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जुलाई, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रेम और हम

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वो मिली थी मुझसे जब पहली दफा तो कभी सोचा नहीं था उसने कि यहाँ तक पहुंच जाएगी ज़िन्दगी ख़्वाबों के पहियों पर दौड़ते हुए, और न ही मैंने कभी ऐसा पुलाव पकाया था अपने दिल में। वो खिलखिलाती है तो सोचता हूँ कि सारी दुनिया को म्यूट पर डाल दूँ। ऐसी ही एक हँसी ने खींच लिया मुझको उस तक, और तब से मैं बस खिंचता चला जा रहा हूँ, कहाँ! यह अब तक रहस्य है। मैंने कहा था उससे कि मेरा इंतज़ार करते हुए पीपल के नीचे न खड़ी रहे, लेकिन उसने मेरी एक न सुनी, उसके न सुनने को प्रकृति ने इतनी गंभीरता से लिया कि जब भी मिलता हूँ उससे वो पीपल के पेड़ के पास ही मिलती है। पहाड़ों ने मुझे इतने ख़त लिखे लेकिन मैं उनके जवाब देने में आलस ही करता रहा ताउम्र, पिछले दिनों उसने ख़त लिखा मुझे और भेजा पहाड़ों के ज़रिए। पहाड़ इस बार मुझे उठा ही ले गया अपने जवाबों की ख़्वाहिश में, ज़िन्दगी ने भी समर्पण करते हुए समूचा दायित्व खुला छोड़ दिया प्रकृति के जिम्मे।  Source - Stalktr.net         एक रात सड़क पर चलते हुए जब मैं किसी आवाज़ को सुनकर रुक गया तो उसने हाथ थाम लिया मेरा हौले से आकर, मैंने नज़रें उठाई ऊपर और मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया: ह

इंतज़ार और तुम

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तुम देखती हो थोड़ी सी गर्दन झुकाकर मेरी ओर तो ऐसा लगता है कि सूरजमुखी देख रहा है सूरज को। सातों आसमान के पार से जब गूँजता है तुम्हारा स्वर तो इतनी ज्यादा ख़ुशी होती है कि मैं जून में भी नंगे पैर चल लेता हूँ। तुम मिली इस दफा मुझे पहाड़ों की गोद में, जहाँ मुझे कई जन्मों से आना था शायद: वहाँ आकर तो यही लगा था मुझे, तो घर वापसी जैसा भाव पैदा हो गया। तुम्हारे साथ प्रकृति को इतना सहज पाता हूँ जैसे कि किसी ने इसकी जंज़ीरें खोल दी हों, तुम खिल उठती हो जब पानी की चंद बूँदों से तो मेरा मन करता है कि उतार दूँ बादलों का तमाम पानी जो तुम तक पहुँच कर अपना जीवन सफल कर ले। जिस तरह दुनिया संजो रही है सारे सूत्र और समीकरण, मुझे ऐसा लगता है उसने तुम्हें पहचाना ही नहीं अब तक, कभी कभी जी करता है कि बिग बैंग थ्योरी वाले वैज्ञानिक को तुमसे मिलाऊँ, ताकि वो अपनी भूल सुधार सके। तुम्हारे साथ रहता हूँ तो अकेलेपन के सारे सिद्धांत मुझे खोखले लगते हैं, तुम जब डर जाती हो किसी जानवर से, उससे अपना प्रेम जाहिर करते हुए तो तुम्हें भँवरा बनकर छेड़ने को जी करता है।            उस दिन जितनी सहजता और ध्यान से तुमको स्कूटी

सुनो दोस्त!

मनु के लिए - (14-जुलाई-2019) कुछ रिश्ते नदी में बहते फूलों की तरहा होते हैं, मैं बहकर आ गया तुम तक ऐसी ही एक आनंदमयी लहर के साथ, तुम्हें देखकर लगा नहीं मुझे कि मिला हूँ तुमसे मैं सिर्फ कल, ज़िन्दगी ने इतना अजनबी बना दिया है कि हर चेहरा जान का टुकड़ा लगता है। तुम्हारे साथ रहकर मुझे महसूस हुआ कि रिश्ते लिखते हैं ख़ुद की बुनियाद, तुमने सिखाया कि साथ रहकर चलना और साथ जीने में कितनी सारी समानताएं और अंतर हैं। तुम्हारा मिलना अच्छा है दोस्त इस भीड़ भरी दुनिया में, तुम आये तो लगा कि बारिश अपने घर आ गई, दो पल ठहरकर चले तो आसमानों की परिभाषाऐं खुल गईं: मैं रहूँगा वहीं ज़िन्दगी के मोड़ पर खड़ा, तुम देखोगे कभी भी मुड़कर 'गर तो पाओगे एक हँसता सा चेहरा, वादा तो नहीं कर पाया आज तक कोई लेकिन इतना यक़ीन तुम्हारे लिए ज़रूर है तुमसे, कि मिलेंगे जब भी दूरियों के पार तो गले लगकर सारी दूरियाँ दफ़न कर देंगे।                                                     - कमलेश

ज़िन्दगी का पर्याय - घर

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ज़िन्दगी के रास्तों में ख्वाबों की खटपट जारी है पिताजी जब घर से फ़ोन करते हैं, तो चेहरे पर मुस्कान तारी होती है और दिल में एक नया ख्याल पनपता है, बहुत दिन हुए माँ की आवाज़ सुने भी; सपने तो सारी दुनिया एक जैसे देखती है, बस चलते हुए घड़ी का वक़्त हाथ में नहीं रहता। मैं खींच रहा हूँ, पेड़ की जड़ में अटकी रस्सी घर की ख्वाहिश है कि देखे मेरी सूरत, मैं लेकिन लिपट कर सोना चाहता हूँ दादाजी के पुराने कम्बल से; चार नए आम के पेड़ भैया-भाभी ने लगा दिए हैं घर के आगे, बस पिताजी और माँ के साथ नीम के नीचे रखे तख़्त पर बैठ चाय पीना बाकी है: कुछ रातें चूल्हे के सामने बैठकर, बतियाना चाहता हूँ जी भरकर भैया-भाभी से। बच्चों के साथ मिट्टी में खेलते हुए खुद को भुला देना चाहता हूँ, आम तोड़ने हैं कभी उचककर मुझको जब कोई ज़िद करे कि आम चाहिए उसे। ज़िन्दगी से चार ख़्वाब मैं अपने हक़ की तरह ले लूँगा, आम, नीम, चाय, तख़्त और बातें मेरे बच्चों से ले लिया है मैंने ये उधार, प्रेम की परछाईयाँ जो खनकती है मेरे पहलुओं में, चाहता हूँ कि मुझे चाँद की तरह देखने वाली लड़की के हिस्से में भी बराबरी से

कवितायें (दक्षिण यात्रा)

कविता - १ एक पगडंडी भाग रही है अपनी जान बचाने दौड़ती हुई रेल की पटरियों के साथ; शायद कोई पक्की सड़क, उसका पीछा कर रही है। ________________________________________ कविता - २ एक नज़र ने देखा मुझको दूरी के दूसरे छोर से, क्या चाहा था उन आँखों ने झुकाए नज़र अपनी यही सोचता हूँ; प्रेम की चाह में जीने वाले सुन लें, इस दुनिया में विश्वास की कमी है अपने दिलों को भरोसे से सींचते रहना।                                                - कमलेश

वसीयतनामा

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किसी भी सफ़र के समय दो भागों में बँट जाती है दुनिया, मैं बन जाता हूँ दर्शक ताकि बचा हिस्सा दर्शन हो जाये, दार्शनिक का कोई अस्तित्व नहीं कहानी में: सब ढूँढ रहे हैं खुलापन पैरों में जंज़ीरों को ढोते हुए, उजाला दीखता तो है आँखों में पलकों में जमे हुए अँधेरे के पीछे। मैं चलता हूँ आसमाँ के नीचे जो घूरता है हर कदम मुझे, साथ चल रही लड़की कहती है दूर जाते हो तुम तो आँखों में बादल छा जाते हैं, मैं कहता हूँ  हाँफती धरती और घूरता आसमान, मौन से प्रतिपल होता संवाद और पलकों में लिपटा इंतज़ार प्रेम का दूसरा नाम है। दो हिस्सों में बँटते से सफ़र में झाँकता हूँ खिड़की से बाहर, तो दुनिया दीखती है नई सी जहाँ इंसान की कमी लगातार बढ़ रही है जहाँ सपनों का अकाल चल रहा है, मेरे हमनफ़स मेरे वसीयतनामे में मिलेंगे दो नाम: पहाड़ की गोद में बसा जंगल और मोर पंख रख पाओ सहेजकर तो रखना।                                           - कमलेश