पोस्ट

अक्तूबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मैं चाहता हूँ

चित्र
मुतमइन रहता था एक शख़्स,
जब अपनी आँखों के आगे वह
देखता था घने दरख़्त औ' सब्ज़ ज़मीं,
एक रात थोड़ी ठहर कर गुज़री ऐसे
उसे कोई सपन तक न आ पाया,
सुबह तक दरख़्त औ' ज़मीं
गर्दन तलक पानी में डूब चूके थे।
गुहार लगाता भी तो वह किस से?
जो थे सुनने वाले उन्हीं ने
डैम के दरवाज़े साहब के कहने पर खुलवाये थे।
अपने मुस्तक़बिल पर रोती है इक औरत
पुराणों में जिसको वसुधा कहा है हमने,
एक बार भी नहीं सोचते अब हम
कि वासना का हमारी अंजाम
किस दिशा से लौटकर आने वाला है!
दिल थाम कर बैठिये अभी तो दिल्ली धुआँ हुई है,
कल समंदर आपके घर का भी पता पूछने आएगा। वह रो रहा था कल नदी के किनारे बैठा
कि मंदिर का फैसला जनवरी में आएगा,
उसे तो यह तक याद नहीं कि ख़ुद उसने
अपने पिता से ठीक से बात कब की थी?
नाम बदलता है कोई करोड़ों में मेरे शहर का,
जाकर देखे तो सही कोई रात में
जे.जे. कॉलोनी का मंज़र,
मज़ाल जो अगली सुबह हलक़ से निवाला उतर जाए! एक बिल्ली को पत्ते खिलाकर पालता है
ख़ुद लोथड़े खाता इक परिवार,
मैं जानता हूँ जिस दिन वह बंदर
बच्चे के हाथ से रोटी छीनकर भागेगा,
तब समझ में आएगा उन्हें
कि कैसे एक कुत्ता बिल्ली
और नेवला साँप को पाल…

एकता दिवस और हम

चित्र
सरदार वल्लभ भाई पटेल की शख़्सियत पर मुझे कोई शंका नहीं लेकिन उनके नाम के तले जो पाखण्ड हो रहा है उसके बारे में हमें एक दफ़ा तो ज़रूर सोचना चाहिए। एक तरफ जहाँ 24 करोड़ लोग भूख, पानी, स्वास्थ्य की सुविधाओं से वंचित हैं सरकारें अपना अहं संतुष्ट करने के लिए प्रतिमाएं बनवा रही हैं, जी हाँ मैं गुजरात की एकता की प्रतिमा और महाराष्ट्र में कुछ समय में बनाई जाने वाली शिवाजी की प्रतिमा और साथ ही मंदिरों, मस्जिदों और अन्य धर्मस्थलों के बनाये जाने की ख़िलाफ़त करता हूँ। 3000 करोड़ रुपयों की रकम जो लग चुकी है और वह जो आगे खर्च की जाएगी, हर तरह से उन 24 करोड़ लोगों तथा 134 करोड़ देशवासियों के हित में उपयोग की जा सकती थी। प्रतिमा बनाने के निर्णय का समर्थन करने वाले एक दफ़ा वहाँ जाकर देख आएं कि क्या मंज़र है! वहाँ के रहवासियों को कितनी तकलीफें उठानी पड़ी हैं, आज के कार्यक्रम के लिए नदी को पानी से भरा हुआ दिखाना है जिसकी कीमत वहाँ के छोटे किसान चुकायेंगे, क्योंकि उनको बग़ैर किसी पूर्व जानकारी के डैम से पानी छोड़ दिया गया है, अब इतना तो सोच ही लीजिए कि खड़ी फसल या सब्जियाँ पांच से छः दिन पानी में रहेंगी तो क्या हाल हो…

हम

चित्र
पिछले हफ्ते गांव घूमने के लिए गया हुआ था, इस बार चुनावी चहल पहल के साथ साथ और भी कई सारी चीज़ों ने ध्यान आकर्षित किया। कुछ लोगों से उनके बच्चों के भविष्य के बारे में बातचीत हुई, जिसमें उन्होंने शिक्षा से उपजी बुराइयों और उनसे जुड़ी नकारात्मक चीज़ों का हवाला देते हुए यह ज़ाहिर किया कि वे अपने बच्चों को आगे की शिक्षा के लिए नहीं भेजना चाहते। गांव के लोगों का शिक्षा व्यवस्था के प्रति ऊपजता यह अविश्वास बेहद गंभीर विषय है, जिस पर हमें यानि कि युवा वर्ग को मंथन करने की ज़रुरत है कि किस तरह इस अविश्वास का समाधान किया जा सकता है और सरकार को हम किस तरह से प्रभावित कर सकते हैं! इसके बाद मेरी बातचीत के विषयों में राजनीति और सरकार की विभिन्न योजनाओं का भी हिस्सा रहा, जिसमें लोगों ने राजनीतिक दलों और साथ ही सरकार के प्रति अपने मतों को ज़ाहिर किया जिनमें उनका अविश्वास व्यवस्था के प्रति यहाँ भी झलका,अपनी आकांक्षाओं का अधूरा रहना किसे नहीं खलता! जिस तरह से लोगों ने सरकार की विभिन्न योजनाओं और कलापों का घटनाक्रम पिछले कुछ समय में देखा है,उनकी चिंताओं की फ़ेहरिस्त बढ़ती ही गयी है। अपने और परिवार के लिए ज़िन्दग…

सब का मैं

चंद हफ़्तों से मेरी नींद
ख़ुद टूटने की आदी हो गयी है,
कुछ ख़यालों को मेरे कान सुनते हैं
जो कभी मेरे नहीं रहे, फिर भी
उनकी खनखनाहट सुनता हूँ मैं
जैसे किसी बच्चे की भूखी आवाज़ में,
खनकता है पांच रुपए का सिक्का।मेरी कमीज़ पर अब कोई
रंग नहीं चढ़ता, जो डुबोई थी मैंने
नीले रंग में पिछले शनिवार,
टकरा जाया करता हूँ भरे बाज़ार
अपनी ही शक़्ल के किसी इंसान से,
आईना चाहे कुछ भी दिखाए
मुझे एक ही सूरत दिखाई पड़ती है।पुकारता हूँ जब कभी में किसी को
उसको नाम मेरा ही सुनाई देता है,
पढ़ता हूँ गीता में विराट स्वरूप की व्याख्या
तो मेरा ही वर्णन लिखा होता है,
मुझे ऐसा लगता है कि
यह सारी घटनाएं
मुझसे मेरा 'मैं' वापस ले रही हैं,
और मैं थोड़ा थोड़ा कर के
सब का 'मैं' होता जा रहा हूँ ।
                                 - कमलेश

किसान

चित्र
पहली बरसात में भीगी माटी
जान से भी ज्यादा प्यारी होती है उसे,
जब स्कूल से बेटी के लौटने पर
उसका माथा चूमता है वह,
वैसे ही चूम लेता है खेत को। चाँद के ग़ुम हो जाने पर छाया सूनापन
उसके होंठो से दिखाई पड़ता है,
हर दफ़ा जब फैक्ट्रियाँ
उसके हिस्से की बारिश और सर्दी छीन लेती है,
वह चाहता है इतना कि
एक चादर में उसके दोनों बच्चे चैन से सो सकें। परेशान जब हर तरफ से हो
वह निकलता है अपने हक़ के लिए,
बाज़ की तरह झपट पड़ते हैं
सारे ठेकेदार उस पर, शायद
वो नहीं जानते रोटी गेहूँ से बनती है;
उसने नहीं भरा धान ज़रुरत से ज्यादा
कभी भी अपनी कोठरी में,
नहीं बहाया पैसा कभी ही फिज़ूल। एक मैना ढूंढ रही है वीराने में
अपने घोंसले के लिए एक पेड़,
वो ढूंढता है अपनी खोई आवाज़
जिससे उसे उम्मीद है कि वह
पेड़ के झूले की रस्सी को,
फंदे में बदलने से रोक लेगी।
                               - कमलेश
*जरूरी है कि अब हम अपने खाने के हर ग्रास को निगलने से पहले एक दफ़ा सोचें।*