाद मेरी बातचीत के विषयों में राजनीति और सरकार की विभिन्न योजनाओं का भी हिस्सा रहा, जिसमें लोगों ने राजनीतिक दलों और साथ ही सरकार के प्रति अपने मतों को ज़ाहिर किया जिनमें उनका अविश्वास व्यवस्था के प्रति यहाँ भी झलका,अपनी आकांक्षाओं का अधूरा रहना किसे नहीं खलता! जिस तरह से लोगों ने सरकार की विभिन्न योजनाओं और कलापों का घटनाक्रम पिछले कुछ समय में देखा है,उनकी चिंताओं की फ़ेहरिस्त बढ़ती ही गयी है। अपने और परिवार के लिए ज़िन्दगी को झोंक देने वाले किसानों की आपबीती भी कुछ इसी तरफ इशारा करती है कि पिछले कुछ सालों में उन्हें किसी भी दल की सरकार से अपेक्षित मदद नहीं मिल पायी है।
              बढ़ते पूंजीवाद को भी कुछ चर्चा में चिंता का विषय मानकर बातें हुई हैं, केवल और केवल धन के पीछे भागती दुनिया में कुछ लोग अब भी केवल दो जून की रोटी से संतुष्ट होने का ख़्वाब देख रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है कि गांव में हमेशा सादा जीवन जीने की शिक्षा दी जाती रही है लेकिन कुछ वर्षों में शहरीकरण से उपजी परेशानियों और आकर्षण में से अब लोग आकर्षण की तरफ झुकते नज़र आते हैं, इसका कारण शायद उनकी अधूरी आशाएं हो सकती है जिसे हमारा विज्ञान युग अभी तक पूरा नहीं कर पाया है, या यूँ कहें कि पूँजीवादी लोगों ने ही इसका भरपूर फायदा उठाया और जरूरतमंद लोगों को उनके अधिकारों से वंचित करके उनका शोषण किया। प्रशासन की ओर भी जनता, खासकर ग्रामीण लोग अब उतने भरोसे से नहीं देखते जितना कि पहले के समय में देखा जाता था, यहाँ भी अविश्वास की जड़ मजबूर लोगों को समय पर समाधान न मिलने की प्रशासन की प्रथा को, लोग प्राथमिक रूप में देखते हैं।

        ख़ैर सरकार और व्यवस्थाओं के प्रति अविश्वास आम रहा है लेकिन पिछले कुछ दशकों में लोगों के बीच आपसी मतभेद आश्चर्यजनक रूप से बढ़ते हुए दिखाई पड़ते हैं, अपने समुदाय के साथ ही सामंजस्य बैठाना कुछ लोगों को सबसे बड़ी मुसीबत लगता है। विचारों के मतभेद उनकी कार्यशैली और जीवन को भी नकारात्मक तरीके से प्रभावित करते हैं। सहयोग की भावना से जीवन यापन करने वाले लोगों के बीच बढ़ती दूरियाँ हमारी आधुनिकता पर सवाल खड़े करती है, एक तरफ हमने बाकि हिस्सों में प्रगति की, किन्तु दूसरी ओर हम जीवन जीने की कला में पिछड़ते ही रहे। चिंता का विषय यह है कि आस पड़ोस में रहने वाले लोगों का अपने स्वार्थ को प्राथमिकता देते जाना लगातार बढ़ता जा रहा है, चाहे फिर वह गांव हो या शहर; कोई अंतर दिखाई नहीं पड़ता। सहयोग की भावना का लगातार घटते जाना और जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ने की प्रथा का उद्घाटित होना हमारे समाज की कमजोरियों को दर्शाता है। किसी भी घटना के प्रति आज अधिकांश वर्ग, चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण अपनी जिम्मेदारी को समझने के लिए आगे आने से कतरा रहा है, हमारा यह गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार हमें गर्त के सिवा और कहीं नहीं ले जायेगा।
               आज के समाज की दिक्कतों को समझकर उनकी जिम्मेदारी निभाने का हमारा कर्तव्य बनता है, जिसको हमें सर्वोपरि मानकर चलना होगा ताकि हम अपने समाज पर लगे गैर-जिम्मेदाराना होने के लांछन को हटा सकें। और प्रेम, करुणा, सद्भाव और सहयोग की भावनाओं के साथ अपना जीवन जीकर तथा साथ ही अन्य लोगों को इसके लिए प्रेरित कर एक नए समाज की नींव रख सकें, जो एक आदर्श समाज के तौर पर आगे भी स्वीकारा जाये।
बाकि अपने आदर्शों से जीवन को उत्कृष्ट बनाये रखने की कोशिश हमेशा करते रहिये।
प्रेम और शुभकामनाएं
                                                - कमलेश