सवाल किस बात का है?

सैंकड़ों जलती चिताएँ
अनगिनत भटकते लोग,
पैदल घर लौटती एक दुनिया
प्यास-भूख से थमती साँसे,
आँसुओं की अविरल धारा
छोड़ गए साथियों का ग़म।

कितना कुछ है यहाँ
जिसे देखने के लिए आँखें नहीं
करुणा की ज़रूरत है।
वे पूछते हैं तुम किस पाली में हो?
मैं ख़ुद से करता हूँ सवाल कि
क्या अब भी देखा जाए एक ख़्वाब
जिसमें
धर्म की लकीरें न हों
पैसों से पनपती खाई न हो
घर लौटने वालो के लिए आराम हो
अकेली लड़की के मन में खौफ़ न हो
स्त्री के सिर पर तमाम बोझ न रखा हो
बच्चों के खेलने का खुला मैदान हो
मान-सम्मान के परे लोग मिलते हों
बचपन से लाई गई हंसी हो
युवाओं की ज़ुबाँ पर सवाल हो
हुक्मरानों की नीति नहीं नियत साफ़ हो
बगल में आग लगने पर 
अपने घर में चादर ओढ़कर सोने वाले न हों!

मैं चाहता हूँ कि 
यह न पूछा जाए कि
कौन किस पाली में बैठा है
बल्कि सवाल चाहत का रहे;
जैसे एक प्रेमी-युगल चाहे
साथ बैठकर बातें करना
ढलते सूरज को सुकूँ से देखना
एक-दूजे के होंठो का चुम्बन
भीड़ के डर से परे एक आलिंगन
जिहाद से परे चाँदनी की एक सैर
पहचान से बहुत दूर पनपती
प्रेम और सिर्फ प्रेम की एक दुनिया।
                                        - कमलेश

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