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फिर...बारिशें थम गईं

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Source - Pexels.com ए क रोज़ सूरज वैसे ही उगा जैसे हर रोज़ उगता है लेकिन आज सूरज यह नहीं जानता था कि आज कोई उसकी किरणों की गर्मी को ठंडा कर देगा , कोई है दुनिया में जो उसकी तरफ उतनी शांत नज़र से देखेगा कि उसकी ऊष्मा ख़तरे में भी आ सकती है। प्रेम ने आज सुबह उठकर अपने व्हाट्सअप से पिछले महीने शुरु हुई एक कहानी को आगे बढ़ाने के लिए अपनी नई दोस्त को अपना पिछले दिनों लिखा एक छोटा सा लेख पढ़ने के लिए भेज दिया और सूरज की तरफ अपनी नज़रें उठाई। ख़ुशी ने दूसरे दिन शाम को लेख पढ़कर अपनी प्रेम और खुशियों से सरोबार प्रतिक्रिया व्यक्त की , जिससे दोनों ही भावविभोर हो गए। ख़ुशी की प्रतिक्रिया के पीछे छुपे कारणों और उम्मीदों को प्रेम ने ख़ुशी की न बोली गई बातों से सुना और हर रोज़ उसे एक कविता सुबह की शुभकामनाओं के साथ भेजने का निर्णय ले लिया। ख़ुशी को यह पहल शायद उतनी ही ज़रूरी लगी जितना कि साँस लेना , वह प्रेम से उसके लेखन के बारे में बातें करने को हमेशा उत्सुक दिखी और दोनों आये दिन अपने अनुभवों को एक दुसरे के साथ साझा करते रहे। इसी सिलसिले में एक दिन प्रेम ने अपनी एक कहानी उसे भेजी जिसकी उसे उस वक़्त भेजने क...

किसान

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Source - IndiaTv पहली बरसात में भीगी माटी जान से भी ज्यादा प्यारी होती है उसे, जब स्कूल से बेटी के लौटने पर उसका माथा चूमता है वह, वैसे ही चूम लेता है खेत को। चाँद के ग़ुम हो जाने पर छाया सूनापन उसके होंठो से दिखाई पड़ता है, हर दफ़ा जब फैक्ट्रियाँ उसके हिस्से की बारिश और सर्दी छीन लेती है, वह चाहता है इतना कि एक चादर में उसके दोनों बच्चे चैन से सो सकें। परेशान जब हर तरफ से हो वह निकलता है अपने हक़ के लिए, बाज़ की तरह झपट पड़ते हैं सारे ठेकेदार उस पर, शायद वो नहीं जानते रोटी गेहूँ से बनती है; उसने नहीं भरा धान ज़रुरत से ज्यादा कभी भी अपनी कोठरी में, नहीं बहाया पैसा कभी ही फिज़ूल। एक मैना ढूंढ रही है वीराने में अपने घोंसले के लिए एक पेड़, वो ढूंढता है अपनी खोई आवाज़ जिससे उसे उम्मीद है कि वह पेड़ के झूले की रस्सी को, फंदे में बदलने से रोक लेगी।                                - कमलेश *जरूरी है कि अब हम अपने खाने के...

सावन

बारिश अपने शबाब पर है बादलों ने कपड़े उतार फेंके हैं, नदियों ने अपनी हदें पार कर किनारे पर बसे कुछ गांवों की, इज्ज़त पर हाथ मारना शुरू कर दिया है । मैं बेबस हूं उस गांव सा जिसक...

इबादत

बेवक़्त की बारिश ने आज सारे ज़ख्मों को धोया, बदलियाँ स्वागत में जुटी है, हवाओं ने अभी अभी एक ख़त पहुँचाया, जिसे आसमान ने चीख-चीखकर पढ़ा, ख़बर है कि तुम आने वाले हो । इतनी जल्दी भी क्या है वैसे ? मुझे तसल्ली से नशा करने दो इस जवान होते इश्क़ का, देख लेने दो जी भरकर इंतज़ार में तड़पते रिश्ते को, जान लेने दो मुझको ख़्वाबों में छिपे सब राज़ । खोद लेने दो एक खूबसुरत कब्र प्रेम में मौत के बाद, सुकून से दफ़न होने के लिए । तुम्हें पसंद है हवाओं की सादगी, और मुझे मोहब्बत है बेगानेपन से; तुम्हारी हसरत है बाद बारिश के साथ मेरे शामें गुज़ारने की, मैं चाहता हूँ कि आसमां रोता रहे उम्रभर ज़मीन से अपने इश्क़ में । कितनी अजीब है हमारी इबादत की तरकीबें ? तुम सवेरे-सवेरे खोजती हो घर में पूजा का कोना, मैं सुबह इबादत की बजाय तुम्हारे साथ चाय पीना चाहता हूँ ।                                   -- कमलेश