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उन दिनों की दीवारों से -

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ज़िन्दगी बिना दीवारों का एक कमरा है. ताउम्र ख़्वाबों को खोजते खोजते यह महसूस होता है कि हर कोई बस बाँध लेना चाहता है लेकिन यह अधूरा सच है. पूरा सच है कि जितनी बार मुझे लगा कि मुझे बाँधा जा रहा था उतनी ही बार मैं अपनी आज़ादी को और क़रीब से देखकर उसके लिए अपना रास्ता तैयार कर रहा था. चलते चलते न जाने कब कुछ दीवारें मुझे इतनी भा गई कि मैं उन्हें महसूसने के लिए बार बार लौटता रहा. ऐसा नहीं था कि मुझे बंदिशें भाती थीं पर मैं उन दीवारों का शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने मुझे उस वक़्त में सुना जब मेरे क़रीब किसी के कान नहीं थे, उन्होंने मुझे उस वक़्त देखा जब मैं अकेले घुटनों में सिर देकर रोता रहा लेकिन वे नि:शब्द सी मेरे कन्धों पर हाथ रखे मुझे एहसास कराती रही कि वे मेरे साथ हैं चाहे फिर कुछ भी हो और एक दिन मैंने अपनी आज़ादी चुनी उनकी कीमत पर. शायद यही इंसान के ख़्वाबों की नियति होती है कि जिस अँधेरे ने उसे सब कुछ सिखाया होता है वह उसी की कीमत पर अपनी रौशनी हासिल करता है.               मैं दुनिया से दूर जब अँधेरी रातों में तारों की रौशनी के साथ अपनी ख़ामोशी और अ...

आभार, ज़िन्दगी और मैं -

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हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां हर कोई अपने जीवन में किसी न किसी चीज का पीछा कर रहा है। एक स्थान से दुसरे की ओर बढ़ने की इस यात्रा में हम अपनी भावनाओं , जरूरतों , लालच , आकांक्षाओं और अन्य कई चीजों के साथ काम करते हैं , जिसके परिणाम में हम आनंद , खुशी , तनाव , दुःख , दबाव , क्रोध , शांति , दोष , कृतज्ञता जैसी कई सारी भावनाओं को महसूस करते हैं। मैं कुछ साल पहले स्वामी विवेकानंद को पढ़ रहा था , उन्होंने अपने एक भाषण में कहीं उल्लेख किया था कि दोषारोपण का खेल खेलने के बजाय हम एक बार ठहर कर यह देख सकते हैं कि हमारे भीतर से निकलने वाली हर चीज का स्रोत क्या है! यह विचार मुझे बहुत ताकत देता रहा जब मैं अपनी सीमाओं को पार कर रहा था और लोगों की कहानियों के साथ अपने व्यक्तिगत विकास के लिए एक रास्ता खोज रहा था। दो साल पहले एक आवासीय कार्यक्रम के दौरान , मुझे आभार व्यक्त करने की ताकत का एहसास हुआ कि यह उस दुनिया में जादू कैसे पैदा कर सकता है जिससे हम जीना चाह रहे हैं!                    ...

खुशियों का रास्ता

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खुशियों का रास्ता दिल की राहों से होकर जब घर की दहलीज़ पर पहुँच जाए तो लगता है कि ज़िन्दगी में ठहराव और प्रेम एक साथ जिया जा सकता है. वक़्त से कोई कितना कुछ माँगेगा जब वह अपने मूल्यों पर जीते हुए वे सारे सवाल और रिश्ते सुलझा ले जिनसे जीवन के रास्ते छाँव और सुकून से भर जाया करते हैं. मैं पिछले महीने दीवाली के लिए घर पर था और यह मेरी दिल्ली आने के बाद की सबसे लम्बी घर पर बिताई हुई छुट्टियाँ थीं। इस बार जब मैं घर पहुँचा , तो कुछ ऐसा था जो मुझे हर क्षण कहता रहा कि यह समय ख़ास है और मैं इसे और अधिक सुंदर बना सकता हूँ वह भी मेरे प्रेम और समर्पण के तरीकों से. इस दफ़ा यह पहली बार हुआ कि मैंने अपने परिवार के लगभग सभी सदस्यों के साथ यादगार बातचीत की , चाहे फिर वह मेरी पापा के साथ हुई बातचीत हो या मम्मी या भईया-भाभी के साथ जीवन यात्रा के किस्से सुनना और सुनाने वाला समय. सब कुछ इतना सहज और सुन्दर था कि सिर्फ वक़्त के बहाव में पूर्णता के साथ संतुष्ट कर देने वाले स्तर तक स्थापित हो गया. एक बात मैं जीवन के इस पड़ाव पर अपने प्रेम की ताकत के साथ स्वीकारना सीख गया हूँ कि एक समय ऐसा भी रहा है जीवन में जब...

मुलाकातें, यात्रा और प्रेम

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मुलाकातें हमेशा ही खूबसूरती की नींव रखती है. तकरीबन ३ सालों के बाद राहों ने मुझे इंदौर की गलियों से रूबरू करवाया और दिल की तमाम ख्वाहिशों का ज़खीरा अपने पूरेपन के एहसास में खोकर लौटा. पिछले ३ साल मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से काफी अहम और प्रेरणादायी रहे हैं, जितना कुछ इन वर्षों ने दिया है वह अमूल्य है. इन राहों के सफ़र में कुछ दोस्त अपनी राह पर चलकर इस खूबसुरत शहर आ चुके थे, जिनसे मिलने की फिराक़ में मैं यहाँ पहुँच गया. दोस्तों के साथ बैठकर अपने और उनके जीवन की यात्रा के बारे में जानना और उनके अंतर्मन को सुनना मेरे लिए एक नए आसमान के द्वार खोलने जैसा अनुभव रहा है. चाहे फिर रिंग रोड पर विवेक और गजेन्द्र के साथ काम और व्यक्तिगत जीवन की बाते हों या फिर उनके जीवन के ३ वर्षों में बीते हुए वसंत का किस्सा: गजेन्द्र और विवेक को ३ सालों के बाद मिलना और उनमें आये हुए बदलाव का साक्षी बनना मेरे लिए सौभाग्य से कम नहीं है. ऐसी मुलाक़ातें वक़्त को कीमती बनाती हैं.   नवोदय के साथी रहे शिवपाल, जितेन्द्र और ईश्वर के साथ का वक़्त अपनी अलग छाप रखता है और यह एहसास एक सुकून देता है कि साथी अपने दिल की...

ज़िन्दगी और प्रेम की जोड़ी

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जब ज़िन्दगी की शुरुआत होती है, तब हमारे पास अपने रिश्ते चुनने का कोई विकल्प नहीं होता, लेकिन ज़िन्दगी के रफ़्तार पकड़ने के बाद भी शायद हमारे पास वह विकल्प नहीं होता. अटपटा लग सकता है सुनने में लेकिन हकीक़त यही है कि हम कोई भी रिश्ता नहीं चुनते अपनी ज़िन्दगी में, रिश्ते हमको चुनते हैं उनको जीने के लिए.                                                   भावनाओं का समंदर कितना गहरा है कोई नहीं जानता फिर भी सब डुबकियाँ लगाते हैं, हम नहीं जानते कि हमारी एक मुस्कान या एक शब्द किसी के जीवन में क्या बदलाव ला सकता है. ज़िन्दगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन जितना कुछ इसके साथ रहकर सीखा है वह बहुत कमाल का है. रास्ते अपनी पहचान हमसे तब तक छुपाते हैं जब तक हम समर्पण न कर दें और समर्पण का पौधा विश्वास के बीज के बिना कभी भी नहीं उग सकता. विश्वास और समर्पण जब एक-दूजे में समाते हैं तब प्रेम पैदा होता है और प्रेम अपने कई स...

कविता १ (मिलन)

कुछ इंतज़ार के लम्हें भटक रहे थे मेरे इर्द गिर्द, तुमने आकर उनको पूर्णता दे दी। मैं स्थिर हो चला हूँ अपने वक़्त में, तुमने अपनी उपस्थिति से मेरी स्थिरता को ठहराव दिया। हम नही...

ज़िंदगी

मैंने देखा एकटक आसमान को, तो एक सितारा उतरकर मेरे साथ चलने लगा। रास्ते में मिल गई थी कुछ परछाईयाँ, ठहरा वहाँ तो वो रिश्ते बनकर साथ आ गईं। पलकों पर रहते थे कुछ जज़्बात हर पल, अब व...

खुशियाँ, हम और दुनिया

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आकस्मिक चीज़ें जितनी खुशियाँ देती है, वह खुशी निर्धारित चीजों से कभी नहीं मिल पाती। 2 नवंबर को मिले एक व्हाट्सअप मैसेज ने पिछले 5 दिनों में जितनी खुशियाँ, हँसी और यादें दी हैं वह मुझे ढूँढने पर तो कभी भी नहीं मिलती।                              मैं पिछले दिनों दीवाली पर घर गया था वहाँ प्रदूषण, न्याय और राजनीति जैसे मुद्दों पर काफी चर्चा का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला, क्योंकि ये चर्चा युवा दोस्तों और गाँव के लोगों के बीच बैठकर हुई। ऐसी घटनाओं से यह विश्वास और भी गहरा जाता है कि बदलाव किया जा सकता है और वह भी लोगों के साथ मिलकर, युवा दोस्तों में बहुत ऊर्जा है जिसका उपयोग वह सही दिशा में करना चाह रहे हैं, मार्गदर्शन जिस तरह अपने सहयोगियों से मुझे मिलता रहा है यह कवायद अब गाँव में भी शुरू हुई है कि जिस किसी को भी कोई सहयोग चाहिए वह सबसे संपर्क स्थापित करे ताकि समय पर काम हो सके। गाँव की बदलती हवा ने मुझे अपने सपनों और ज्यादा दृढ़ता से देखने की हिम्मत दी है।    ...

मुस्कुराहट और तुम

मुस्कुराहटों का मोल नहीं लगाया जा सकता, जब तक यह हमारे होंठो पर रहती है मन तृप्त रहता है । मुस्कान ज़िंदगी में बेवजह ही रहे तो अच्छा है जैसे कि तुम्हारे होंठो पर होती है मानो ...

ग्राम्य मंथन - आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया का आरंभ

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"कुरपेच है राहें जीने की किस्मत इक टेढ़ी बाज़ी है, तुम हाथ पकड़ लो इरादे का राह सीधी है अगर दिल राज़ी है ।" गुलज़ार साहब की ये पंक्तियां ज़िन्दगी की परिभाषा के साथ ही उसे जी लेने का तरीका भी बताती हुई प्रतीत होती है, जिस दुनिया में हम जी रहे हैं वहां इरादों की कमी नहीं है कमी है तो बस अपने दिल की आवाज़ को सुनने की, उसे समझने की । 28 प्रतिभागी और 13 टीम मेंबर्स जब इब्तिदा में अपने साथ लाए हुए तोहफ़े एक दूजे से बांटते हैं, तब लगता है कि हमारे पास कलेक्टिव रूप से काम करने पर कितनी क्षमता और प्रतिभा है जिसका हमें सही समय पर सही उपयोग करना है । ट्रस्ट फॉल में जब रजत बिना मुड़े अपने आप को कुछ घंटे पहले मिले 6 लोगों के हाथों में ख़ुद को पकड़ने के लिए 7 फीट ऊपर से गिरा देता है तब एहसास होता है कि हममें बाई डिफॉल्ट सभी पर विश्वास करने का कोशंट है जिसे हमने वक़्त के साथ छुपा दिया है । सौ ग्राम ज़िन्दगी में घेरे में बैठा हर शख़्स जब अपने आप को सबके सामने निर्भीक होकर खोलता है तो विश्वास और रिश्तों की मजबूती का पता चलता है जिसे हम दुनिया की भीड़ में खो चुके हैं । मेरे लिए अपनी...

सृजन

मत पूछो मुझसे कि जो हुआ वो सही था या ग़लत, मेरे बस में कुछ था ही नहीं पता नहीं सब कैसे हुआ और फिर होता चला गया । तेरे होठों की शबनम सा कोई जाम नहीं जहान में, मेरे लबों और तेरी गर्द...

ज़रूरत नहीं

खुशियों के बहानों को तुम्हारे तुम्हें भुलाने की ज़रुरत नहीं, हंसी के अंदाज़ को अपने छुपाने की ज़रुरत नहीं । जैसी ज़िन्दगी तुमने गुज़ारी है अब तक, वैसे ही आगे जियोगी तो बेहतर होग...

कोटा वृतांत

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४ मई २०१५, वो अपने पापा के साथ डकनिया तलाव रेलवे स्टेशन पर खड़ा था, ये भी नहीं जानता था की जाना कहा है । एक ऑटो वाले से पूछा “यंहा IIT की कोचिंग कहा है ?” ऑटो वाले ने जवाब दिया “कौन सी बिल्डिंग जाना है भैया ?” खैर उसने अपना बैग निकाला और देखा एक पुराने लैटर को जिसमे सबसे उपर CP लिखा हुआ था, लड़के ने कहा “जी CP ले चलो ।” ५मिनट के बाद वो अपने पापा के साथ CP TOWER में था । एडमिशन सेक्शन में जाकर उसने पूछा “ IIT JEE के लिए कहा एडमिशन होंगे ?’’ कुछ वक़्त बाद वंहा के हेल्पर ने उसे पूरी जानकारी दी और कुछ २ घंटे बाद वह भी कोटा का छात्र बन चूका था, उन १ लाख स्टूडेंट की लिस्ट में उसका भी नाम लिख चूका था जो यंहा हर साल सिर्फ कोचिंग करने आते थे । १० मई २०१५ ,          इंदिरा कॉलोनी का C -५१ मकान, फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरे में बैठा ये लड़का एक साल बाद खुद को IITIAN बनते देख रहा था । शाम को ५ बजे ओरिएंटेशन सेशन में जाकर डॉ. प्रमोद माहेश्वरी का आत्मविश्वास से ओतप्रोत भाषण सुनकर रात के ९ बजे अपने हाथ मेें 4 किताबे और होठ पर हलकी मुस्कराहट लेकर अपने कमरे पर पहुंचा,...