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अँधेरे में तुम

तराशता है जुगनू अपने पंख रात की ख़ामोशियों से, फिर ढलक जाते हैं किसी की पलकों से आँसू जब रात सीढ़ियाँ चढ़ रही होती है। मेरे शहर के कंधों पर वज़न बढ़ जाता है रात के होने का, जब तुम देख...

जब इश्क़ उतरने लगता है

उनींदी आँखों से सपने चूती उम्मीदें जब तकियों पर सिर पटकते हुए, अपनी मौत का रोना रोते रोते थक जाती है; तब बिस्तर की सिलवटों की ज़ंजीरें ख़ामोशी में चीख़ती बातों को, वैसे ही निगल ...