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अँधेरे से उपजता उजाला -

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  Source - ephotozine.com कभी ऐसा हुआ है कि आप अपनी ही धुन में चले जा रहे हैं और किसी ने आपको धक्का देकर झकझोर दिया हो? क्या कभी इस बात की तरफ ध्यान गया है कि जो उजाला आपकी आँखें इस दुनिया में देख रही हैं वह किन अँधेरे गलियारों से होकर आ रहा है? या यह महसूस करने का यत्न किया है कि जीवन में पल रही तमाम वेदनाएँ और नफ़रत एक मार्मिक चुम्बन के आगे कोई अस्तित्व नहीं रखती! मैंने अपने रास्तों के अनगिनत क्षणों में ख़ुद को ऐसी अवस्था में पाया है जहाँ से मैं सिर्फ अपना सुख और उसके इर्दगिर्द फैला अँधेरा ही देख पाता हूँ. यह सुख असीम स्वार्थ और उतनी ही वासनाओं में लिपटा होता है और पल-पल इसमें वृद्धि ही होती है; इसके विपरीत उजियारे के उस ओर पल रहे अँधेरी वादियों का जुगनू मुझे हर बार उसी गर्त में झटकने में मशगूल रहता है जहाँ से सिवाय पीड़ा के कुछ हासिल नहीं होता. तमाम उम्र आदर्शों के मुखौटे पहने रहते हुए ऐसा समय भी आया है कि मैंने अपने ही कई हिस्सों का अस्तित्व सिरे से नकार दिया है. घट चुके या घट रहे क्षणों को लिखना आसान तो नहीं है लेकिन उतना दुर्गम और अयोग्य भी तो नहीं!  जितनी बार मुझे जीवन में प्रेम के