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प्रेम-पीयूष

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मैं खोजता फिर रहा था बीते कुछ महीनों से अपने क्लांत मन के व्यग्रभावों में शांति, जो मुझे कई सालों से भी लम्बे प्रतीत हुए. अपनी तमाम बारीकियों और निर्लज्जता के साथ संसार करता रहा अनवरत ढंग से मेरे धैर्य और सीमाओं की परीक्षा: जिसका परिमाण मैं नहीं जानता. इन दुविधाओं के बीच से गुजरती राहों में एक दिन जब तुम्हारे समीप से गुजरी बयार मुझ तक आयीं तो अंतस ने एक ठहराव जान ख़ुद को रोक लेने का निर्णय लिया; वह सही है या नहीं इसे सोचने के लिए अब वक़्त नहीं. जीवन के चिर-सन्नाटे के स्पंदन में सुनी मैंने आँखों में गूँजती आहटें और देख पाया तुम्हारे नयन कलशों में भरे असंख्य प्रश्न जो मेरे अपने थे. तुम्हारे साथ मैं मौन में भी एक अविरल संवाद पा जाता हूँ और हर बार यह जान कर हतप्रभ रह जाता हूँ कि कितना कुछ छुपा है तुम्हारे अस्तित्व के उपवन में!

तुम्हारे संग मैंने खोजी अपने अस्तित्व की नई शाखाएँ. तुम्हारे लहराकर उलझते केशों ने सुलझाई मेरी अनगिनत पहेलियाँ और एक धुरी पर घूमते मेरे अकिंचन सपनों को मिला तुम्हारे अधरों से प्रेम-पीयूष. विशिष्ट सी महसूस होती कुछ संकोच की दीवारों का कंचुकी के स्वतंत्रता पाने के साथ ही…