अँधेरे से उपजता उजाला -

 

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कभी ऐसा हुआ है कि आप अपनी ही धुन में चले जा रहे हैं और किसी ने आपको धक्का देकर झकझोर दिया हो? क्या कभी इस बात की तरफ ध्यान गया है कि जो उजाला आपकी आँखें इस दुनिया में देख रही हैं वह किन अँधेरे गलियारों से होकर आ रहा है? या यह महसूस करने का यत्न किया है कि जीवन में पल रही तमाम वेदनाएँ और नफ़रत एक मार्मिक चुम्बन के आगे कोई अस्तित्व नहीं रखती!

मैंने अपने रास्तों के अनगिनत क्षणों में ख़ुद को ऐसी अवस्था में पाया है जहाँ से मैं सिर्फ अपना सुख और उसके इर्दगिर्द फैला अँधेरा ही देख पाता हूँ. यह सुख असीम स्वार्थ और उतनी ही वासनाओं में लिपटा होता है और पल-पल इसमें वृद्धि ही होती है; इसके विपरीत उजियारे के उस ओर पल रहे अँधेरी वादियों का जुगनू मुझे हर बार उसी गर्त में झटकने में मशगूल रहता है जहाँ से सिवाय पीड़ा के कुछ हासिल नहीं होता. तमाम उम्र आदर्शों के मुखौटे पहने रहते हुए ऐसा समय भी आया है कि मैंने अपने ही कई हिस्सों का अस्तित्व सिरे से नकार दिया है. घट चुके या घट रहे क्षणों को लिखना आसान तो नहीं है लेकिन उतना दुर्गम और अयोग्य भी तो नहीं! 

जितनी बार मुझे जीवन में प्रेम के क्षणों की अनुभूति हुई; मेरे भीतर की वेदना अभिव्यक्त हो जाने के लिए छटपटाने लगती थी. मैं रमणीक होने वाले क्षणों में भी ख़ुद को सहानुभूति का पात्र बनाता रहा और अपने अँधियारे जीवन के वर्णनों से अनगिनत छलावे रचता रहा. सागर की तरह शांत और गहरे होने की उम्मीद में मैंने अपने उजालों को एक ऐसी राह दे दी, जिस पर चलकर शायद मुझे मौन के सिवाय कुछ न मिले और नदी के समान गुंजायमान और सतही वेदनाओं को मैं उस ओर धकेलने लगा हूँ जहाँ से विरक्ति में लिपटा हुआ एक अजाना अस्तित्व मेरी राह तकने लगा है. 

एक लड़की के प्रेम से उपजे फ़ितूर ने सिखाया कि प्रेम की सर्वोच्च तम अभिव्यक्ति में शरीर का कोई किरदार नहीं और न ही कोई मोल है और वह जीवन में आदर्शवाद की मूर्ति की तरह स्थापित हो गई. किसी अन्य के प्रेम ने पाठ कराया शारीरिक सौन्दर्य के अनूठेपन तथा व्यावहारिक धरातल पर पलते मानवीय-संगम का और उसने यथार्थवाद के अपने मायने गढ़ दिए. अब जब मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मैंने तमाम उम्र बस लम्हों के सहारे ढकोसले गढ़ने की कोशिशें की. आँखों के आगे से गुज़रते शब्दों से दर्शन बुनता रहा और वेदनाओं के सहारे प्रेम-फलित करता आया. इतना सब होने के बाद भी में अपनी आँखों में लालसा-भरी आस समेटे तलाश रहा हूँ एक ऐसे अस्तित्व को जो मुझे मेरी वेदनाओं, कुंठाओं, सुखों और अच्छाइयों से परे रखकर मेरा ‘मैं’ समझने की चाह रखता हो; मैं उम्मीद में हूँ एक ऐसे प्रेममय चुम्बन के जो यथार्थवाद के धरातल से लेकर आदर्शवाद का अंतरिक्ष नाप दे. 

                                                                              - कमलेश 

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