किस्सा -३ -- "तीसरा"


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वक़्त के गुज़रने की आवाज़ सुनी है?’, क्या कुछ भी पूछते हो तुम. यह बातें एक प्रेमी जोड़ा करेगा ऐसी उम्मीद दार्शनिकों के सिवा कोई और क्या ही रखेगा! हाँ, लेकिन निर्मल वर्मा से प्रभावित कवि या लेखक भी अकेले बैठकर ऐसा  सोच सकता है. प्रेम ने दर्शन को बहुत हद तक अपनी गिरफ़्त में रखा हुआ है लेकिन दर्शन आज तक प्रेम के इर्द-गिर्द भी नहीं जा सका. दुनिया के तमाम सिद्धांतों के सिमटने पर प्रेम काप्शुरु होता है. किस्सों की ज़िंदगियाँ बस उतनी ही होती है जितनी देर में पढ़ने वाला उसे पढ़ जाए; बाकि तो पन्ने भरने की प्रक्रिया का नाम कहा जाता है. मैंने उसे कहते सुना था एक दफ़ा कि जब मेरे क़रीब रहो तो दर्शन और साहित्य दोनों को दहलीज के उस पार ही छोड़ आना अन्यथा मुझमें तुम्हें तीनों में से कुछ भी हाथ नहीं लगेगा. तीसरे की खोज में मैंने दुनिया की अच्छी किताबों को ढूँढकर पढ़ना चालू कर दिया है, हालाँकि खोज अभी जारी है. आप में से किसी को तीसरे के बारे में कुछ पता चले तो ख़बर दीजियेगा...
- कमलेश

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