पोस्ट

अक्तूबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ख़ामोश

जुबान तुम्हारी काटना किसी के बस का नहीं, मगर फिर भी तुम चुपचाप तमाशा देखते हो । यह जो आजकल बहुत बोलता है ना, एक रात यही कतर जाएगा तुम्हारे कान; और फिर तुम सब ख़ामोश हो जाओगे ।                                                           .....कमलेश.....

कुछ तुमने कुछ मैंने ...

दर्द के किस्से सुनाए कुछ तुमने कुछ मैंने, फिर सिसकियाँ सुनी कुछ तुमने कुछ मैंने । सारी तकलीफों की नुमाइशें करते करते, कई आँसू भी गिराए कुछ तुमने कुछ मैंने । देखा जब ज़ख्मों का लबादा इक दूजे पर, तब मरहम भी लगाया कुछ तुमने कुछ मैंने । दूरियों का ज़हर पीते रहे इतने वक्त से हम, रात भर अमृत ही पीया कुछ तुमने कुछ मैंने । लरज़ते होंठो पर सुखा पड़ा जब लफ्जों का, तब प्रेम को बरसाया कुछ तुमने कुछ मैंने । जिस्मों की आरजू के अनायास मिट जाने पर, रुह को ढूंढने की कोशिश की कुछ तुमने कुछ मैंने । बेड़ियों को तोड़ दिया हमने इस मुलाकात में, परिभाषा बदली इश्क की कुछ तुमने कुछ मैंने । जाने कितनी दफ़ा बिखरे इक रात में हम, लेकिन समेटा खुद को कुछ तुमने कुछ मैंने । कितने ही लम्हें बिताए थे मिलकर  हमने, फिर याद बना लिए कुछ तुमने कुछ मैंने ।।                                         .....कमलेश.....                                       

उम्मीद

एक उम्मीद जब वह दिखे, तुमको किसी मासूम की आँखों में, तो कोशिश करना कि तुम उसे हौसला दे सको । दिख जाए तुम्हें जब वह, किसी के लाचार चेहरे पर चाह रखना कि तुम, मान रख सको उसका । इस तरह दूसरों की ख्वाहिश को महज़ तवज्जो देकर, मैं तुमसे खुश हो जाऊंगा जब तुम खोज लोगे ऐसी ही एक उम्मीद लेकिन खुद में, जो ऐसी हो कि परिभाषा के विपरीत बिना टूटे पूरी हो जाए ।                           .....कमलेश.....                          

पाँच कवितायें

1. हिंदी - वर्तमान समय में मातृभाषा हिंदी के हालात को देखते हुए, ऐसा लगता है कि हमारी भाषा को अब एक अदरक वाली, कड़क चाय की ज़रूरत है ।                           2. तीन, दो, पाँच - पिछले कुछ समय से, ऐसा लगता है कि ज़माना और मैं, तीन, दो, पाँच खेल रहे हैं । हर बार मैं अपना सेट पूरा करता हूँ, फिर भी कुछ ना कुछ उधारी, ज़माने की बाकी रह ही जाती है ।                                  3. गुनाह - गुनहगार वे लोग नहीं है जो किसी को धोखा देते हैं, उन्हें पिला दी गई होगी, सिर्फ एक बेस्वाद चाय ।                    4. तुम - कुछ दिन दूरी पर रह जाने से तेरे, हो गया है फिर इश्क मुझे, लेकिन इस बार चाय से । परिभाषा लेकिन अब भी वही है इश्क की ''तुम''।                     5. दुनिया - सोने के बाद जागने से पहले दुनिया मेरी, तुम होती हो केवल । अकस्मात मधुर स्वर तुम्हारे प्रेम का भेद कर मेरे स्वप्न को, खींच लेता है फिर से हकीकत में, अकिंचन होकर भी जहाँ तृप्त हो जाता हूँ मैं ।                    .....कमलेश.....

प्रतिक्रिया

तुम सब चाय को और अच्छा बनाने के लिए, नमक का प्रयोग करते हो, मैं नहीं करता । किसी के घाव पर नमक छिड़कना, अच्छी बात नहीं है । चाय का ऊबलना एक दर्द भरी प्रकिया है, और तुम नमक डालकर कर, व्यक्त कर रहे हो, प्रतिक्रिया उस प्रकिया पर । प्रतिक्रिया व्यक्त करना, किसी चाय के ऊबलने की प्रक्रिया में, खलल डालने के समान है ।                                       .....कमलेश.....                                      

रोशन चेहरों की आँखों में

रोशन चेहरों की आँखों में भी, एक रात दिखाई देती है । इन सन्नाटों में भी अक्सर, मुझको आवाज सुनाई देती है ।। हर खामी का ठीकरा तु, दूसरों के सर पर ही फोड़ता है । इल्जाम लगाने के तेरे अंदाज में, साजिश दिखाई देती है ।। दर्द इतना गहरा हो चूका है, ज़माने की इन खरोंचों का । देख कर जख़्म लोगों के, बदलियाँ भी आँसू बहा देती है ।। इतने ज्यादा आश्वासन और वादे, किसी की भूख मिटा भी दें । लेकिन बेमुरव्वत मुफ़लिसी, आखिर सर उठा ही लेती है ।। तु कितने भी तरीके अपना, औ' प्रतिभावान को वंचित कर । कला है यह कलाकार की, अपने झंडे तो गाड़ ही देती है ।। वक्त रहते भी अगर कोई, कुछ मसले हल ना कर पाए । तो आवेश में आकर खुद, किस्मत ही खेल बिगाड़ देती है ।।                                                   .....कमलेश.....

मैं

मैं वह नहीं, जिसके साथ तुम बाँट सको अपने ग़म, जिसको दिखा दो तुम गुज़रे हुए पल । मैं वह भी नहीं, जिससे तुम : उम्मीद रखो कि मैं तुम्हारी उम्मीदें पूरी करुंगा, जिस पर तुम्हें गर्व हो और तुम कहो कि मैं तुम्हारा फलाना लगता हूँ । मैं वह हूँ ही नहीं, जिसको तुम समझा पाओ तुम्हारे जीने के तरीके, जिसे मना सको तुम एक दफा रुठ जाने के बाद । मैं वह भी नहीं, तुम कह दो जिसे अपने दिल का हाल, माँगने का हक हो तुम्हें दो पल का साथ । मैं कदाचित् वह नहीं, जिसकी आजादी छीनकर तुम यह सोचने लगो कि, तुम कतर चूके हो पंख मेरे; याद रखो पंखों को जंग नहीं लगती । मैं वह नहीं, तुम बिठा सको जिसे अपने खुशरंग जीवन में, जिसे सुना सको तुम दुनिया भर के किस्से ।   जो तुम्हारी भाषा नहीं बोलता जो तुम्हारे दिमाग नहीं पढ़ता, जो तुमसे एक निश्चित दूरी पर रहता है, जो तुम्हें देखता ही नहीं, सिर्फ और सिर्फ वह ही हूँ मैं केवल मैं ।                        .....कमलेश.....

सच्चाई

मैंने देखी ग्यारह साल की ढोलक, और छः साल की बेक फ्लीप । ऐसा लगा कि जाकिर साहब और टाइगर श्राॅफ ने, व्यर्थ ही कर दिया जिंदगी को क्योंकि यह दोनों पूरी दुनिया को प्रशिक्षण दे सकते हैं । उसकी हर थाप में सुनाई देती है असंख्य संभावनाएं, और हर बेक फ्लीप ने दर्शन करवाया सारे खेलों का । मैं बस में था फिर भी, मेरे रास्ते खुले हुए थे ; वह थे चौराहे पर लेकिन सारे रास्ते बंद ।                 .....कमलेश.....

रात की खूबसूरती

रात की खूबसूरती में कुछ खोटा लगता है, तारों   की  आँख से  कुछ  टूटा लगता है । सूरज उगता तो है तेरी यादें साथ लेकर, मगर शाम को ढलने से मुकरने लगता है । होंठो पर ग़ज़लें तो है गुनगुनाने को मगर, बिन तेरे मतला ही मुझे अधूरा लगता है । बीती यादें और खुशियाँ  मुँह  चिढ़ाती है, तन्हाइयों का मेरे शहर जब मेला लगता है । तड़प रही है बाहर आने के लिए अब नज़्में, लेकिन कलम और दिल का झगड़ा लगता है । जुदा हो गया मुझसे तेरे साथ गुज़रा वक्त भी, तेरे साथ  ही  फिर  वापस आएगा  लगता है ।                                            .....कमलेश.....

पूछना

तुम्हारा यह सवाल करना कि तुम कवितायेँ कैसे लिखते हो ? उतना ही स्वाभाविक है जितना कि तुम्हारा, एक गोलगप्पे वाले से पूछ लेना कि कैसे वो इतने अच्छे गोलगप्पे बनाता है ? इस सवाल का जवाब भी, उतना ही सरल है जितना कि तुम्हारा इस सवाल को पूछना कि कवितायेँ कैसे लिखते हो ?  जब तुम इन सवालों की सरलता में उलझकर, फिर सवाल कर बैठते हो कि क्या कवि हमेशा सच कहता है ? यह पूछना उतना ही तर्कहीन है जितना कि सुबह सुबह, दूधवाले से यह प्रश्न करना क्या दूध में पानी मिलाया गया है ? दूध का दूध और पानी का पानी सोचते समय, तुम फिर पूछ जाते हो कि क्या कविता सोचकर लिखी जाती है ? यह संशय उतना ही अर्थहीन साबित होता है जितना कि एक प्रेमी का, प्रेमिका को चूमने से ठीक पहले, इस बात को सोचना कि चुम्बन कैसे होता है ?                       .....कमलेश.....

कविता

कुछ चेहरों को सच दिखाने पर, लोगों की आईने से लड़ाई हुई है । दरिया में डूब जाने पर मेरे, शहरों में महफिल सजाई हुई है । संभल कर रास्तों पर कदम रखना, बारुद जमाने ने शिद्दत से बिछाई हुई है । जिंदगी तो है बस जन्म से मृत्यु ही, जन्नत की अफवाह वैसे ही फैलाई हुई है । खिलौने गुम हो गए भागते भागते, जिंदगी बस खेल के लिए बनाई हुई है । उम्र पर बंदिशें मत लगाइए साहब, सुना है बच्चे की अर्थी सजाई हुई है ।                               .....कमलेश.....