प्रेम, ज़िन्दगी, मिथ्या और तुम -


जीवन का हर पल एक अवसर माना जाता है. प्रेम को हर कदम के लिए अहम माना जाता है. मिथ्याओं से पार पाना असंभव माना जाता है. लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मानने, समझने और जान-लेने में फर्क किसी को समझ नहीं आता है. लोग व्यंग भरी बातों से इस कठिन समय को हल्का करने में लगे हैं और सोचा करते हैं कि कब यह कोरोना नामक दानव इस धरा से अपना पिंड छुड़ाये, हाँ बिल्कुल सही पढ़ा; कोरोना को हमसे पिंड छुड़ाना पड़ेगा हम तो कतई न मानने वाले. अब तुम ख़ुद ही देख लो, इतनी सख्ती और गाइडलाइन के बावजूद हम पहुँच जाते हैं यह जताने कि हम कितना चाहते हैं तुम्हें और जताने के लिए भी कितने आतुर हैं उस प्रेम को तुमसे! 

शीर्षक पढ़कर यह भ्रम भी पाला जा सकता है कि मैं कोई भावपूर्ण प्रेम अनुभव या कहानी लिख बैठा होऊँगा, लेकिन मेरे किसान पिता को हाल ही में लाये गये तथाकथित किसान-बिलों से संतुष्टि हो पाए तब न! मेरे दोस्त ने जिस लड़की से प्रेम किया वह अपना सर-नेम कुछ और लिखती है; वे दोनों बग़ैर किसी मुश्किल के जी पाए तब न! हर रोज़ 110 से ज्यादा बलात्कार के केस या ख़बरे पढ़ने के बावजूद मेरा दिल समझ पाए कि मेरी महिला दोस्त या बच्चियां इस देश में सुरक्षित जी पाए तब न! 

सुनिए मेरे अजीज़, अपार संकटों के बीच प्रेम जीने की हिम्मत तो रखता हूँ लेकिन ज़मीनी मामलों और अत्याचारों के बजाय केवल प्रेम के काल्पनिक सूत्र एक अदृश्य धागे में पिरोता रहूँ; यह तो उतना ही कठिन है जितना बिना किसी पेन, पेंसिल, स्याही, लकड़ी या मार्कर के एक पूरे-भरे हुए पन्ने पर कुछ लिखने की कोशिश करना! जिंदगी में प्रेम अपार है इस बात में कोई दोराय नहीं, प्रेम मिथ्या में उलझे बिना और हक़ीकत से लड़े बिना संभव नहीं ये भी सच है. तुम तक पहुँचने के लिए मुझे प्रेम के इर्द-गिर्द बुनी गई मिथ्या-भरी कहानियों को ज़िन्दगी से उखाड़ना पड़ेगा और उसके लिए लोग मुझे नारीवादी, एंटी-नेशनल, कम्युनिस्ट, काफ़िर जैसे तमगों से मेरे सिर पर मुकुट पहनाने के लिए तैयार बैठे होंगे. 

बहरहाल बात तो यही सच है कि मुझे ख़ुद नहीं पता कि तुम कहाँ हो और तुम तक पहुँचा कैसे जाए!

फिर भी चल रहा हूँ अपनी ज़िन्दगी की मिथ्याओं को अपने प्रेम के हथियार से तोड़ते हुए तुम्हारी तलाश में...

- कमलेश

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