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ग़ज़ल

कोई लम्हा ठहरा नहीं जम के एक अरसे से यहाँ, आँखें बिछी हुई थीं कब से तुम्हारे इंतज़ार में यहाँ। तुम आये काली घटाओं के साये में मिलने मुझसे, बदलकर रख दिया तस्सवूर तुमने पल भर में ...

जब इश्क़ उतरने लगता है

उनींदी आँखों से सपने चूती उम्मीदें जब तकियों पर सिर पटकते हुए, अपनी मौत का रोना रोते रोते थक जाती है; तब बिस्तर की सिलवटों की ज़ंजीरें ख़ामोशी में चीख़ती बातों को, वैसे ही निगल ...