पोस्ट

मई, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ग़ज़ल

अपनी ख्वाहिशों का सूरज उगते देखा है, मैंने तुझको मेरा नसीब लिखते देखा है । झिलमिलाती है चाँदनी जैसे आसमान् पर, तुझको खिलखिलाकर वैसे हँसते देखा है ।
सिकुड़ जाती है जो छुईमुई जब छुने पर, मेरी पनाहों में तुझको यूँ शरमाते देखा है ।
बिखर जाता है जैसे कोई फूल हवाओं में, मेरी बाँहो में तुमको वैसे ही टूटते देखा है ।

घुलती है जैसे शराब पानी में रुह बनकर, खुद में तुझको उस तरह मिलते देखा है ।
  .....कमलेश.....

पैगाम

और बहुत दिन हुए कही कुछ हुआ नही, क्या सियासत भी अब शर्माने लगी है ।
वो चीख, वो सिसकियां,वो पुकार क्या उनकी आवाज भी दम तोड़ने लगी है ।
मेरे वतन के इन हालातों को देखकर भी, क्या तुम लोगों में जरा हलचल होने लगी है ।
काट कर ले गए वो शीष हमारे बेटों का, क्या इस पल भी तुम्हें नींद आने लगी है ।
देश की सरहद पर जवान शहीद हो रहे है, क्या 56 इंच की छाती अब सिकुड़ने लगी है ।
.....कमलेश.....

तुम

चित्र
गर्मी के भीषण तूफान् सी निडर,
बनकर के लिपट जाया करो तुम ।

रूख बदलती इन  हवाओं सी,  फिर से पलटकर आया करो तुम ।
कुछ समझ बादलों से उधार लेकर,
वक्त बेवक़्त मिलने आया करो तुम ।

घनघोर काली घटाएँ बनकर के,
दिल के आँगन पर छाया करो तुम ।

कड़कती चमकती बिजलियों के जैसी,
कभी मुझ पर गिर जाया करो तुम ।

इन बारिशों की बूँदो जैसी निर्लज्ज,
होकर के मुझे छु लिया करो तुम ।

बाढ़ के उस बेकाबू पानी की तरह,
मेरे तन में फैल जाया करो तुम ।

अतिप्रिय-मनभावन सावन के जैसे,
मुझमे समाकर प्रेम किया करो तुम ।
.....कमलेश.....

अंधविश्वास

चित्र
कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी PK ,उस पर बहुत बवाल मचाया गया था क्योंकि उसमे दिखाया गया था के लोग किस हद तक अंधविश्वास में डूबे हुए है ।निजी तौर पर, मैंने भी बहुत से कर्मकांड को देखा और सुना है । एक होता है आँख मूंद कर विश्वास करना जो इंसान पर किया जा सकता है लेकिन अंधविश्वास तो बेवजह ही हमारी जिंदगी का हिस्सा बने हुए है ।




 बहुत से लोग अंधविश्वासो को भी वर्गीकृत करते है जैसे कि अच्छा और बुरा । धार्मिक दृष्टि से किसी को भी तौलना मेरा स्वभाव तो नही लेकिन यह एक बहुत कड़वा सच है कि हिन्दू धर्म में अनेक अंधविश्वास फलते फूलते है ।
कुछ लोग इन्हे अपनी कमाई का जरिया बनाए हुए है । गौरतलब है कि अन्य धर्म भी अंधविश्वास का शिकार हो गए है, लेकिन अब इसका यह अर्थ तो नही कि हम हमारे जीवन को इनके इशारे पर चलने दे।

        अंधविश्वासी लोग अपने आस-पास घटित होती हर चीज को किसी ना किसी तरह बुरे साये या टोटको मे उलझाए हुए रहते है । इनकी एक लंबी चौड़ी सूची बनाई जा सकती है  ( मंगलवार को बाल और नाखून ना काटो,सूर्य अस्त होने के बाद सफाई मत करो, छींक आने पर घर से बाहर ना निकलो, झाड़-फूंक, साधु की ओषधि से गर्भ धारण …

कुछ वक़्त के बाद

चित्र



कुछ वक्त के बाद आज फिर ये ख्याल आया है,
पथरीली राहों के इस सफर में क्या मैंने पाया है;
आज ख्वाहिश हो गई एक तस्वीर बनाने की,
चाहत हो गई उसे अपने रंगो में डुबाने की ।

सफर की राहों में जिदंगी को देखा है मैंने,
ठोकर खाकर यहाँ संभलना सीखा है मैंने;
एक अजनबी मुस्कान को अधरों पर रखता हूँ,
क्या रह गया है बाकि यही बात सोचता हूँ;
उन बिखरे ख्वाबों से पुराने मंजर याद आते है,
जाने क्यूँ वो बीते लम्हों को साथ ले आते है;
कुछ वक्त के बाद फिर हौसला आया है,
इस अँधेरी कोठरी में वापस उजाला आया है;
हसरत हो गई नये ख्वाबों को सजाने की,
चाहत हो गई उन्हें अपने रंगो में डुबाने की।

बातों का वो बवंडर डरता रहा मैं जिस से,
उसे आज खुलकर कहने की ख्वाहिश हुई है;
दम घोटती इस छोटी सी दुनिया से,
आज दुर चले जाने की चाहत हुई है;
दामन में खुशियाँ सजाने का हौसला आया है,
बाँहें फैलाकर हँसने का हमें सपना आया है;
कुछ वक्त बाद बेड़ियाँ तोड़ने की हिम्मत आई है,
जैसे इस बेजान जिस्म में जान लौट कर आई है;
ख्वाहिश हो गई नई राहों पर चलने की,
चाहत हो गई उन्हें अपने रंगो में डुबाने की।
                                …

कोरा कागज़

देखा करता है ख्वाब हर कोई

मुकम्मल मुश्किल से कर पाता है

अपनी तकदीर लिखने के जुनून में

कोरा कागज फिर कोरा रह जाता है ।



हौसलो में ताकत हर किसी के नही है

खुद पर यकीन हर किसी को नही है

ठहर जाता है मुसाफ़िर राह में

अपनी मंजिल से भटक जाता है

अपने सपनो को पूराकरने चला वो

कोरा कागज फिर कोरा रह जाता है ।



चाहते है सब अपनी मर्जी का जहान्

वक्त को बदलने की लेकिन चाहत कहाँ

पलट देता है बाजी राह में

वो वक्त फिर हावी हो जाता है

अपने सपनो को पूरा करने चला वो

कोरा कागज फिर कोरा रह जाता है ।




                                 .....कमलेश.....

शायद अभी

मुझे जरुरत है तेरी, शायद अभी
आँखे नम है मेरी, शायद अभी
तेरे आने की आहट हुई, शायद अभी
तेरी हँसी की गूँज हुई, शायद अभी
हवा ने इक पैगाम दिया, शायद अभी
तुमने मुझे याद किया, शायद अभी
साँसे इकरार कर रही, शायद अभी
आरजू शोर कर रही, शायद अभी
एक कली खिल उठी, शायद अभी
तु नजदीक आ गयी, शायद अभी
तुम्हारी झलक है देखी, शायद अभी
महक गई है रुह, शायद अभी
कायनात से वादा किया, शायद अभी
बन कर रहूँगा तेरा, शायद अभी
होंठो पर हँसी है आई, शायद अभी
जैसे बजी हो शहनाई, शायद अभी
छोटा सा ख्वाब है देखा, शायद अभी
तु समा गया है मुझमें, शायद अभी ।


                           .....कमलेश.....

वक्त है

तेरी बातों को याद करने का वक़्त है तेरी साँसो को महसूस करने का वक़्त है करीब आ गया है इतने वक़्त बाद तु तेरी मोहब्बत में कुछ करने का वक़्त है।
चाहतों को तेरी समेटकर मैं सोता हूँ ख़्वाबों को तेरे संजोकर मैं उठता हूँ ख्वाहिशें है मेरी तुझमे डुब जाने की खोकर इश्क में हद से गुजर जाने की तस्वीर हो गया है तु मेरी जिंदगी की  वजह बन गया है तु साँसे भरने की खुद को खो-आया है अरसों बाद तु तुझमें खोकर मिट जाने का वक़्त है । तेरी मोहब्बत में कुछ करने का वक़्त है ।
सजाता है ख्वाब मेरा दिल तन्हाई में ना बिछड़ना मुझसे तु रुसवाई में बंदिशें तो जमाने की हम पर लगना है हाथ थामे तेरा फिर भी हमें चलना है तेरी बाँहों का घेरा हमारे लिए महफूज हो गया तेरे साथ गुजरा हुआ हर पल अजीज हो गया तोड़कर बेड़ियाँ आ-गया है मुद्दतों बाद तु तेरे अरमानों को पुरा करने का वक़्त है । तेरी मोहब्बत में कुछ करने का वक़्त है ।       .....कमलेश.....

इंसानियत

भावनाओं को समझना
किसी का हमदर्द होना
होते जुल्म को रोकना
हो सके तो मदद करना
परिभाषा है यही शायद
इक लफ्ज 'इंसानियत' की ।

दिखाई नही पड़ती आज
पहले जैसी कोई बात
मानव,मानव को मारे
अपनो ने दिए दर्द सारे
भावनाओ की कदर नही
मिलती जो दौलत कही
बनने चला है सिकंदर
अपनी रुह का कत्ल कर ।
रोती है वो मूर्तियाँ भी
मंदिर मजारों में जो है
के पत्थर होकर उनमे
लोगों को विश्वास जो है
जीती जागती यह आत्मा
बन गई है आततायी
करके विनाश इंसानो का
इंसानो की दुनिया बनाई ।

जिन्हे पुजा पूर्वजों ने
वो तो जानवर भी है
अपने स्वार्थ में इसको
उन मूकों की प्यास भी है
काँपती है रुह उनकी
जो हमसे ना कह पाते है
करके इन मासूमों पर जुल्म
खुद को इंसान् बतलाते है ।
खो गई है वो परिभाषा
आविष्कारों की आग में
ढह गया है वो इंसान
दौलत की इस बाढ़ में
इक आस की ज्योति पर
जलती है इस दिल में
लौटकर आएगा फिर वो
मानवता के मधुबन में ।
                    .....कमलेश.....


नोट : जानवरों की पुजा से गोवंश की ओर इशारा किया गया है ।

देशभक्ति

चित्र



मैंएकऐसीभावनाहूँ
जोसिजनेबलहै,
वोअवस्थाजोकभीकभार
लोगोंकेदिलोंमेंआतीहै,
कहनेकोमेराकदबहुतऊँचाहै
परन्तुमेराअस्तित्व
यातोसरहदपरसैनिकोंमेंहै
याफिरकुछभलेदेशवासियोंमें|

सालमेंएकदोबारसारेलोग
मुझेअपने

ईश्वर - एक परम सत्य

चित्र
एक रचना इस सृष्टि के निर्माता को लेकर, जिससे आज की दुनिया मे हर शख्स बहुत दुर जा चुका है ।
इस कविता से आपको हकीकत से अवगत कराने का प्रयास किया गया है ।