वर्तमान का ख़्वाब -


हम सारी ज़िन्दगी उस ख़्वाब के लिए अपनी नींदे ख़राब कर देते हैं जो हमने अब तक की सबसे गहरी और ख़ूबसूरत नींद में देखा था। नींद जागने से उतनी भी अलग नहीं होती जितना इसे बना दिया गया है: बल्कि नींद में आप अपने जीवन के उस हिस्से को नए सिरे से जीने लगते हो जिसको आप जागते हुए जीने की हिम्मत करने से बहुत डरते हो। इन सारी चीजों से जुड़े रास्ते बहुत बिखरे हुए से लगते हैं मुझको। एक दिन ऐसा आएगा जब यह बिखरते बिखरते उलझने लगेंगे और फिर हममें से किसी को भी अपनी मंज़िल कभी भी नहीं मिल पाएगी; और तब मैं किसी पेड़ के नीचे एक किताब हाथ में लिए मुस्कुरा रहा होऊँगा।

उस दिन मैं अपने द्वारा जिये गए तमाम लम्हों को समेटकर उनकी गठरी को उस नदी में जाकर फेंक आऊँगा जिस नदी में पैर डुबोना मुझे सबसे ज्यादा सुकून देता है। इस उम्मीद को अपने होने के किसी कोने में छुपाये कि शायद ऐसा करने से मैं अपना अतीत मिटा सकता हूँ जिसमें वे बिखरे-उलझे रास्ते भी मिट सकें। और तब मेरे पास शेष रह जायेगा निरा वर्तमान; जो मेरा अपना है। इस वर्तमान को मैं उस लड़की के हाथों में हाथ रखकर जीना चाहता हूँ जिसे पिछले कुछ दिनों से मेरे फ़ोन कॉल का इंतज़ार रहने लगा है, जिसकी आवाज़ में मुझे अपने अकेलेपन को काट देने की खनक सुनाई पड़ती है। जिसकी चाहत है कि जब कभी वह आँखें खोले तो मैं उसे दिखाई दे जाऊँ और मैं उसके कुछ भी कह देने से पहले उसके ठहरे हुए सुकूँ-परस्त होंठ चूम लेना चाहता हूँ।

- कमलेश 

टिप्पणियां

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विश्वास – जीवन जीने के लिए एक अपरिहार्य गुण

किस्सा -२ -- बगावती जोड़ा

प्रेम, ज़िन्दगी, मिथ्या और तुम -