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मेरा मन

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Source - Himachaldastak.com बरामदे का न होना कितना खलता है! यह बात एक ऐसे घर में रहकर जान पाया जहाँ बरामदा नहीं था. मेरा मन भी बरामदा तलाशता है जहाँ बिखरा जा सके, टहला जा सके और गीली हो चुकी बातों को सुखाया जा सके. बरामदे में होकर ख़ुद को टटोलना, इस कृत्य के लिए मेरे मन में अक्सर जगह कम पड़ जाती है; इतना कुछ है बाहर का जो सारी जगह हथिया लेता है लोगों के ख़याल, बातें, यादें, लोग और अंत में ख़ुद के लिए ख़ुद में कुछ नहीं बचता. ख़ुद को छोड़कर सब कुछ है मेरे मन में जिसे बाहर निकालते हुए मुझे एक असह्य दर्द उठता है जिससे डरकर में ख़ुद के पास जाने से रुक जाता हूँ. दुनिया जितने चक्कर लगाती है उसमें एक चक्कर मन का भी हो ऐसा मेरा मन चाहता है ताकि पूरे मन का कोना कोना घूमा जा सके और अन्दर पल रहा ताप दूर करने का जो भी जतन हो किया जा सके. मन का ताप हरने के फेर में दुनिया को बुद्ध, महावीर, राम, कृष्ण, ईसा, पैगम्बर और न जाने कितने ही रत्न मिले लेकिन मेरा मन उसे हरना नहीं चाहता यह तो बस उसे समझना चाहता है.      कमरे की खिड़की के उस पार एक लम्बी छत है जहाँ से अक्सर एक लड़की अपने आपको लगाये गये पंखो ...

वर्तमान भारत, गांधी और भगत सिंह

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बढ़ता है ये ग़ुबार क्यूं ? कैसा चलता यह कारवां ? ना आस कोई, ना साथ कोई, दिशाहीन पथ पर युवा, जिसने चाहा था अंतस से, स्वर्णिम भारत का सपना, बाँट के उसके नाम तले, गर्त में धकेल दी सब आस्था । Source- Google क्यूं नाम है होंठो पर भगत का ? क्यूं नहीं है उसके बोल अभी ? नकार दिया था उसने उनको भी, जो व्यर्थ पिटते थे ढोल कभी । कि क्रांति नहीं आये समाज को तोड़ने से, कि क्रांति नहीं आये लाशों को गिराने से, कि क्रांति नहीं आये व्यर्थ लहू बहाने से, राजगुरु-सुखदेव संग क़ुरबानी दी उसने, पर देखकर केवल एक ख्व़ाब कि आये क्रांति तो विचारों में, कि आये क्रांति तो कामों में, कि आये क्रांति तो ज़बानों में । यहाँ बैठे हैं अब भगत के नाम के इतने ठेकेदार, क्रांति शब्द से अनभिज्ञ हैं, हैं सारे के सारे गद्दार । रुकता क्यूं नहीं ये सिलसिला मंदिर-मस्जिद के जाप का, घर की माता-बहनें रोती और ये ठेका लेते हैं एक गाय का, अपनी स्त्री के जीवन को बना के बैठे हैं सब नरक यहाँ, किन्तु मुरादों के लालच में, जाते वैष्णों देवी और मक्का । क्यों नाम है होंठो पर गाँधी का ? क्यों नहीं उतरता जेहन में ? गाँ...