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केलि और कल

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ज़िन्दगी के पन्ने कितने ख़ाली हैं यह उनके भरते चले जाने के दौरान महसूस होता है. अपने अस्तित्व में से कुछ खो देने ग़म मुझे इस क्षण में महसूस होता है जब मैं कुछ भी नहीं दे पाने की स्थिति में होता हूँ. कल, यह एक सुरक्षित ख़्वाब है और एक याद भी जिसे अपनी सहजता के अनुसार जीवन में लाया जा सकता है. मेरा कल उन सारे ख़यालों का पुलिंदा है जिन्हें मैं ज़िन्दगी जीने के स्वांग में कहीं छोड़ बैठा हूँ; वे तमाम पल जिनको मैं अपने तईं नहीं जी सका. और इस विचार को देखकर यह लगता है जैसे मैं व्यर्थ ही जीए जा रहा हूँ. कल सजाने के फेर में जब हर दिन छोटी छोटी गलतियाँ करता जाता हूँ तो मुझे सपने में आने वाला कल एक बहुत बड़ी गलती के रूप में नज़र आता है. दुनिया ने इंसान का जीना आसान करने के लिए अनगिनत उपाय किये और किये जा रही है किन्तु मैं यह जानना चाहता हूँ कि ज़िन्दगी जीने की प्रक्रिया को आसान या मुश्किल करने का क्या अर्थ है! कभी कभी मैं सोचता हूँ कि आदम और हव्वा ने अपने अप्रतिम और अतरंग क्षणों में कल का आविष्कार किया होगा और चाह रखी होगी कि कल भी उनकी केलि-क्रिया के समान सहज, सुन्दर और सजग बना रहे लेकिन अफ़सोस हम मानव ऐस…

दिन, ज़िन्दगी और प्रेम

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ज़िन्दगी को जीते हुए कभी कभी यह ख़याल आता है कि इस जीने के प्रक्रिया से यानि उन सारी चीज़ों, उन सारे कामों से जो हम ख़ुद को ज़िन्दा रखने के लिए करते चले आ रहे हैं उनसे एक ब्रेक मिलना चाहिए. ज़िन्दा रहने के चक्कर में हम कितनी चीज़ों को ऐसे ही छोड़ देते हैं अमूमन दिन के गुज़रने को ही ले लीजिये. मुझे ऐसा लगता है कि हम दिन को गुज़रते हुए कभी भी नहीं देख पाते. जैसे, वह पल जब नींद बिस्तर छोड़ती है और सवेरा आँखों में उतरता है. सूरज की पहली किरण एक परिपक्व प्रेमी की तरह चेहरे को छूती है और रात भर की थकान सुबह की ठंडी हवा के साथ कहीं गुम हो जाती है. और इस तरह जीवन जीने का जतन करते करते अनगिनत चीज़ें हमारे जीवन का हिस्सा हो जाती है जहाँ हम कभी नहीं पहुँच पाते. 
मेरी ज़िन्दगी में कुछ एक ऐसी चीज़ें हैं जिनसे मिलकर मैं ख़ुद के क़रीब होने जैसा कुछ महसूस कर पाता हूँ. दिन के पहले पानी के घूँट में मुझे वह प्रेमिका याद आती है जिसने मुझे मरते मरते बचाया था. नाश्ते के पहले कोर में मुझे वो अम्मा मिल जाती हैं जिन्होंने पिछले बरस मेरे खेतों में गेहूँ काटा था. नहाते हुए मैं ख़ुद को विदर्भ (महाराष्ट्र राज्य का एक क्षेत्र जोकि …

मेरा मन

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बरामदे का न होना कितना खलता है! यह बात एक ऐसे घर में रहकर जान पाया जहाँ बरामदा नहीं था. मेरा मन भी बरामदा तलाशता है जहाँ बिखरा जा सके, टहला जा सके और गीली हो चुकी बातों को सुखाया जा सके. बरामदे में होकर ख़ुद को टटोलना, इस कृत्य के लिए मेरे मन में अक्सर जगह कम पड़ जाती है; इतना कुछ है बाहर का जो सारी जगह हथिया लेता है लोगों के ख़याल, बातें, यादें, लोग और अंत में ख़ुद के लिए ख़ुद में कुछ नहीं बचता. ख़ुद को छोड़कर सब कुछ है मेरे मन में जिसे बाहर निकालते हुए मुझे एक असह्य दर्द उठता है जिससे डरकर में ख़ुद के पास जाने से रुक जाता हूँ. दुनिया जितने चक्कर लगाती है उसमें एक चक्कर मन का भी हो ऐसा मेरा मन चाहता है ताकि पूरे मन का कोना कोना घूमा जा सके और अन्दर पल रहा ताप दूर करने का जो भी जतन हो किया जा सके. मन का ताप हरने के फेर में दुनिया को बुद्ध, महावीर, राम, कृष्ण, ईसा, पैगम्बर और न जाने कितने ही रत्न मिले लेकिन मेरा मन उसे हरना नहीं चाहता यह तो बस उसे समझना चाहता है.      कमरे की खिड़की के उस पार एक लम्बी छत है जहाँ से अक्सर एक लड़की अपने आपको लगाये गये पंखो से उड़ने का जतन करती है और इस प्रक्रिया में…

पल में छुपा पल

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“वह बरामदे से उठी और पास के एक अँधेरे कमरे की ओर बड़ी, कमरे के दरवाज़े पर लगी कंदील मानो उसका इंतज़ार ही कर रही थी; जैसे ही उसने कंदील को छुआ वह तुरंत उसके हाथों में आ गई. कंदील उठाये वह उस अँधेरे कमरे में कुछ देर के लिए घूमती रही और अंत में किताबों की एक पूरानी कतार में से विनोद कुमार शुक्ल की एक किताब को अपने हाथों में लिए बाहर आ गई. यह घर उसके जेहन में तब से है जब से उसने दुनिया को समझना शुरु किया था. अक्सर जब वह इससे दूर होती है यह घर उसके सपनों में आया करता है और अपनी कहानी बताते हुए उसे अपने पास आने के लिए कहता है. आज जब इतने सालों बाद वह इस घर में वापस आई है तो उसके सपनों से जर्जर हालत इस घर की हो चुकी है, उसकी यादें आज भी घर को अपने अन्दर सहेजे हुए है और शायद यही वजह रही है कि घर उसके लिए अभी तक जर्जर नहीं हुआ है. बरामदे के सामने बनी बाड़े की दीवार ज्यादा बारिश की वजह से पिछले साल गिर गई थी लेकिन आँगन से जुड़े दो कमरे अभी तक सहज और सुरक्षित थे; एक में कुछ पूरानी किताबों का ज़खीरा था और दूसरे वाले कमरे में रहने भर की जगह कुछ ज़रूरी सुविधाओं के साथ. विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ते हुए वह फ़िर…

कर्नाटक एक्सप्रेस -

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कई बार किसी से मिलकर ऐसा लगता है कि उससे पहले कहीं मिला जा चूका है लेकिन उसकी याद ताज़ा नहीं हो पाती. ज़िन्दगी ऐसे अनगिनत चेहरे भेजती है जिन्हें हम भूलचूक में पहचानने की कोशिशें करते हैं लेकिन सब कुछ व्यर्थ ही होता है. ऐसे ही किसी एक दिन मैं उससे मिला था उसका नाम तो मुझे याद नहीं उसकी प्रेमिका का नाम मुझे याद रह गया. ऐसा माना जाता है कि हम इंसानों को जानकारी और नामों से ज्यादा कहानियाँ याद रहती है और मेरे साथ भी यही हुआ था. मन्दाकिनी, कितना प्यारा नाम है! ऐसा लगता है कोई उत्तराखंड के पहाड़ों पर बैठा पुकार रहा है. यही नाम था उस लड़की का, जिस लड़के की वह प्रेमिका थी. मैं उससे एक रात कर्नाटक एक्सप्रेस में सफ़र करते हुए मिला था. वह लड़का किताबों का शौकीन है और उसे इस बात का नशा है कि ज़िन्दगी एक हसीं ख़्वाब है जिसे देखने के लिए छककर सोया जाना ज़रूरी है और उठकर ख़्वाब की हक़ीकत के लिए मेहनत करना भी. मैं नहीं जानता कि वो कहाँ जाना चाहता है अपनी ज़िन्दगी में लेकिन उसने बताया था कि कुछ सालों के बाद उसे अपनी प्रेमिका से शादी करनी है. जब मैंने यह सुना था तब मैंने उसकी हिम्मत की दाद दी थी यह सोचकर कि उसे अपन…

बहुत दिनों के बाद

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"उसकी नींद दरवाजे पर किसी की दस्तक की वजह से टूटी, उसने बिस्तर से ही पूछा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. उसने उठकर दरवाजा खोला और पाया कि बाहर कोई नहीं था. कितनी ही बार दिल में ख़यालों की दस्तक से हम जाग पड़ते हैं इस उम्मीद में कि कोई ख़्वाब हक़ीकत बनकर दरवाजे आ गया है. दरवाजे और दिल की दस्तक में कितना अंतर है यह सुनने पर ही जाना जा सकता है. कुछ देर अँधेरे में भटकने के बाद उसने कमरे की बत्ती जलाई और हाल ही में आई एक किताब को पढ़ने बैठ गया. बड़े दिनों बाद उसने सुबह उठकर किताब को हाथ में लिया था, कुछ देर में ही वह किताब में घुल गया. अचानक हुए शोर से उसका ध्यान टुटा जो सामने वाली गली से आ रहा था उसने सोचा कि रोज़ की तरह लोग पानी भरने के लिए झगड़ रहे होंगे और बालकनी तक जा लौट आया. लौटकर आने पर उसे लगा की कमरे में कुछ बदल गया है जो उसके जाने से पहले वहाँ नहीं था. अक्सर ऐसा होता है कि कुछ कैद करने के जुनूं में कुछ महसूस करना छुट जाता है और इसके साथ भी यही हुआ. जिस कमरे में वह इतने दिनों से रह रहा था उसकी सोहबत को ही महसूसना भूल गया था..." यह एक अधूरा किस्सा है जिसे लिखने की नाकाम कोशिश इस समय …

प्रेम-पीयूष

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मैं खोजता फिर रहा था बीते कुछ महीनों से अपने क्लांत मन के व्यग्रभावों में शांति, जो मुझे कई सालों से भी लम्बे प्रतीत हुए. अपनी तमाम बारीकियों और निर्लज्जता के साथ संसार करता रहा अनवरत ढंग से मेरे धैर्य और सीमाओं की परीक्षा: जिसका परिमाण मैं नहीं जानता. इन दुविधाओं के बीच से गुजरती राहों में एक दिन जब तुम्हारे समीप से गुजरी बयार मुझ तक आयीं तो अंतस ने एक ठहराव जान ख़ुद को रोक लेने का निर्णय लिया; वह सही है या नहीं इसे सोचने के लिए अब वक़्त नहीं. जीवन के चिर-सन्नाटे के स्पंदन में सुनी मैंने आँखों में गूँजती आहटें और देख पाया तुम्हारे नयन कलशों में भरे असंख्य प्रश्न जो मेरे अपने थे. तुम्हारे साथ मैं मौन में भी एक अविरल संवाद पा जाता हूँ और हर बार यह जान कर हतप्रभ रह जाता हूँ कि कितना कुछ छुपा है तुम्हारे अस्तित्व के उपवन में!

तुम्हारे संग मैंने खोजी अपने अस्तित्व की नई शाखाएँ. तुम्हारे लहराकर उलझते केशों ने सुलझाई मेरी अनगिनत पहेलियाँ और एक धुरी पर घूमते मेरे अकिंचन सपनों को मिला तुम्हारे अधरों से प्रेम-पीयूष. विशिष्ट सी महसूस होती कुछ संकोच की दीवारों का कंचुकी के स्वतंत्रता पाने के साथ ही…