संदेश

किसान

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पहली बरसात में भीगी माटी
जान से भी ज्यादा प्यारी होती है उसे,
जब स्कूल से बेटी के लौटने पर
उसका माथा चूमता है वह,
वैसे ही चूम लेता है खेत को। चाँद के ग़ुम हो जाने पर छाया सूनापन
उसके होंठो से दिखाई पड़ता है,
हर दफ़ा जब फैक्ट्रियाँ
उसके हिस्से की बारिश और सर्दी छीन लेती है,
वह चाहता है इतना कि
एक चादर में उसके दोनों बच्चे चैन से सो सकें। परेशान जब हर तरफ से हो
वह निकलता है अपने हक़ के लिए,
बाज़ की तरह झपट पड़ते हैं
सारे ठेकेदार उस पर, शायद
वो नहीं जानते रोटी गेहूँ से बनती है;
उसने नहीं भरा धान ज़रुरत से ज्यादा
कभी भी अपनी कोठरी में,
नहीं बहाया पैसा कभी ही फिज़ूल। एक मैना ढूंढ रही है वीराने में
अपने घोंसले के लिए एक पेड़,
वो ढूंढता है अपनी खोई आवाज़
जिससे उसे उम्मीद है कि वह
पेड़ के झूले की रस्सी को,
फंदे में बदलने से रोक लेगी।
                               - कमलेश
*जरूरी है कि अब हम अपने खाने के हर ग्रास को निगलने से पहले एक दफ़ा सोचें।*

योजनाएं, हकीक़त और सरकार

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पेट्रोल और डीजल के दामों का घोर विरोध कर जनता का मन 2014 में पूरी तरह मोह लेने वाली सरकार के राज में दोनों की कीमतें पिछले 7 सालों में अपने उच्चतम स्तर पर हैं। कर वसूलने के नाम पर अंधाधुंध वसूली और लूट मचाने का सरकारी तरीका ईजाद किया है सरकार ने, केंद्रीय कर असल कीमत का 24-26% और राज्य कर 20-25%, लेकिन इन करों की उपयोगिता का कोई प्रमाण सरकार अब तक नहीं दे पाई है। न ही इनको जीएसटी से बाहर रखने का उचित कारण अभी तक जनता के सामने आया है। हाल ही में एलपीजी सिलेंडर के बढ़ते दाम फिर से इन्हीं सवालों को उठाते हैं कि क्या देश की इकोनॉमी का बढ़ता फिगर ही सब कुछ है, उसके आगे आम आदमी की जेब, मजदूरों की रोटी और किसानों की ज़िन्दगी कोई मायने नहीं रखती?
               साल के पहले क्वार्टर में जीडीपी अपने ऊंचे स्तर पर पहुंची है जिसे सब के द्वारा देश का विकास सूचक करार दिया जा रहा है, तो फिर रुपए के गिरते दाम किस की तरफ इशारा कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब शायद सबके पास है लेकिन कोई भी उसे स्वीकारने को तैयार नहीं, रुपए और डॉलर के युद्ध में रुपए को देश की साख बताकर सबका दिल जीत लिया था तब वर्तमान सरकार न…

गुमनाम

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तेरी जानिब
जब भी कदम बढ़ते हैं
कुछ दूर चलने पर
अचानक
राहें अजनबी हो जाती है ;
फिर भी कभी,
जो पहुंच जाऊं तुम तक
इन गुमनाम राहों से,
तो मुझे
तुम
अपने पास रख लेना,
वैसे ही जैसे
स्पंज सोख लेता है पानी,
और सुनो
तुम्हारी आंखों का
इंतज़ार होना ख्वाहिश नहीं,
चाहत है कि
तेरे चेहरे की हंसी हो जाऊं । मुझे अपने नज़दीक
वैसे ही
संभाल कर रखना
जैसे
लॉकर रुम में रखा जाता है
किसी का सामान,
बिलकुल अजनबियों सा
गुमनाम ही रखना
मुझको तुम,
नाम की भीड़ बहुत है
इस दुनिया में । कोई पहचान नहीं चाहिए
मुझे
तुम्हारे करीब जब भी रहूं मैं,
मैं नहीं चाहता हूं कि
कोई देख ले मुझे
तुमको जीते वक़्त,
तुझमें से कोई ढूंढ ना पाए
मुझको कभी भी,
चाहे वो कितना भी अच्छा
चोर क्यों ना हो । छुपाओ मुझको अगर
तो ऐसे छुपाना,
जैसे
राम ने अपने वनवास में
छुपाया था सीता को ।।
                       - कमलेश

वह

मैंने उसे सड़क के किनारे पर लगे जामुन के पेड़ के नीचे देखा, जब उस पर गाड़ी की हैडलाइट का हमला हुआ । वह हड़बड़ाई शायद वह खुद को दिखने नहीं देना चाहती होगी, लेकिन अगर ऐसा ही था तो वह पास बने मकान की दीवार की ओट में भी छुप सकती थी । नहीं, वह छुपना नहीं चाहती होगी वह तो केवल दिखना नहीं चाह रही थी, न दिखना छुपने से एक दम अलग होता है यह मैंने उसके न दिखने की कोशिश में छुपते हुए जाना । उसके हाथों की उंगलियों के बीच से मुझे धुआं उड़ता हुआ दिखाई पड़ा, तब मैंने उसे करीब से देखने की कोशिश में उसकी ओर कदम बढ़ाए, लेकिन मैं उसकी ओर आ रहा हूं इसका कोई प्रमाण उस तक पहुंचने नहीं दिया । मेरे वहां पहुंचते न पहुंचते अचानक से कई सारा धुआं उठा और मैंने उसे मेरी तरफ़ आते देखा, मैं उसकी ओर जा रहा था शायद इसलिए वह मुझको मेरी तरफ़ आते हुए दिखाई दी, अगर मैं उससे दूर जा रहा होता तो वह भी मुझे दूर जाते हुए दिखती । कुछ देर बाद जब मैं वहां पहुंचा जहां उस उठते धुएं की नींव बनकर वह थी तो केवल चुटकी भर राख़ और किसी को वहां न पाया, मैंने वहां धुआं देखा था इसलिए राख़ को पाया और उसके होने के स्थान पर उसके न होने को ।
  …

आम

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खेत की मेड़ पर लगा है
बूढ़े आम का एक पेड़,
डाली पे मोड़¹ आने पर जिसकी
मैं इंतज़ार करना शुरु करता था
कच्ची केरियों के आ जाने का ।
जेठ में दादाजी सुनाते थे
बड़े चाव से हाग² पाड़ने के किस्से,
मैं तोड़ लाता था केवल दो हाग
मेरे और दादाजी के लिए,
जिसका स्वाद अब नहीं आता
कार्बन से पके आम में ।
जब से दादाजी गए हैं
मैंने नहीं सुना कोई भी किस्सा हाग का,
शहर की सड़कें इतनी तंग हैं कि
आम ढूंढने पर भी नहीं मिलता,
मिल भी जाए अगर कहीं
तो उस पर मोड़ नहीं दिखता होली पे ।
परसों देखा था बगीचे में एक पेड़
बाहर लेकिन एक तख्ती टंगी थी,
"यहां से फल तोड़ना मना है" ।
                                    - कमलेश
नोट --
मोड़ - होली के आसपास आम पे आने वाले फूल ।।
हाग - पेड़ पर ही पका हुआ आम ।।

कुछ बातें और

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बहुत मुश्किल होता है
चंद घड़ियाँ साथ बिताकर
सारी यादों को सुनहरा कर लेना,
आधा वक़्त
तेरी सूरत को निहारने,
लटों को गालों से परे हटाने
हाथों पर हाथों से कुछ भी लिखने,
और
पैरों के अंगूठों की झूठी लड़ाई में
गुज़र जाता है हमारा ।
गरियाने के लिए
बातों का गठ्ठर,
एक दिन पहले वाली
फ़ोन कॉल पर होता है बस,
जो मिलने आते-आते
कहीं खो जाता है,
और
बचती है केवल खामोशियाँ ।
सारी निजताओं को
अचानक से परे फ़ेंक,
जब लिपट जाया करते हैं
एक-दूजे से हम,
उन नज़दीकियों में
जहां केवल हम होते हैं,
तब ये महसूस होता है कि
इनसे बढ़कर कुछ नहीं ।

कुछ वायदे और आरज़ू
कुछ आश्वासन और बेमतलब के झगड़े,
जब बिखरने लगते हैं हमारे इर्द-गिर्द
तो कोशिश यही होती है कि
इन्हें जल्द समेट लिया जाए,
ताकि हम लौट सकें
अपनी पूरानी दुनिया में
पहले की तरह,
लेकिन इन यादों के साथ
जीने के लिए
अगली मुलाक़ात के इंतज़ार में ।
                               .....कमलेश.....

कुछ बातें

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कभी कभी डरा देता है
मुझको
खामोश बैठ जाना तेरा
मेरे पहलु में,
ख़ुमारी तेरी मौजूदगी की
होती तो ख़ूब है
लेकिन वो अचानक
भाग खड़ी होती है,
तेरे मुझको छू लेने पर
और मैं,
महसूस करने लगता हूँ
फिजिक्स के सारे सिद्धांत
तेरे हाथों की नरमाहट में ।

बातों को
बगीचे के पार धकेलते वक्त
पैर के अंगूठे से तेरी पगतलियों को,
छूने की वो साज़िश
जब तुम भांप लेती हो,
तो लगता है
चाणक्य को तुम्ही ने सिखाया है । मेरे लिए खरीदा गया
वो तोहफ़ा
जिसे तुम
यह कहकर देने से मना कर देती हो
कि 'जाओ मन नहीं है तुम्हें देने का'
और फिर तुम चुप हो जाती हो ।
तुम्हारी नज़र को
सूरज की किरणों की तरहा
खुद पर बिखरते देखना
और भी मुश्किल हो जाता है
उस वक्त,
जब तुम
पूछती हो कि
'चुप्पी में ख्याल क्या आते हैं तुम्हें ?' 'जानां' मैं कहना भूल गया
कि सारी बातें बताई नहीं जाती,
"कुछ बातें
चाँद सी भी होती हैं ।"
                           .....कमलेश.....