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देश और मौतें

कोई सत्तर बरस पहले
गोडसे ने खुद को मार लिया था,
तब लोग मिठाइयां बांट रहे थे
और कर रहे थे जान बूझकर
अनजान होने की कोशिश ।फिर शुरु हुआ मौतों का दौर
साल दर साल
लोग मरते रहे,
कभी धरम, तो कभी
ग़रीबी, बेरोज़गारी
और देश के नाम पर,
पर सबसे ज्यादा आहत किया
सियासत ने
जब वह कुछ मौतों पर
जश्न मनाती रही,और
ये भूल गई कि
जो मौतें होने से बच गईं,
अब बेसब्री से इसकी ओर
टकटकी लगाए बैठी है ।सुनो गांधी,
तुम अकेले नहीं मरे थे
तुम्हारे साथ मर गई
असंख्य संवेदनाएं,
असंख्य चेहरे,
और शहीद हो गया
उस दिन,
एक देश भी ।
              - कमलेश

पसंद और इश्क़

पसंद होना ना होना
दोनों जायज़ है,
जैन-दर्शन के
स्यादवाद की तरहा ही
पसंद भी कुछ पूरी कुछ आधी
सब की ज़िन्दगी में ज़रूर होती है ।पसंद में एक-ही वक़्त पर
अपनी ख्वाहिश को
बताया और छुपाया जा-सकता है,
पसंद और यूनानी दार्शनिक
हेरक्लीटस के सिद्धांत
एक-जैसे हैं,
संसार में किसी भी वस्तु का
अस्तित्व होकर भी ना होना
हेरक्लीटस के लिए सच्चाई है,
मानवीय जीवन में
भावनाओं के संदर्भ
उसको पसंद कहा जाता है ।लेकिन यही पसंद
जब अनंत होने लगती है,
तो वह अनेग्जीमेण्डर का
सृष्टि-सिद्धांत बन चुकी होती है ;
जिसका कोई ओर होता है ना छोर
बस वही सर्वत्र बन दिखती है,
इतनी प्रचंड की
उसे नाम भी नहीं दिया जा सकता,
कोई पसंद गर अनाम हो जाए तो वह
फूल-भँवरे वाला इश्क़ हो जाती है ।और उसी इश्क़ को लेकर
आज तक बहस है, वैसे ही
जिस तरह हेरक्लीटस और अनेग्जीमेण्डर
के सिद्धांतों को लेकर तकरारें है,
पसंद और इश्क़ को लेकर
मेरी दरकार कुछ इस प्रकार है कि
पसंद-इश्क़ के इस विवाद पर,
तुम पूर्ण विराम लगा दो
मेरे सीने से लिपटकर ।
                             - कमलेश

सृजन

मत पूछो मुझसे
कि जो हुआ
वो सही था या ग़लत,
मेरे बस में कुछ था ही नहीं
पता नहीं सब कैसे हुआ
और फिर होता चला गया ।तेरे होठों की शबनम सा
कोई जाम नहीं जहान में,
मेरे लबों और
तेरी गर्दन के तिल की मुलाक़ात
मुझे हमेशा याद रहेगी,
वो महक तेरे वक्षस्थल की
अब मेरे सीने से रोज़ आया करेगी,
मत करना ये सवाल
कि क्या पाया मैंने तुझमें ?
शायद वही जिसके पीछे
पूरी क्वांटम फिजिक्स पागल है ।तेरी क़मर और मेरे हाथों की उंगलियां
अब इक-दूजे को जानने लगी हैं
हमारे पैर अब मुलाक़ात के लिए
किसी परिचय के मोहताज नहीं,
सृजन की सबसे उत्कृष्ट प्रक्रिया में
जब कोई शामिल होता है,
तभी जान पाता है कि
किस तरह दो जीवन
हर क्षण हर क़दम
अपना जीवन समर्पित कर,
अदम्य साहस से अनगिनत
कष्टों का आनंद पाकर
सृजित करते हैं एक और जीवन ।तेरा मधुर आलाप और
मेरे सांसों से घीरे
उन अनेकों स्वरों की ध्वनि का,
कराहटों और रहस्यमयी खुशबूओं का,
मर कर भी अमर होने का,
तमाम बातों को और
सृजन के इस हवन का मर्म,
ईश्वर को भी हासिल नहीं ।
मत चाह रखना कि
तुम समझ सको सृजन को,
यह रचनात्मक अद्वैत है,
इसको समझने की
सारी कोशिशें व्यर्थ ही होंगी ।
    …

ज़रूरत नहीं

खुशियों के बहानों को तुम्हारे
तुम्हें भुलाने की ज़रुरत नहीं,
हंसी के अंदाज़ को अपने
छुपाने की ज़रुरत नहीं ।
जैसी ज़िन्दगी तुमने गुज़ारी है अब तक,
वैसे ही आगे जियोगी तो बेहतर होगा
इस घर में आकर
खुद को बदलने की ज़रुरत नहीं ।चाहो तुम अगर दो पल सुस्ताना
अपने काम की व्यस्तता में,
तो स्वागत है तुम्हारा
लेकिन मायूसी की इजाज़त नहीं ।
हो जाये गर जो कभी तुम्हारी ख्वाहिश
अपने बचपन को जी लेने की,
तो बेझिझक बच्ची हो जाना
तुम्हें किसी की इजाज़त की ज़रुरत नहीं ।माना की बंदिशें होंगी
पर चिंता की कोई बात नहीं,
कभी भूलकर सब कुछ
खोना भी चाहोगी कहीं,
तो उस लम्हें के लिए
किसी से डरने की ज़रुरत नहीं ।
जानता हूँ मैं खुद भी
के बड़ा कठिन होगा,
वैसे ही जी-पाना
जैसे अभी जी रहे हैं हम,
निश्चिन्त रहना पर तुम
बाद में भी हमारी ज़िंदगी में,
दखलअंदाजी के लिए होगी
किसी को भी इजाज़त नहीं ।
जैसी ज़िन्दगी तुमने गुज़ारी है अब तक,
वैसे ही आगे जियोगी तो बेहतर होगा
इस घर में आकर
खुद को बदलने की ज़रुरत नहीं ।।
                                     -- कमलेश

घूमते हुए

जरूरी नहीं कि हमारे आसपास की हर चीज सही हो, कुछ परिस्थितियां होती है जिनमें हमें खुद को उनके अनुरूप या उनको हमारे अनुकूल बनाना पड़ता है । अक्सर हम ये मान लेते हैं कि परिस्थितियों के अनुकूल हो जाना ज्यादा ठीक रहेगा लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि वर्तमान समय के जाने कितने ही मुद्दे और समस्याओं के अनुरूप हम खुद को एक क्या पूरे दस जीवन में भी नहीं ढाल सकेंगे । जब भी कभीघुमने निकलता हूँ तो कुछ मुद्दे अनायास ही मुझे आ-पकड़ते हैं और मैं उनसे उलझा रहता हूँ, उनसे निरंतर, हर बार, हर सफ़र पर झगड़ते हुए इतना तो समझ आता है कि अगर हर व्यक्ति केवल खुद गंभीर होकर बस एक दफा उनका ख्याल करे तो यह तय है कि इन समस्याओं का एक आम समाधान निकल सकता है । यह समाधान चाहता है कि “शुरुआत जो भी हो स्वयं से हो अन्यथा न हो”, वैसे देखा जाये तो आज के समय में ऐसे मामले गाँधीवादी विचारधारा से अत्यधिक सरलता से सुलझाये जा सकते हैं बजाय कि इन्हें व्यर्थ मतलब की आंच पर सेंकने के ।
                                                          पर्यावरण के मामलों में गाँधी कहते हैं कि "यह पृथ्वी जितनी हमारी है उतनी ही बाकी जंतुओं क…